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बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

४६४ नारदीयपुराणम् धर्मायुवृष्टिष्व समं श्रेष्ठं नष्टं फलं क्रमात् । आयुधं वाहनाहारौ यज्जातीयं जनस्य च ॥२६०॥ स्वापोपविष्टास्तिष्ठन्तस्ते लोकाः क्षेममाप्नुयुः । अंधकं मंदसंज्ञं च मध्यसंज्ञं सुलोचनम् ॥२६१॥ पपौयाद्गणयेद्‌भानि रोहिण्यादिचतुर्विधम् । स्थिरभेष्‌वर्कसंक्रांतिर्ज्ञेया विष्णुपदाह्वया ॥२६२॥ षडशीतिमुखा ज्ञेया द्विस्वभावेषु राशिषु । तुलाघटाजयोर्ज्ञेयो विषुवत्सूर्यसंमः ॥२६३॥ याम्यायने स्थिरे त्वाद्याः पराः सौम्येन्दुमूर्तिभे । मेध्या विषुवति प्रोक्ताः पुण्यनाड्यस्तु षोडश ॥२६४॥ संध्या त्रिनाडी प्रमितार्कविवोर्दोदयास्ततः । प्राक्पश्चाद्याम्यसौम्ये चेत्पुण्यं पूर्वापरेहनि ॥२६५॥ यादृशेने॑न्दुना भानोः संक्रांतिस्तादृशं फलम् । नरः प्राप्नोति तद्राशौ शीतांशोः साध्वसाधु च ॥२६६॥ संक्रांतेः परतो भानुर्भुक्त्वा यावद्भिभिरंशकैः । रवेरयनसंक्रांतिस्तदा तद्राशिसंक्रमात् ॥२६७॥ संक्रांतिग्रहगर्भांक्षा जन्मन्युभयपार्श्वयोः । व्रतोद्वाहादिकेष्वेव द्वयं नेष्टं तु तत्क्रमात् ॥२६८॥ तिलोपरिलिखेच्चक्रं त्रित्रिशूलं त्रिकोणकम् । तत्र हेम विनिक्षिप्य दद्याद्दोषापवृत्तये ॥२६६॥ ताराबलेन शीतांशुर्बलवांस्तद्वशाद्रविः । बली संक्रममाणस्तु तद्गतखेटा बलाधिकाः ॥२७०॥ भोजन तथा उससे आजीविका या व्यवहार करने वाले मनुष्यादि प्राणियों का अनिष्ट होता है एवं जिस प्रकार सोये, बैठे और खड़े हुए संक्रान्ति होती है, उसी प्रकार सोये, बैठे और खड़े हुए प्राणियों का अनिष्ट होता है ॥२५८-२६०३॥ नक्षत्रों की अन्धाक्षादि संज्ञाएँ--रोहिणी नक्षत्र से आरंभ करके चार-चार नक्षत्रों को क्रमशः अन्ध, मन्दनेत्र, मध्यनेत्र और सुलोचन माने और पुनः आगे इसी क्रमसे सूर्य के नक्षत्र तक गिनकर नक्षत्रों की अन्ध आदि चार संज्ञायें समझना चाहिए। संक्रान्ति की विशेष संज्ञा-स्थिर राशियों (वृष, सिंह, वृश्चिक और कुम्भ) में सूर्य की संक्रान्ति का नाम 'विष्णुपदी', द्विस्वभाव राशियों मिथुन, कन्या, धनु और मीन) में 'षडशीतिमुख', तुला और मेष में, 'विषुव' मकर में 'सौम्यायन' और कर्क में 'याम्यायन' संज्ञा होता है ॥२६१-२६३३॥ (पुण्यकाल--) याम्यायन और स्थिरराशियों को (विष्णुपद) संक्रान्तिकाल से पूर्व १६ घड़ी, द्विस्वभाव राशियों की षडशीतिमुख और सौम्यायन-संक्रान्ति में संक्रान्ति-काल के पश्चात् १६ घड़ी तथा विषुव (मेष-तुला) संक्रांति के मध्य (संक्रान्तिकाल से ८ पूर्व और ८ पश्चात) की १६ घड़ी का समय पुण्यदायक होता है ॥२६४॥ सूर्योदय से पूर्व की तीन घड़ी प्रातःसंध्या तथा सूर्यास्त के बाद, की तीन घड़ी सायं संध्या कहलाती है। यदि सायं संध्या में याम्यायन या सौम्यायन कोई संक्रान्ति हो तो पूर्व दिन में और प्रातः संध्या में संक्रान्ति हो तो पर दिन में सूर्योदय के बाद पुण्यकाल होता हैं ॥२६५॥ जब सूर्य को संक्रान्ति होती है, उस समय प्रत्येक मनुष्य के लिए जैसा शुभ या अशुभ चन्द्रमा होता है, उसी के अनुसार इस महीने में मनुष्यों को चन्द्रमा का शुभ या अशुभ फल प्राप्त होता ॥२६६॥ किसी संक्रान्ति के बाद सूर्य जितने अंश भोग कर उस संक्रान्ति करे, आगे अयन संक्रान्ति को उतने समय संक्रान्ति या ग्रहण का जो नक्षत्र हो, वह तथा उसके आगे-पीछे वाले दोनों नक्षत्र उपनयन और विवाहादि शुभ कार्यों में अशुभ होते हैं। संक्रान्ति या ग्रहणजनित अनिष्ट फलों की शान्ति के लिए तिलों को ढेरी पर तीन त्रिशूल वाला त्रिष्ठकोण-चक्र लिखे और उस पर यथाशक्ति सुवर्ण रखकर ब्राह्मणों को दान दे ॥२६७-२६६॥ ग्रहगोचर-तारा के बल से चन्द्रमा बली होता है और चन्द्रमा के बली होने पर सूर्य बली हो जाता है तथा संक्रमणकारी सूर्य के बली होने से अन्य सब ग्रह भी बली समझे जाते हैं ॥२७०॥

षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४६५ शुभोऽर्को जन्मतस्तृणायदशषट्सु मुनीश्वर । नवपञ्चांबुरिष्फस्थैर्य्यर्किमविध्यते न चेत् ॥२७१॥ शुभो जन्मर्क्षतश्चन्द्रो द्यूनांगायारिसप्तत्रिषु । यष्टेष्टांत्यां बुधर्मस्थैर्विबुधैर्विध्यते न चेत् ॥२७२॥ व्यायारिषु कुजः श्रेष्ठो जन्मतो चेन्न विध्यते । व्ययेष्वंकस्थितैः सौरिसौम्यसूर्यैः शुभौषधात् ॥२७३॥ ज्ञः स्वायार्य्यष्टाष्टखायेषु जन्मतश्चेन्न विध्यते । धीत्र्यकादिगजांतस्थैः शशांकरहितैः शुभैः ॥२७४॥ जन्मराशेर्गुरुः श्रेष्ठः स्वायगोऽध्यस्तगो न चेत् । विध्यतैंत्याष्टखांबुत्रिगतैः खेटैर्मुनीश्वर ॥२७५॥ जन्ममादासृताष्टांतांत्यापष्विष्टो भृगोःसुतः । चेन्न विद्धोऽष्टसप्तांगम् खांकाद्यायारिरामगैः ॥२७६॥ न ददाति शुभं किंचिद्गोचरे वेधसंयुते । तस्माद्वेधं विचार्याय कथनीयं शुभाशुभम् ॥२७७॥ वामभेदविधानेन दुष्टोऽपि स्याच्छुभङ्करः । सौम्येक्षितोऽनिष्टफलः शुभदः पापवीक्षितः ॥२७८॥ निष्फलौ तौ ग्रहौ स्वेन शत्रुणां च विलोकितौ । नीचराशिगतः स्वस्य शत्रोः क्षेत्रगतोऽपि ॥२७९॥ शुभाशुभफलं नैव दद्यादस्तमितोऽपि वा । ग्रहेषु विषमस्थेषु शांतिं कुर्यात्प्रयत्नतः ॥२८०॥ हानिवृद्धिर्ग्रहाधीना तस्मात्पूज्यतमा ग्रहा । मणिमुक्ताफलं विद्रुमाख्यं मरकतं तथा ॥२८१॥ पुष्परागं तथा वज्र नीलं गोमेदसंज्ञितम् । वैदूर्यं भास्करादीनां तुष्ट्य धार्यं यथाक्रमम् ॥२८२॥

मुनीश्वर ! अपनी जन्म राशि से ३,११,१०,६ स्थान में सूर्य शुभ होता है; परन्तु यदि क्रमशः जन्मराशि से हो ९,५,४ तथा १२ वें स्थान में स्थित शनि के अतिरिक्त अन्य ग्रहों से वह विद्ध न हो, तभी शुभ होता है । इसी प्रकार चन्द्रमा जन्मराशि से ७,६,११,१,१० तथा ३ मैं शुभ होते हैं; यदि क्रमशः २,१२,८,५,४ और ९ वें में स्थित बुध से भिन्न ग्रहों से विद्ध न हों । मंगल जन्मराशि से ३,११,६ में शुभ हैं; यदि क्रमशः १२,५ तथा ९वें स्थान में स्थित अन्य ग्रह से विद्ध न हों । शनि भी अपनी जन्मराशि से इन्हीं ३, ११, ६ स्थानों में शुभ हैं; यदि क्रमशः १२, ५, ९ स्थानों में स्थित सूर्य के सिवा अन्य ग्रहों से विद्धन हों । बुध अपनी जन्मराशि से २, ४, ६, ८, १० और ११ स्थानों में शुभ हैं, यदि क्रमशः ५, ३, ९, १, ८, और १२ स्थानों में स्थित चन्द्रमा के सिवा अन्य किसी ग्रह से विद्ध न हों । मुनीश्वर ! गुरु जन्मराशि से २, ११, ९, ५ और ७ इन स्थानों में शुभ होते हैं; यदि क्रमशः १२, ८, १०, ४ और ३ स्थानों में स्थित अन्य किसी ग्रह से विद्ध न हों । इसी प्रकार शुक्र भी जन्मराशि से १, २, ३, ४, ५, ८, ९, १२ तथा ११ स्थानों में शुभ होते हैं; यदि क्रमशः ८, ७, १, १०, ९, ५, ११, ६, ३ स्थानों में स्थित अन्य ग्रह से विद्ध न हों ॥२७१-२७६॥ जो ग्रह गोचर में वेधयुक्त हो जाता है, वह शुभ या अशुभ फल को नहीं देता; इसलिए वेध का विचार कर के ही शुभ या अशुभ फल समझना चाहिए ॥२७७॥ वामवेध होने (वेध स्थान में ग्रह और शुभ स्थान में अन्य ग्रह के होने) से दुष्ट (अशुभ) ग्रह भी शुभकारक हो जाता है तथा शुभप्रद ग्रह भी पाप ग्रह से दृष्ट हो तो अनिष्ट फल देता है। शुभ और पाप दोनों ग्रह यदि अपने शत्रु से देखे जाते हों अथवा नीच राशि में या अपने शत्रु की राशि में हों तो निष्फल हो जाते हैं। इसी प्रकार जो ग्रह अस्त हो, वह भी अपने शुभ या अशुभ फल को नहीं देता है। ग्रह यदि दुष्ट स्थान में हो तो यत्नपूर्वक उसकी शान्ति कर लेनी चाहिए । हानि और लाभ ग्रहों के ही अधीन हैं, इसलिए ग्रहों की यत्नपूर्वक पूजा करनी चाहिए ॥२७८-२८०३॥ सूर्य आदि नवग्रहों की तुष्टि के लिए क्रमशः मणि (पद्मराग-लाल), मुक्ता (मोती), विद्रुम (मूंगा), मरकत (पन्ना), पुष्पराग (पुखराज), वज्र (हीरा), नीलम, गोमेदरत्न एवं वैदूर्य (लहसनिया) धारण करना चाहिए ॥२८१-२८२॥ ५९ ना० पृ०

४५६ नारदीयपुराणम् शुक्लपक्षादिवसे चंद्रो यस्य शुभप्रदः । स पक्षस्तस्यशुभदः कृष्णपक्षोन्यथाऽशुभः ॥२८३॥ शुक्लपक्षे शुभश्चंद्रो द्वितीयोनवपंचमे । रिःफरंध्रांबुसंस्थैश्चेन्न विद्धो गगने चरैः ॥२८४॥ जन्म संपद्विपत् क्षेम प्रत्यरिः साधको वधः । मित्रं परममित्रं च जन्मभात्तु पुनः पुनः ॥२८५॥ जन्मात्रपञ्चसप्ताख्यास्तारा नेष्ट फलप्रदाः । शाकं गुडं च लवणं सतिलं कांचनं क्रमात् ॥२८६॥ अनिष्टफलनाशाय दद्यादेतद्द्विजातये । कृष्णे बलवती तारा शुक्लपक्षे बली शशी ॥२८७॥ यात्रोद्वाहादिकार्येषु नामतुल्यफलप्रदाः । षष्टिघ्नं गतचन्द्रक्षं तत्कालघटिकान्वितम् । वेदघ्नमिषुवेदांत्यमवस्था भानुभागताः ॥२८८॥ प्रवासनष्टाख्यमृता जयो हास्यं रतिर्मुदा । शनिभुक्तिर्ज्वरः कंपः सुस्थितिर्नामसन्निभाः ॥२८९॥ पट्टबंधनयाजोग्रसंधिविग्रहभूषणम् । धातवाकरं युद्धकर्म मेषलग्ने प्रसिद्ध्यति ॥२९०॥ मंगलाने स्थिराण्यंबुवेश्मकर्मप्रवर्तनम् । कृषिवणिज्यपश्वादिदृष्टलग्ने प्रसिद्ध्यति ॥२९१॥ कलाविज्ञानशिल्पानि भूषणावहसंश्रवम् । गजोद्वाहाभिषेकार्यं कर्त्तव्यं मिथुनोदये ॥२९२॥ चन्द्र-शुद्धि में विशेषता-शुक्ल पक्ष के प्रथम दिन प्रतिपदा में जिस व्यक्ति के चन्द्रमा शुभ होते हैं उसके लिए शुक्ल-पक्ष और कृष्णपक्ष दोनों ही शुभ होते हैं। अन्यथा (यदि शुक्ल-प्रतिपदा में चन्द्रमा अशुभ हो तो) दोनों पक्ष अशुभ हो होते हैं। (पहले जो जन्मराशि से २, ९, ५ वें चन्द्रमा को अशुभ कहा गया है।) शुक्लपक्ष में २,९, तथा ५ वें स्थान में स्थित चन्द्रमा भी शुभप्रद ही होता है, यदि वह ६,८,१२ वें स्थानों में स्थित अन्य ग्रहों से विद्ध न हो ॥२८३-२८४॥ तारा विचार - अपने-अपने जन्म-नक्षत्र से नौ नक्षत्रों तक गिने तो क्रमशः १ जन्म, २ सम्पत्, ३ विपत्, ४ क्षेम, ५ प्रत्यरि, ६ साधक, ७, वध, ८ मित्र तथा ९ परम मित्र इस प्रकार ९ तारायें होती हैं। फिर इसी प्रकार आगे गिनने पर १० से १८ तक तथा १९ से २७ तक क्रमशः वे ही तारायें होंगी। इनमें १,३,५ और ७वीं तारा अपने नाम के अनुसार अनिष्ट फल देने वाली होती हैं। इन चारों ताराओं में इनके दोष की शान्ति के लिए ब्राह्मणों को क्रमशः शाक, गुड, लवण और तिल सहित सुवर्ण का दान देना चाहिए। कृष्णपक्ष में तारा बलवती होती है और शुक्लपक्ष में चन्द्रमा बलवान् होता है ॥२८५-२८७॥ चन्द्रमा की अवस्था - प्रत्येक राशि में चन्द्रमा की बारह-बारह अवस्थायें होती हैं, जो यात्रा तथा विवाह आदि शुभ कार्यों में अपने नाम के सदृश ही फल देती हैं। अवस्था का ज्ञान - अभीष्ट दिन में गत नक्षत्र-संख्या को ६० से गुणा कर के उसमें वर्तमान नक्षत्र की भुक्त (भयात) घड़ी को जोड़ दे, योगफल को चार से गुणा कर के गुणनफल में ४५ का भाग दे। जो लब्धि आये, उसमें पुनः १२ से भाग देने पर १ आदि शेष के अनुसार मेषादि राशियों में क्रमशः प्रवास, नष्ट, मृत, जय, हास्य, रति, मुदा, भुक्ति, ज्वर, कम्प और सुस्थिति-ये बारह गत अवस्थायें होती हैं। ये अपने-अपने नाम के समान फल देने वाली होती हैं ॥२८८-२८९॥ मेषादि लग्नों में कर्त्तव्य - पट्टबन्धन ( राजसिंहासन, राजमुकुट आदि धारण), यात्रा, उग्र कर्म, संधि, विग्रह, आभूषण-धारण, धातु, खान सम्बन्धी कार्य और युद्धकर्म-ये सब मेषलग्न में आरंभ करने से सिद्ध होते हैं ॥२९०॥ वृषलग्न में विवाह आदि मंगलकर्म, गृहारम्भ आदि स्थिरकर्म, जलाशय, गृह-प्रवेश, कृषि, वाणिज्य तथा पशुपालन आदि कार्य सिद्ध होते हैं ॥२९१॥ मिथुन लग्न में कला, विज्ञान, शिल्प, आभूषण, युद्ध, संश्रव (कीर्तिसाधक कर्म), राजकार्य, विवाह, राज्याभिषेक आदि कार्य करने चाहिए ॥२९२॥ कर्क लग्न में वापी,

षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४६७ वापोकूपतडागादि वारिबंधनमोक्षणम् । पौष्टिकं लिपिलेखादि कर्तव्यं कर्कटोदये ॥२६३॥ इक्षुधान्यवणिक्पण्यकृषिसेवादयस्थिरे । साहसाहवभूषाद्यं सिंहलग्ने प्रसिद्ध्यति ॥२६४॥ विद्याशिल्पौषधं कृत्यं भूषणं च चरस्थिरम्। कन्या लग्नं विधेयं च पौष्टिकाखिलमंगलम् ॥२६५॥ कृषिवाणिज्ययानं च पशुद्वाहव्रतादिकम् । तुलायामखिलं कर्म तुलाभाराश्रिते च यत् ॥२६६॥ स्थिरकर्माखिलं कार्यं राजसेवाभिषेचनम् । चौर्यकर्मस्थिरारंभाः कर्तव्याः वृश्चिकोदये ॥२६७॥ व्रतोद्वाहप्रयाणाश्वगजशिल्पकलादिकम् । चरस्थिरविमिश्रं च कर्तव्यं कार्मुकोदये ॥२६८॥ चापबंधनमोक्षास्त्रकृषिगोश्वादिकम् च यत् । प्रस्थानं पशुदासादि कर्तव्यं मकरोदये ॥२६६॥ कृषिवाणिज्यपशूवंशिल्पकर्मकलादिकम् । जलपात्रास्त्रशस्त्रादि कर्तव्यं कलशोदये ॥३००॥ व्रतोद्वाहाभिषेकांवुस्थापनं सन्निवेशनम् । भूषणं जलपात्राश्वकर्म मीनोदये शुभम् ॥३०१॥ मेषादिषु विलग्नेषु शुद्धेष्वेवं प्रसिद्ध्यति । क्रूरग्रहेक्षितेष्वप्रसंयुतेष्वप्रमेव हि ॥३०२॥ गोयुग्मकर्ककन्यांत्यतुलाचापधराः शुभाः । शुभर्क्षत्वाशुभास्त्य इतरा पापराशयः ॥३०३॥ ग्रहयोगावलोकाभ्यां राशिर्धत्ते ग्रहोद्भवम् । फलं ताभ्यां विहीनोऽसौ स्वभावमुपसर्पति ॥३०४॥ कूप, तड़ाग, जल रोकने के लिए बांध, जल निकालने के लिए नाली बनाना, पौष्टिक कर्म, चित्रकारी तथा लेखन आदि कार्य करने चाहिए ॥२६३॥ सिंह लग्न में ईख तथा धान्यसम्बन्धी सब कार्य, वाणिज्य, हाट, कृषिकर्म तथा सेवा आदि कर्म, स्थिर कार्य साहस, युद्ध तथा आभूषण बनाना आदि कार्य सिद्ध होते हैं ॥२९४॥ कन्या लग्न में विद्यारंभ, शिल्पकर्म, औषधि निर्माण और उसका धारण, समस्त चर और स्थिर कार्य, पौष्टिक कर्म तथा विवाहादि समस्त शुभ कार्य करने चाहिए ॥२९५॥ तुला लग्न में कृषिकर्म, व्यापार, यात्रा, पशुपालन, विवाह- उपनयनादि संस्कार तथा तोल सम्बन्धी जितने कार्य हैं, वे सब सिद्ध होते हैं ॥२९६॥ वृश्चिक लग्न में गुह्यारम्भादि समस्त स्थिर कार्य, राजसेवा, राज्याभिषेक, गोपनीय और स्थिर कर्मों का आरंभ करना चाहिए ॥२९७॥ धनु लग्न में उपनयन, विवाह, यात्रा, अश्वकृत्य, गजकृत्य, शिल्पकला तथा चर, स्थिर और मिश्रित कर्मों को करना चाहिए ॥२९८॥ मकर लग्न में धनुष बनाना, उसमें प्रत्यंचा बांधना, बाण छोड़ना, अस्त्र बनाना और चलाना, कृषि, गो पालन, अश्वकृत्य, गजकृत्य तथा पशुओं का क्रय-विक्रय और दास आदि की नियुक्ति-ये सब कार्य करने चाहिए ॥२९९॥ कुम्भ लग्न में कृषि, वाणिज्य, पशुपालन, जलाशय, शिल्पकर्म, कला आदि, जलपात्र (कलश आदि) तथा अस्त्र-शस्त्र का निर्माण आदि कार्य करना चाहिए ॥३००॥ मीन लग्न में उपनयन, विवाह, राज्या- भिषेक, जलाशय की प्रतिष्ठा, गृहप्रवेश, भूषण, जलपात्रनिर्माण तथा अश्व सम्बन्धी कृत्य शुभ होते हैं ॥३०१॥ इस प्रकार मेषादि लग्नों के शुद्ध (शुभ स्वामी से युक्त या दृष्ट) रहने से शुभ कार्य सिद्ध होते हैं (पापग्रह से युक्त या दृष्ट लग्न हो तो उसमें केवल क्रूर कर्म ही सिद्ध होते हैं ॥३०२॥ वृष, मिथुन, कर्क, कन्या, मीन, तुला ओर धनु ये शुभग्रह की राशि होने के कारण शुभ हैं तथा अन्य (मेष, सिंह, वृश्चिक, मकर और कुम्भ-ये) पापराशियाँ हैं ॥३०३॥ लग्न पर जैसे (शुभ या अशुभ) ग्रहों का योग या दृष्टि हो उसके अनुसार ही लग्न अपना फल देता है । यदि लग्न में ग्रह के योग या दृष्टि का अभाव हो तो लग्न अपने स्वभाव के अनुकूल फल देता है ॥३०४॥ किसी लग्न के आरंभ में कार्य का आरम्भ होने पर उसका पूर्ण फल मिलता है । लग्न के मध्य में मध्यम और अन्त में अल्प फल प्राप्त होता है। यह बात सब लग्नों में समझनी चाहिए ॥३०५॥ कार्यकर्ता के लिए सर्वत्र पहले लग्नबल, उसके बाद चन्द्रबल देखना चाहिए । चन्द्रमा यदि बली हो ओर सप्तम भाव में स्थित हो तो सब ग्रह बलवान् समझे जाते हैं ॥३०६॥ चन्द्रमा का बल आधार और अन्य ग्रहों के बल आधेय हैं । आधार के बल पर ही आधेय स्थिर रहता है ॥३०७॥ यदि

४६८ नारदीयपुराणम् आदौ सम्पूर्णफलदं मध्ये मध्यफलप्रदम् । अन्ते तुच्छफले लग्ने सर्वस्मिन्नेवमेव हि ॥३०५॥ सर्वत्र प्रथमं लग्नं कर्त्तव्यंचंद्रबलं ततः । कल्प्यार्माददौ बलिनि सप्तमे बलिनो ग्रहाः ॥ ३०६॥ चंद्रस्य बलिमाधारमाधेयं चान्यखेटकम् । आधारभूतेनाधेयं धीयते परिधिष्ठितम् ॥३०७॥ चेदिन्दुः शुभदः सर्वे ग्रहाः शुभफलप्रदाः । अशुभश्चेदशुभादा वर्जयित्वा धनाधिपम् ॥३०८॥ लग्नस्याभ्युदिता येंशास्तेष्वंशेषु स्थितो ग्रहः । लग्नोद्भवं फलं धत्ते धनातीतो द्वितीयकम् ॥३०९॥ एवं स्थानेषु शेषेषु चैवमेवं प्रकल्पयेत् । लग्नं सर्वगुणोपेतं लभ्यतेऽल्पैर्दिनैर्नहि ॥३१०॥ दोषाल्पत्वं गुणाधिक्यं बहु संततमित्यते । दोषाद् दृष्टो हि कालस्तमपि माष्टुं पितामहः ॥३११॥ अप्यशौचगुणाधिक्यं दोषान्यत्ते ततो हि ते । अमारिक्ताष्टमीषष्ठीद्वादशीप्रतिपत्स्वपि ॥३१२॥ परिघस्य च पूर्वार्द्ध व्यतीपाते सवैधृतौ । संध्यासूपप्लवे विष्ट्यामशुभं प्रथमार्त्तवम् ॥३१३॥ रुग्णा पतिप्रिया दुःखा पुत्रिणी भोगनी तथा । पतिव्रता क्लेशयुक्ता सूर्यवारादिषु क्रमात् ॥३१४॥ याम्याग्निरौद्रभाग्याहिद्विशेंद्राद्विह्य पहिद्भाः । तारका न हिता मासा मधुर्जशुचिपौषकाः ॥३१५॥ भद्रा च संक्रमो निद्रा रात्रिश्चंद्रार्कयोर्ग्रहः । कुलटा पापभोगेषु निन्द्यर्क्षे निन्द्यवासरे ॥३१६॥ तिलाज्यदूर्वा जुहुयाद्गायत्र्याष्टशतं बुधः । सुवर्णगोतिलान्दद्यात्सर्वदोषानुपत्तये ॥३१७॥ चन्द्रमा शुभदायक हो तो सब ग्रह शुभ फल देने वाले होते हैं। यदि चन्द्रमा अशुभ हो तो अन्य सब ग्रह भी अशुभ फल देने वाले हो जाते हैं। लेकिन धनस्थान स्वामी को छोड़कर ही यह नियम लागू होता है; क्योंकि यदि धनेश शुभ हो तो वह चन्द्रमा के अशुभ होने पर भी अपना शुभ फल ही देता है ॥३०८॥ लग्न के जितने अंश उदित हो गये (क्षितिज से ऊपर आ गये) हों, उनमें जो ग्रह हो वह लग्न के फल को देता है। इससे यह भी सिद्ध होता है कि लग्न के जितने भावांश हों, उनके भीतर रहने वाला ग्रह लग्नभाव का फल देता है तथा उससे आगे-पीछे हो तो लग्नराशि में रहता हुआ भी आगे-पीछे के भाव का फल देता है। लग्न के कथित अंश से जो ग्रह आगे बढ़ जाता है, वह द्वितीय भाव का फल देता है। इस प्रकार सब भावों में ग्रहों की स्थिति और फल की कल्पना करनी चाहिए। सब गुणों से युक्त लग्न तो थोड़े दिनों में नहीं मिल सकता; अतः स्वल्प दोष और अधिक गुणों से युक्त लग्न को ही सब कार्यों में सर्वदा ग्रहण करना चाहिए; क्योंकि अधिक दोषों से युक्त काल को ब्रह्मा भी शुद्ध नहीं कर सकते; इसलिए थोड़े दोष से युक्त होने पर भी अधिक गुण वाला लग्न-काल हितकर होता है ॥३०९-३११ १/२॥ स्त्रियों के प्रथम रजोदर्शन-अमावास्या, रिक्ता (४, ९, १४), ८, ६, १२ और प्रतिपदा- इन तिथियों में परिघ योग के पूर्वार्ध में, व्यतीपात और वैधृति में, संध्या के समय, सूर्य और चन्द्र के ग्रहणकाल में तथा विष्टि (भद्रा) में स्त्री का प्रथम मासिक धर्म अशुभ होता है। रवि आदि वारों में प्रथम रजोदर्शन हो तो वह स्त्री क्रमशः रोगयुक्ता, पति की प्रिया, दुःखयुक्ता, पुत्रवती, भोगवती, पतिव्रता एवं क्लेशयुक्त होती है ॥३१२-३१४॥ भरणी, कृत्तिका, आर्द्रा, पूर्वा फाल्गुनी, अश्लेषा, विशाखा, ज्येष्ठा, पूर्वाषाढ़ और पूर्व भाद्रपद-ये नक्षत्र तथा चैत्र, कार्तिक, आषाढ़ और पौष-ये मास प्रथम मासिक धर्म में अनिष्टकारक होते हैं। भद्रा सूर्य की संक्रान्ति, निद्रा अवस्था-रात्रिकाल, सूर्यग्रहण तथा चन्द्रग्रहण-ये सब प्रथम मासिक धर्म में शुभ नहीं हैं। अशुभ योग, निन्द्य नक्षत्र तथा निन्दित दिन में प्रथम मासिक धर्म हो तो वह स्त्री कुलटा स्वभाव वाली होती है ॥३१५-३१६॥ इसलिए इन सब दोषों की शान्ति के लिए विज्ञ पुरुष को तिल, घृत और दूर्वा से गायत्री मंत्र द्वारा १०८ बार आहुति तथा सुवर्णदान, गोदान एवं तिलदान करना चाहिए ॥३१७॥

षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४६६ आद्या निशाश्चतस्रस्तु याज्या ह्यपि समा परैः । ओजराश्यंशगे चंद्रे लग्ने पुंग्रहवोक्षिते ॥३१८॥ उपवीती युग्मतिथावनग्नः कामयेत्स्त्रियम् । पुत्रार्थी पुरुषस्त्यक्त्वा पौष्णमूलाहिपित्र्यभम् ॥३१९॥ प्रसिद्धे प्रथमे गर्भे तृतीये वा द्वितीयेके । मासे पुंसवनं कार्यं सीमंतं च यथा तथा ॥३२०॥ चतुर्थे मासिषष्ठे वाप्यष्टमे वा तदीश्वरे । बलोपपन्ने दंपत्योश्चंद्रताराबलान्विते ॥३२१॥ अरिक्तापर्वदिवसे कुजजीवाकँवासरे । तीक्ष्णमिश्रार्कवर्ज्येषु पुंभांशेराविनायके ॥३२२॥ शुद्धेऽष्टमे जन्मलग्नात्तद्योर्लग्ने न नैधने । शुभग्रहयुते दृष्टे पापद्दष्टिविवर्जिते ॥३२३॥ शुभग्रहेषु धीधर्मकेंद्रेष्वरिरिभ्रवे त्रिषु । पापेषु सत्सु चंद्रेशनिधनाद्यविवर्जिते ॥३२४॥ क्रूरग्रहाणामेकोपि लग्नादंत्यात्मजाष्टगः । सीमंतिनी वा तद्गर्भं बली हंति न संशयः ॥३२५॥ तस्मिञ्जन्ममुहूर्तेऽपि सूतकांतेऽपि वा शिशोः । जातकर्म प्रकर्तव्यं पितृपूजनपूर्वकम् ॥३२६॥ सूतकांते नामकर्म विधेयं तत्कुलोचितम् । नामपूर्वं प्रशस्तं स्यान्मंगलैः सुसमीक्षितैः ॥३२७॥ देशकालोपघाताद्यैः कालातिक्रमणं यदा । अनस्तगे भृगावीज्ये तत्कार्यं चोत्तरायणे ॥३२८॥ चरस्थिरमृदुक्षिप्रेनक्षत्रे शुभवासरे । चन्द्रताराबलोपेते दिवसे च शिशोः पितुः ॥३२६॥ गर्भाधान-संस्कार-मासिक धर्म के आरंभ से चार रात्रियां गर्भाधान में त्याज्य हैं । सम रात्रियों में जब चन्द्रमा विषमराशि और विषम नवमांश में हो, लग्न पर पुरुषग्रह (रवि, मंगल तथा वृहस्पति) की दृष्टि हो तो पुत्रार्थी पुरुष सम (२, ४, ६, ८, १०, १२) तिथियों में; रेवती, मूल, अश्लेषा और मघा इन नक्षत्रों को छोड़ कर अन्य नक्षत्रों में उपवीती और अनग्न (सवस्त्र) होकर स्त्री का संग करे ॥३१८-३१९॥ पुंसवन और सीमन्तोन्नयन - प्रथम गर्भ स्थिर हो जाने पर तृतीय या द्वितीय मास में पुंसवन कर्म करे । उसी प्रकार ४, ६ या ८वें मास में उस मास के स्वामी जब बली हों तथा स्त्री-पुरुष दोनों को चन्द्रमा और तारा का बल प्राप्त हो तो सीमन्त-कर्म करना चाहिए। रिक्ता तिथि और पर्व को छोड़कर अन्य तिथियों में, मंगल, बृहस्पति तथा रविवार में, तीक्ष्ण और मिश्र संज्ञक नक्षत्रों को छोड़कर अन्य नक्षत्रों में, जब चन्द्रमा विषमराशि और विषम राशि के नवमांश में हो, लग्न से अष्टम स्थान शुद्ध (ग्रहवर्जित) हो, स्त्री-पुरुष के जन्म-लग्न से अष्टम राशिलग्न न हो एवं शुभग्रह लग्न से ५, १, ४, ७, ९, १० में और पापग्रह ६, ११ तथा ३ में हों एवं चन्द्रमा १२, ८ तथा लग्न से अन्य स्थानों में हो तो पुंसवन और सीमन्तोन्नयन करने चाहिए ॥३२०-३२४॥ यदि एक भी बलवान् पापग्रह लग्न से १२, ५ और ८ भावों में हो तो वह सीमन्तिनी स्त्री अथवा उसके गर्भ का नाश कर देता है ॥३२५॥ जातकर्म और नामकर्म-जन्म के समय में ही जातकर्म कर लेना चाहिए । किसी प्रतिबन्धकवश उस समय न कर सके तो सूतक बीतने पर भी उक्त लग्न में पितरों का पूजन (नान्दीमुख श्राद्ध कर्म) करके बालक का जातकर्म-संस्कार अवश्य करना चाहिए एवं सूतक बीतने पर अपने कुल की रीति के अनुसार बालक का नामकरण-संस्कार भी करना चाहिए। भलीभांति विचार पूर्वक देवता आदि का वाचक, मंगलदायक एवं उत्तम नाम रखना चाहिए। यदि देशकालादि जन्म किसी प्रतिबन्ध से समय पर कर्म न हो सके तो समय के बाद जब गुरु और शुक्र का उदय हो, तब उत्तरायण में चर, स्थिर, मृदु और और क्षिप्र संज्ञक नक्षत्रों में शुभ- ग्रह के वार (सोम बुध, गुरु और शुक्र) में पिता और बालक के चन्द्रबल और ताराबल प्राप्त होने पर शुभ लग्न और शुभ नवांश में, लग्न से अष्टमभाव में कोई ग्रह न हो तब बालक का जातकर्म और नामकरण संस्कार करने चाहिए ॥३२६-३२९॥

४७० नारदीयपुराणम् शुभलग्ने शुभांशे च निधने शुद्धिसंयुते । षष्ठे मास्यष्टमे वापि पुंसां स्त्रीणां तु पञ्चमे ॥३३०॥ सप्तमे मासि वा कार्यं नवान्नप्राशनं शुभम् । रिक्तां दिनक्षयं नन्दां द्वादशीमष्टमीमथ ॥३३१॥ त्यक्त्वान्यतिथिषु प्रोक्तं प्राशनं शुभवासरे । चरस्थिरमृदुक्षिप्रनक्षत्रे शुभनेधने ॥३३२॥ दशमे शुद्धिसंयुक्ते शुभलग्ने शुभांशके । पूर्वाह्णे सौम्यखेटेन संयुक्तर्वीक्षितेऽपि वा ॥३३३॥ त्रिषष्टलाभगेः क्रूरैः केंद्रधीधर्मगैः शुभैः । व्ययारिनिधनस्थे च चन्द्रेऽन्नप्राशनंशुभम् ॥३३४॥ तृतीये पञ्चमे चाब्दे स्वकुलाचारतोऽपि वा । बालानां जन्मतश्चौल स्वगृह्योक्तविधानतः ॥३३५॥ सौम्यायने नास्तगयोः सुरारिसुरमन्त्रिणोः । अपूर्वरिक्तातिथेषु शुक्रज्येन्दुवासरे ॥३३६॥ दसादितीयज्वेंद्रेन्द्रयूपभानि शुभानि च । चौलकर्मणि हस्तर्क्षार्त्रीणित्रीणि च विष्णुभात् ॥३३७॥ पट्टबंधनचोलान्नप्राशने चोपनायने । शुभदं जन्मऋक्षमशुभं त्वन्यकर्मणि ॥३३८॥ अष्टमे शुद्धिसंयुक्ते शुभलग्ने शुभांशके । जन्माष्टमं शीतांशौ षष्ठाष्टांत्यविवर्जिते ॥३३८॥ धनत्रिकोणकेंद्रस्थैः शुभैह्यायारिगैः परैः । अभ्यक्ते सन्ध्ययोर्वारि निशि भुक्त्वा न वाहवे ॥३४०॥ नोत्कटे भूषिते नैव याने न नवमेऽह्नि च । क्षौरकर्म महीपानां पञ्चमेपञ्चमेऽहनि ॥३४१॥

अन्न-प्राशन--बालकों का जन्म से ६वें या ८वें मास में और बालिकाओं का जन्म से ५वें या ७वें मास में अन्नप्राशनकर्म शुभ होता है । परन्तु रिक्ता (४, ९, १४), तिथिक्षय, नन्दा (१, ६, ११), १२, ८--इन तिथियों को छोड़कर (अन्य तिथियों में) शुभ दिन में चर, स्थिर, मृदु और क्षिप्रसंज्ञक नक्षत्र में लग्न से अष्टम और दशम स्थान शुद्ध (ग्रहरहित) होने पर शुभ नवांशयुक्त शुभ राशिलग्न में, लग्न पर शुभग्रह का योग या दृष्टि होने पर जब पापग्रह लग्न से ३, ६, ११ भाव में और शुभग्रह १, ४, ७, १०, ५, ९, भाव में हों तथा चन्द्रमा १२, ६, ८ स्थान से भिन्न स्थान में हो तो पूर्वाह्न-समय में बालकों का अन्नप्राशन शुभ होता है ॥३३०-३३४॥ चूड़ाकरण--बालकों के जन्म समय से तीसरे या पाँचवें वर्ष में अथवा अपने कुल के आचार-व्यवहार के अनुसार अन्य वर्षमास में भी उत्तरायण में, जब गुरु और शुक्र उदित हों (अस्त न हों), पर्व तथा रिक्ता को छोड़कर अन्य तिथियों में, शुक्र, गुरु, सोमवार में, अश्विनी, पुनर्वसु, पुष्य, मृगशिरा, ज्येष्ठा, रेवती, हस्त, चित्रा, स्वाती, श्रवण, धनिष्ठा और शतभिषा--इन नक्षत्रों में अपने-अपने गृह्यसूत्र में बतायी गई विधि के अनुसार चूडा- करणकर्म करना चाहिए । राजाओं के पट्टबन्धन, बालकों के चूडाकरण, अन्नप्राशन और उपनयन में जन्म- नक्षत्र प्रशस्त होता है । अन्य कर्मों में जन्म-नक्षत्र अशुभ कहा गया है । लग्न से अष्टम स्थान शुद्ध हो, शुभ राशि लग्न हो, उसमें शुभग्रह का नवमांश हो तथा जन्मराशि या जन्मलग्न से अष्टम राशिलग्न न हो, चन्द्रमा लग्न से ६, ८, १२ स्थानों से भिन्न स्थानों में हो, शुभग्रह २, ५, ९, १, ४, ७, १० भाव में हों तथा पापग्रह ३, ६, ११ भाव में हों तो चूडाकरण कर्म प्रशस्त होता है ॥३३५-३३९॥

सामान्य क्षौरकर्म--तेल लगाकर तथा प्रातः और सायं संध्या के समय क्षौर नहीं कराना चाहिए । इसी प्रकार मंगलवार को तथा रात्रि में क्षौर का निषेध है । दिन में भी भोजन के बाद क्षौर नहीं करना चाहिए । युद्धयात्रा में भी क्षौर कराना वर्जित है । शय्या पर बैठकर या चन्दनादि लगाकर क्षौर नहीं कराना चाहिए । जिस दिन कहीं यात्रा करनी हो उस दिन भी क्षौर न कराये । राजाओं के लिए क्षौर कराने के बाद उसके ५वें ५वें दिन क्षौर कराने का विधान है । चूडाकरण में जो नक्षत्र-वार आदि कहे गये हैं, उन्हीं नक्षत्रों और वार आदि में अथवा कभी भी क्षौर में विहित नक्षत्र और वार के उदय (मुहूर्त एवं क्षण) में क्षौर कराना शुभ होता है ॥३४०-३४१॥

षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४७१ कर्तव्यं क्षौरनक्षत्रेऽप्यथ वास्योदये शुभम् । नृपविप्राज्ञया यज्ञे मरणे बन्धमोक्षणे ॥३४२॥ उद्वाहेऽखिलवारर्क्षतिथिषु क्षौरमिष्टदम् । कर्तव्यं मङ्गलेष्वादौ मङ्गलाय क्षुरार्पणम् ॥३४३॥ नवमे सप्तमे वापि पञ्चमे दिवसेऽपि वा । तृतीये बीजनक्षत्रे शुभवारे शुभोदये ॥३४४॥ सम्यग्गृहाण्यलंकृत्य वितानध्वजतोरणैः । आशिषो वाचनं कार्यं पुण्यं पुण्यांगनादिभिः ॥३४५॥ सहवादित्रनृत्याद्यैर्गत्वा प्रागुत्तरां दिशम् । तत्र मृदतस्ततीक्ष्णा गृहीत्वा पुनरागतः ॥३४६॥ मृण्मयेऽप्यथ वा वैणवेऽपि पात्रे प्रपूरयेत् । अनेकबीजसंयुक्तं तोयं पुष्पाभिशोभितम् ॥३४७॥ आधानादष्टमे वर्षे जन्मतॊ वाग्रजन्मनाम् । राज्ञामेकादशे मौंजीबंधनं द्वादशे विशाम् ॥३४८॥ जन्मतः पंचमे वर्षे वेदशास्त्रविशारदः । उपवीती यतः श्रीमान्कार्यं तत्रोपनयनम् ॥३४९॥ बालस्य बालहीनोऽपि सितो जीवः शुभप्रदः । यथोक्तवत्सरे कार्यमनुक्ते नोपनयनम् ॥३५०॥ दृश्यमानगुरौ शुक्रे शाखेशे चोत्तरायणे । वेदानामधिपा जीवशुक्रमौमबुधाः क्रमात् ॥३५१॥ शरद्ग्रीष्मवसंतेषु व्युत्क्रमात्तु द्विजन्मनाम् । मुख्यं साधारणं तेषां तपोमासादिपंचसु ॥३५२॥ स्वकुलाचारधर्मज्ञो माघमासे तु फाल्गुने । विधिज्ञश्चार्थवांश्चैते वेदवेदांगपारगः ॥३५३॥ क्षौर कर्म में विशेष—राजा अथवा ब्राह्मणों की आज्ञा से यज्ञ में, माता-पिता के मरण में, जेल से छूटने पर तथा विवाह के अवसर पर निषिद्ध नक्षत्र, वार एवं तिथि आदि में भी क्षौर कराना शुभप्रद कहा गया है । समस्त मंगल-कार्यों में, मंगलार्थ इष्ट देवता के समीप क्षुरों को अर्पण करना चाहिए ॥३४२-३४३॥ उपनयन—जिस दिन उपनयन का मुहूर्त स्थिर हो, उससे पूर्व ९वें, ७वें, ५वें या तीसरे दिन उपनयन के लिए विहित नक्षत्र (या उस नक्षत्र के मुहूर्त) में शुभवार और शुभ लग्न में अपने घरों को चंदोवा, पताका और तोरण आदि से अच्छी तरह अलंकृत करके, ब्राह्मणों द्वारा आशीर्वचन, पुण्याहवाचन आदि पुण्य कार्य कराकर सौभाग्यवती स्त्रियों के साथ, मांगलिक वाद्यों के सहित और मंगल-गान कराते हुए घर से पूर्वोत्तर-दिशा (ईशानकोण) में जाकर पवित्र स्थान से चिकनी मिट्टी खोदकर ले ले और पुनः उसी प्रकार गीत-वाद्य के साथ घर लौट आये । वहीं मिट्टी या बाँस के बर्तन में उस मिट्टी को रखकर उसमें अनेक वस्तुओं से युक्त और विविध पुष्पों से सुशोभित पवित्र जल डाले । (इसी प्रकार और भी अपने कुल के अनुरूप आचार का पालन करे) ॥३४४-३४७॥ गर्भाधान अथवा जन्म से आठवें वर्ष में ब्राह्मण बालकों का, ग्यारहवें वर्ष में क्षत्रिय-बालकों का और बारहवें वर्ष में वैश्य-बालकों का मौञ्जीबन्धन करना चाहिए ॥३४८॥ जन्म से पाँचवें वर्ष में यज्ञोपवीत-संस्कार करने पर बालक वेद-शास्त्र-विशारद तथा श्रीसम्पन्न होता है । इसलिए उसमें ब्राह्मण-बालक का उपनयन-संस्कार करना चाहिए ॥३४९॥ शुक्र और बृहस्पति निर्बल हों तब भी बालक के लिए शुभदायक होते हैं । अतः शास्त्रोक्त वर्ष में उपनयन-संस्कार करना चाहिए; अनुक्त वर्ष में नहीं ॥३५०॥ गुरु, शुक्र तथा अपने वेद की शाखा के स्वामी--ये दृश्य हों--अस्त न हुए हों, तब उत्तरायण में उपनयन-संस्कार करना उचित है। बृहस्पति, शुक्र, मंगल और बुध--ये क्रमशः ऋक्, यजुः, साम और अथर्ववेद के अधिपति हैं ॥३५१॥ शरद्, ग्रीष्म और वसन्त--ये व्युत्क्रम से द्विजातियों के उपनयन का मुख्य काल हैं अर्थात् शरद् ऋतु वैश्यों के, ग्रीष्म क्षत्रियों के और वसन्त ब्राह्मणों के उपनयन का मुख्य काल है। माघ आदि पांच मासों में उन सब के लिए उपनयन का साधारणकाल है ॥३५२॥ माघ मास में जिसका उपनयन हो वह अपने कुलोचित आचार तथा धर्म का ज्ञाता होता है । फाल्गुन में यज्ञोपवीत धारण करने वाला पुरुष विधिज्ञ तथा धनवान् होता है । चैत्र में उपनयन होने

४७२ नारदीयपुराणम् वैशाखे धनवान्वेदशास्त्रविद्याविशारदः । उपनीतो बलाढ्यश्च ज्येष्ठे विधिविदां वरः ॥३५४॥ शुक्लपक्षे द्वितीया च तृतीया पंचमी तथा । त्रयोदशी च दशमी सप्तमी व्रतबंधने ॥३५५॥ श्रेष्ठा त्वेकादशी षष्ठी द्वादश्यन्यास्तु मध्यमाः । कृष्णे द्वित्रिपुंसंख्याश्च मिथोऽन्या ह्यतिनिंदिताः ॥३५६॥ धिष्ण्यान्यर्कत्रयांतैज्यरुद्रादित्योत्तराणि च । विष्णूत्रयाश्विमित्राब्जयोनिभान्युपनायने ॥३५७॥ जन्मभाद्दशमं कर्म संघातक्षं तु षोडशम् । अष्टादशं समुदयं त्रयोविंशं विनाशनम् ॥३५८॥ मानसं पंचविंशक्षं नावरेच्छुभमेषु तु । आचार्यसौम्यकाव्यानां वाराः शस्ताः शशीनयोः ॥३५९॥ वारौ तु मध्यमौ चैव व्रतेऽन्यौ निंदितौ स्मृतौ । त्रिधा विभज्य दिवसं तत्रादौ कर्म दैविकम् ॥३६०॥ द्वितीये मानुषं कार्यं तृतीयेंशे च पैतृकम् । स्वनीचगे तदंशे वा स्वारिभे वा तदंशके ॥३६१॥ गुरुशिखिनोश्च शाखेशे कलाशीलविवर्जितः । स्वाधिशत्रुगृहस्थे वा तदंशस्थेऽथ वा व्रती ॥३६२॥ शाखेशे वा गुरौ शुक्रे महापातककृद्भवेत् । स्वोच्चसंस्थे तदंशे वा स्वराशौ राशिगे गणे ॥३६३॥ शाखेशे वा गुरौ शुक्रे केंद्रगे वा त्रिकोणगे । अतीव धनवांश्चैव वेदवेदांगपारगः ॥३६४॥

पर ब्रह्मचारी वेद-वेदांगों का पारगामी विद्वान् होता है ॥३५३॥ वैशाख मास में जिसका उपनयन हो, वह धनवान् तथा वेद, शास्त्र एवं विविध विद्याओं में निपुण होता है और ज्येष्ठ में यज्ञोपवीत लेने वाला द्विज विधिज्ञों में श्रेष्ठ और बलवान् होता है ॥३५४॥ शुक्ल पक्ष में द्वितीया, तृतीया, पञ्चमी, त्रयोदशी, दशमी और सप्तमी तिथियां यज्ञोपवीत संस्कार के लिए ग्राह्य हैं। एकादशी, षष्ठी और द्वादशी--ये तिथियां श्रेष्ठ हैं। शेष तिथियां मध्यम हैं। कृष्ण पक्ष में द्वितीया, तृतीया और पञ्चमी ग्राह्य हैं। अन्य तिथियां अत्यन्त निन्दित हैं ॥३५५-४५६॥ हस्त, चित्रा, स्वाती, रेवती, पुष्य, आर्द्रा, पुनर्वसु, तीनों उत्तरा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, अश्विनी, अनुराधा तथा रोहिणी-ये नक्षत्र, उपनयन-संस्कार के लिए उत्तम हैं ॥३५७॥ जन्मनाक्षत्र, से दसवाँ 'कर्म' संज्ञक है, तेईसवाँ 'विनाश' कारक है और पचीसवां 'मानस' है। इनमें शुभ कर्म का आरम्भ नहीं करना चाहिए। गुरु, बुध और शुक्र--इन तीनों के वार उपनयन में प्रशस्त हैं । सोमवार और रविवार ये मध्यम माने गये हैं। शेष दो वार मंगल और शनैश्चर निन्दित हैं। दिन के तीन भाग करके उसके आदि भाग में देवसम्बन्धी कर्म (यज्ञ-पूजनादि) करने चाहिए ॥३५८- ३६०॥ द्वितीय भाग में मनुष्य-सम्बन्धी कार्य (अतिथि-सत्कार आदि) करने का विधान है और तृतीय भाग में पैतृक कर्म (श्राद्धतर्पणादि) का अनुष्ठान करना चाहिए। गुरु, शुक्र और अपनी वैदिक शाखा के अधिपति अपनी नीच राशि में या उसके किसी अंश में स्थित हों अथवा अपने शत्रु की राशि में या उसके किसी अंश में स्थित हों उस समय यज्ञोपवीत लेने वाला द्विज कला और शील से हीन होता है। इसी प्रकार अपनी शाखा के अधिपति, गुरु एवं शुक्र यदि अपने अधिशत्रुगृह में या उसके किसी अंश में स्थित हों तो ब्रह्मचर्यव्रत (यज्ञोपवीत) ग्रहण करने वाला द्विज महापातकी होता है । गुरु, शुक्र एवं अपनी शाखा के अधिपति ग्रह यदि अपनी उच्च राशि या उसके किसी अंश में हों, अथवा केन्द्र (१, ४, ७, १०) या त्रिकोण (५, ९) में स्थित हों तो उस समय यज्ञोपवीत लेने वाला ब्रह्मचारी अत्यन्त धनवान् तथा वेद-वेदांगों में पारंगत विद्वान् होता है ॥३६१-३६४॥

परमोच्चगते जीवे शाखेशो वाथ वा सिते । व्रती विशुद्धे निधने वेदशास्त्रविशारदः ॥३६५॥ स्वाधिमित्रगृहस्थे वा तस्योच्चस्थे तदंशगे । गुरौ भृगौ वा शाखेशे विद्याधनसमन्वितः ॥३६६॥ शाखाधिपतिवारश्च शाखाधिपबलं शिशोः । शाखाधिपतिलग्नं च दुर्लभं त्रितयं व्रते ॥३६७॥ तस्माद्वेद्धांशगे चंद्रे व्रती विद्याविशारदः । पापांशगे स्वांशगे वा दरिद्रो नित्यदुःखितः ॥३६८॥ श्रवणादिनि नक्षत्रे कर्कांशस्थे निशाकरे । तदा व्रती वेदशास्त्रधनधान्यसमृद्धिमान् ॥३६६॥ शुभलग्ने शुभांशे च नैधने शुद्धिसंयुते । लग्ने तु निधने सौम्यैः संयुते वा निरीक्षिते ॥३७०॥ इष्टैर्जीवार्कचंद्राद्यैः पंचभिर्बलिसंग्रहैः । स्थानादिबलसम्पूर्णैश्चतुर्भिर्वा शुभान्वितैः ॥३७१॥ ईक्षनैवालैकविंशमहादोषविवर्जिते । राशयः सकलाः श्रेष्ठाः शुभग्रहयुतेक्षिताः ॥३७२॥ शुभनवांशकगता ग्राह्यास्ते शुभराशयः । न कदाचित्कर्कटांशशुभेक्षितयुतोऽपि वा ॥३७३॥ तस्माद्गोमिथुनांशाश्च तुलाकन्यांशकाः शुभाः । एवंविधे लग्नगते नवांशे व्रतमोरितम् ॥३७४॥ त्रिषडायगतैः पापैः षडष्टांत्यविवर्जितैः । शुभैः षष्ठाष्टलग्नांत्यवर्जितेन हिमांशुना ॥३७५॥ स्वोच्चसंस्थोऽपि शीतांशु र्व्रतिनो यदि लग्नाः । स करोति शिशुं निःस्वं सर्वतः क्षयरोगिणम् ॥३७६॥ स्फूर्जिते केंद्रगे भानौ व्रतिनां पितृनाशनम् । पंचदोषोनितं लग्नं शुभदं चोपनायने ॥३७७॥

यदि गुरु, शुक्र अथवा शाखाधिपति परमोच्च स्थान में हों और मृत्यु (आठवां) स्थान शुद्ध हो तो उस समय ब्रह्मचर्यव्रत ग्रहण करने वाला द्विज वेद-शास्त्र में निष्णात होता है ॥३६५॥ गुरु, शुक्र अथवा शाखा- धिपति यदि अपने अधिमित्रगृह में या उसके उच्च गृह में अथवा उसके अंश में स्थित हों तो यज्ञोपवीत लेने वाला ब्रह्मचारी विद्या तथा धन से सम्पन्न होता है ॥३६६॥ शाखाधिपति का दिन हो, बालक को शाखाधिपति का बल प्राप्त हो तथा शाखाधिपति का लग्न हो—ये तीन बातें उपनयन संस्कार में दुर्लभ हैं ॥३६७॥ उससे चतुष्र्थांश में चन्द्रमा हो तो यज्ञोपवीत लेने वाला बालक विद्या में निपुण होता है; किन्तु यदि वह पापग्रह के अंश में अथवा अपने अंश में हो तो यज्ञोपवीती द्विज सदा दरिद्र और दुःखो रहता है ॥३६८॥ जब श्रवणादि नक्षत्र में विद्यमान चन्द्रमा कर्क के अंश-विशेष में स्थित हो तो ब्रह्मचर्यव्रत ग्रहण करने वाला द्विज वेद, शास्त्र तथा धनधान्य से सम्पन्न होता है ॥३६९॥ शुभ लग्न हो, शुभ ग्रह का अंश हो, मृत्युस्थान शुद्ध हो तथा लग्न और मृत्युस्थान शुभग्रहों से युक्त हो अथवा उन पर शुभग्रहों की दृष्टि हो, लग्न अभीष्ट स्थान में स्थित बृहस्पति, सूर्य और चन्द्रमा आदि पाँच बलवान् ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो अथवा स्थान आदि के बल से पूर्ण चार ही शुभग्रहयुक्त ग्रहों द्वारा लग्नस्थान देखा जाता हो, ओर वह इक्कीस महादोषों से रहित हो तो यज्ञोपवीत लेना शुभ है। शुभग्रहों से संयुक्त या दृष्ट सभी राशियाँ शुभ हैं ॥३७०-३७२॥ वे शुभ राशियां शुभ ग्रह के नवमांश हों तो व्रतबंध में ग्राह्य हैं; किन्तु कर्क राशि का अंश शुभग्रह से युक्त तथा दृष्ट हो तो भी कभी ग्रहण करने योग्य नहीं है ॥३७३। इसलिए वृष और मिथुन के अंश तथा तुला और कन्या के अंश शुभ हैं। इस प्रकार लग्नगत नवांश होने पर व्रतबन्ध उत्तम बताया गया है ॥३७४॥ तीसरे, छठे और ग्यारहवें स्थान में पापग्रह हों, छठा, आठवाँ और बारहवां स्थान शुभग्रह रहित और चन्द्रमा छठे, आठवें, लग्न तथा बारहवें स्थान में न हों तो उपनयन शुभ होता है ॥३७५॥ चन्द्रमा अपने उच्च स्थान में होकर भी यदि व्रतबन्ध-मुहूर्त्त-सम्बन्धी लग्न में स्थित हो तो वह उस बालक को निर्धन और क्षय का रोगी बना देता है ॥३७६॥ यदि सूर्य केन्द्र-स्थान में प्रकाशित हों तो यज्ञोपवीत लेने वाले के पिता का नाश हो जाता है। पांच दोषों से रहित लग्न उपनयन में

६० ना० पृ०

४७४ नारदीयपुराणम् विनावसंतऋतुना कृष्णपक्षे गलग्रहे । अनध्याये विष्टिषष्ठ्योर्न तु संस्कारमर्हति ॥३७८॥ त्रयोदश्यादिचत्वारि सप्तम्यादिदिनत्रयम् । चतुर्थी वा शभाः प्रोक्ता अष्टाविते गलग्रहाः ॥३७९॥ क्षुरिकाबंधनं वक्ष्ये नृपाणां प्राक्शरग्रहात् । विवाहोक्तेषु मासेषु शुक्लपक्षेऽप्यनस्तगे ॥३८०॥ जीवे शुक्रे च भूसूनौ चंद्रताराबलान्विते । मौजीबंधोक्ततिथिषु कुजवर्जितवासरे ॥३८१॥ नचेन्नवांशके कर्तुरष्टमोदयवर्जिते । शुद्धेऽष्टमे विधौ लग्ने षष्ठाष्टांत्यविवर्जिते ॥३८२॥ धनत्रिकोणकेंद्रस्थैः शुभैस्त्र्यायारिगैः परैः । क्षुरिकाबंधनं कार्यमर्चयित्वामरान्नितॄन् ॥३८३॥ अर्चयेत्क्षुरिकां सम्यग्देवतानां च सन्निधौ । ततः सुलग्ने बध्नीयात्कट्यां लक्षणसंयुताम् ॥३८४॥ आयामार्द्धाप्रविस्तारप्रमाणेनैवच्छेदयेत् । तच्छेदखंडाश्चायाः स्युर्ध्वजाये रिपुनाशनम् ॥३८५॥ धूम्राये मरणं सिंहे जयः शुनि च रोगिता । धनलाभो वृषेऽत्यंतं दुःखी भवति गर्दभे ॥३८६॥ गजायेऽत्यंत संप्रीतिर्ध्वांक्षे वित्तविनाशनम् । खड्गपुत्रिकयोर्मानं गणयेत्स्वांगुलेन तु ॥३८७॥ मानांगुलेषु पर्यायामेकादशमितां त्यजेत् । शेषाणामंगुलीनां च फलानि स्युर्यथाक्रमम् ॥३८८॥ पुत्रलाभः शत्रुवधः स्त्रीलाभो गमनं शुभम् । अर्थहानिश्चार्थवृद्धिः प्रीतिसिद्धिर्जयः स्तुतिः ॥३८९॥

शुभदायक होता है ॥३७७॥ वसन्त ऋतु के सिवा और सभी कृष्णपक्ष में, गलग्रह में, अनध्याय के दिन, भद्रा में तथा षष्ठी को बालक का उपनयन-संस्कार नहीं होना चाहिए ॥३७८॥ त्रयोदशी से लेकर चार, सप्तमी से लेकर तीन दिन और चतुर्थी से आठ गलग्रह अशुभ कहे गये हैं ॥३७९॥ क्षुरिका-बन्धनकर्म--अब मैं क्षत्रियों के लिए क्षुरिकाबन्धन कर्म का वर्णन करूँगा जो विवाह के पहले सम्पन्न होता है। विवाह के लिए कहे हुए मासों में, शुक्लपक्ष में, जब कि बृहस्पति, शुक्र और मंगल अस्त न हों, चन्द्रमा और तारा का बल प्राप्त हो, उस समय मौञ्जी बन्धन के लिए कही गयी तिथियों में, मंगलवार के अतिरिक्त शेष सभी दिनों में यह कर्म किया जाता है। कर्ता का लग्नगत नवांश यदि अष्टमोदय से रहित न हो, अष्टम शुद्ध हो; चन्द्रमा छठे, आठवें और बारहवें में न होकर लग्न में स्थित हों; शुभग्रह दूसरे, पाँचवें, नवें, लग्न, चतुर्थ, सप्तम और दशम स्थानों में हो; पापग्रह तीसरे, ग्यारहवें और छठे स्थान में हों तो देवताओं और पितरों की पूजा करके क्षुरिकाबन्धन करना चाहिए ॥३८०-३८३॥ पहले देवताओं के समीप क्षुरिका (कटार) की भली भाँति पूजा करे। तत्पश्चात् शुभलक्षणों से युक्त उस क्षुरिका को उत्तम लग्न में अपनी कटि में बाँधे ॥३८४॥ क्षुरिका की लम्बाई के आधे (मध्यभाग) पर जो विस्तारमान हो उससे क्षुरिका के विभाग करे। वे छेदखण्ड (विभाग) क्रम से ध्वज आदि आय कहलाते हैं। उनकी आठ संज्ञायें हैं--ध्वज, धूम्र, सिंह, श्वा, वृष, गर्दभ, गज और ध्वांक्ष। ध्वज नामक आय में शत्रु का नाश होता है ॥३८५॥ धूम्र आय में घात, सिंह नामक आय में जय, श्वा नामक आय में रोग, वृष आय में धनलाभ, गर्दभ आय में अत्यन्त दुःख की प्राप्ति, गज आय में अत्यन्त प्रसन्नता और ध्वांक्ष नामक आय में धन का नाश होता है। खड्ग और छुरी के माप को अपने अंगुल से गिने ॥३८६-३८७॥ माप के अंगुलों में से ग्यारह से अधिक हो तो ग्यारह घटा दें। फिर शेष अंगुलों के क्रमशः फल इस प्रकार हैं--॥३८८॥ पुत्रलाभ, शत्रुवध, स्त्रीलाभ, शुभगमन, अर्थहानि, अर्थवृद्धि, प्रीति, सिद्धि, जय और स्तुति ॥३८९॥

षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४७५ स्थितो ध्वजे वृषाद्ये वा नष्टाचेत्पूर्वतो व्रणम् । सिंहे गजे मध्यभागे त्वंतभागे श्वकोकयोः ॥३९०॥ धूम्रगर्दभयोर्नैव व्रणं श्रेयोऽथभागम् । अथोत्तरायणे शुक्रजीवयोर्दृश्यमानयोः ॥३९१॥ द्विजातीनां गुरोर्गेहान्निवृत्तानां यतात्मनाम् । चित्रोत्तरादितीज्यांत्यहरिमित्रविधातृषु ॥३९२॥ मेष्वर्कबुद्धेज्याशुकवारलग्नांशकेषु च । प्रतिपत्पर्वरिक्ताभा चाष्टमी च दिनत्रयम् ॥३९३॥ हित्वाऽन्यदिवसे कार्यं समावर्तनमुंडनम् । सर्वाश्रमाणां विप्रेन्द्र ह्युत्तमोऽयं गृहाश्रमः ॥३९४॥ सुखं तत्रापि भामिन्यां शीलवत्यां स्थितं ततः । तस्याः सच्छीललब्धिस्तु सुलग्नवशतः खलु ॥३९५॥ पितामहोक्तं संवीक्ष्य लग्नशुद्धिं प्रवक्ष्यहम् । पुण्येऽह्नि लक्षणोपेतं सुखासीनं सुचेतसम् ॥३९६॥ प्रणम्य दैवज्ञेट्वृच्छेद् दैवं भक्तिपूर्वकम् । तांबूलफलपुष्पाद्यैः पूर्णांजलिशिवागतः ॥३९७॥ तत्र चेल्लग्नगः क्रूरस्तस्मात्सप्तमगः कुजः । दंपत्योर्मरणं वाच्यं वर्षाणामष्टकात्पुरा ॥३९८॥ यदि लग्नगतश्चंद्रस्तस्मात्सप्तमगः कुजः । विज्ञेयं भर्तृमरणमष्टवर्षांतरे बुधैः ॥३९९॥ लग्नात्पंचमगः पापः शत्रुदृष्टश्च नीचगः । मृतपुत्राथ वा कन्या कुलटा वा न संशयः ॥४००॥ छुरी या तलवार में यदि ध्वज अथवा वृष आयविभाग के पूर्वभाग में नष्ट हो, तथा सिंह और गज-आय के मध्यभाग में तथा श्वान और काक-आय के अन्तिम भाग में एवं धूम्र और गर्दभ आय के अन्तिम भाग में नष्ट हो जाय तो अशुभ होता है । (अतः ऐसी छुरी या तलवार का परित्याग कर देना चाहिए; यह बात अर्थतः सिद्ध हो जाती है) ॥३९०३॥ समावर्तन -- उत्तरायण में जब गुरु और शुक्र दोनों उदित हों, चित्रा, उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराषाढ़, उत्तर भाद्रपद, पुनर्वसु, पुष्य, रेवती, श्रवण, अनुराधा, रोहिणी--ये नक्षत्र हों तथा रवि, सोम, बुध, गुरु और शुक्रवार में से कोई वार हो तो इन्हीं रवि आदि पांच ग्रहों की राशि, लग्न और नवमांश में, प्रतिपदा, पर्व, रिक्ता, अमावास्या तथा सप्तमी से तीन तिथि - इन सब तिथियों को छोड़कर अन्य तिथियों में गुरुकुल से अध्ययन समाप्त करके घर को लौटने वाले जितेन्द्रिय द्विजकुमार का समावर्तन-संस्कार (मुण्डन, हवन आदि) करना चाहिए ॥३९१-३९३३॥ विवाह कथन--विप्रवर; सब आश्रमों में यह गृहस्थाश्रम ही श्रेष्ठ है। उसमें भी जब सुशीला धर्मपत्नी हो तभी सुख होता है। स्त्री को सुशीलता की प्राप्ति तभी होती है जब विवाह कालिक लग्न शुभ हो । इसलिए मैं ब्रह्मा द्वारा कथित लग्न-शुद्ध को विचार करके कहता हूँ ॥३९४-३९५३॥ कन्यादान करने वालों को किसी शुभ दिन को अपनी अंजलि में पान, फूल, फल और द्रव्य आदि लेकर ज्योतिष शास्त्र के ज्ञाता, समस्त शुभ लक्षणों से सम्पन्न, प्रसन्नचित तथा सुखपूर्वक बैठे हुए विद्वान् ब्राह्मण के समीप जाकर और उन्हें देवता के समान मानकर भक्तिपूर्वक प्रणाम करके अपनी कन्या के विवाह-लग्न के विषय में पूछना चाहिए ॥३९६-३९७॥ ज्योतिषी को उस समय लग्न और ग्रह स्पष्ट करके देखना चाहिए । यदि प्रश्न-लग्न में पापग्रह हो या लग्न से सप्तम भाव में मंगल हो तो जिसके लिए प्रश्न किया गया है, उस कन्या और वर को ८ वर्ष के भीतर ही घातक अरिष्ट प्राप्त होगा, ऐसा समझना चाहिए। यदि लग्न में चन्द्रमा और उससे सप्तम भाव में मंगल हो तो ८ वर्ष के भीतर ही उस कन्या के पति को घातक कष्ट प्राप्त होगा, ऐसा समझना चाहिए। यदि लग्न से पंचम भाव में पापग्रह हो और वह नीचराशि में पापग्रह से देखा जाता हो तो वह कन्या कुलटा स्वभाववाली अथवा मृतवत्सा होती है, इसमें संशय नहीं ॥३९८-४००॥ यदि प्रश्नलग्न से ३, ५, ७, ११ और १०वें भाव

४७६ नारदीयपुराणम् तृतीयपंचसप्ताष्टकर्मगो वा निशाकरः । लग्नात्करोति संबंधं दंपत्योर्गु रुवीक्षितः ॥४०१॥ तुलागोकर्कटा लग्नसंस्थाः शुक्रेन्दुसंयुताः । वीक्षिताः पृच्छतां नृणां कन्यालाभो भवेत्तदा ॥४०२॥ स्त्रीद्रेष्काणः स्त्रीनवांशो युग्मलग्नं समागतम् । वीक्षितं चंद्रशुक्राभ्यां कन्यालाभो भवेत्तदा ॥४०३॥ एवं स्त्रीणां भर्तृ लब्धिः पुंलग्ने पुंनवांशके । पृच्छकस्य भवेल्लग्नं पुंग्रहैरवलोकितम् ॥४०४॥ कृष्णपक्षे प्रश्नलग्नाद्यस्यराशी शशी यदा । पापद्दष्टोऽथ वा रंध्रे न संबंधो भवेत्तदा ॥४०५॥ पुण्यैर्निमित्तशकुनैः प्रश्नकाले तु मंगलम् । दंपत्योरशुभैरेतैरशुभं सर्वतो भवेत् ॥४०६॥ पंचांगशुद्धिदिवसे चंद्रताराबलान्विते । विवाहभक्ष्योदये वा कन्यावरणमन्वयैः ॥४०७॥ भूषणैः पुष्पतांबूलफलैर्गंधाक्षतादिभिः । शुक्लांबरैर्गीतवाद्यैर्विप्रनाशीर्वचनैः सह ॥४०८॥ कारयेत्कन्यकागेहे वरः प्रणवपूर्वकम् । तदा कुर्यात्पिता तस्याः प्रदानं प्रीतिपूर्वकम् ॥४०९॥ कुलशीलवयोरूपवित्तविद्यायुताय च । वराय च रूपवतीं कन्यां दद्याद्यवीयसीम् ॥४१०॥ संपुज्य प्रार्थयित्वा च शचीं देवीं गुणाश्रयाम् । त्रैलोक्यसुन्दरीं दिव्यगंधमाल्यांबरावृताम् ॥४११॥ सर्वरक्षणसंयुक्तां सर्वाभरणभूषिताम् । अनर्घमणिमालाभिर्भासयंतीं दिगंतरान् ॥४१२॥ में चन्द्रमा हो तथा उस पर गुरु की दृष्टि हो तो समझना चाहिए कि उस कन्या को शीघ्र ही पति प्राप्त होगा ॥४०१॥ यदि प्रश्नलग्न में तुला, वृष या कर्क राशि हो तथा वह शुक्र और चन्द्रमा से युक्त हो तो वर के लिए कन्या (पत्नी) लाभ होता है। अथवा सम राशि लग्न हो, उसमें समराशिका ही द्रेष्काण हो और समराशि का नवमांश तथा उस पर चन्द्रमा और शुक्र की दृष्टि हो तो वर को पत्नी की प्राप्ति होती है ॥४०२-४०३॥ इसी प्रकार यदि प्रश्नलग्न में पुरुषराशि और पुरुषराशि का नवमांश हो तथा उस पर पुरुषग्रह (रवि, मंगल और गुरु) की दृष्टि हो तो जिसके लिये प्रश्न किया गया है, उस कन्या को पति की प्राप्ति होती है ॥४०४॥ यदि प्रश्नसमय में कृष्णपक्ष हो और चन्द्रमा समराशि में होकर लग्न से छठे या आठवें भाव में पापग्रह से देखा जाता हो तो (निकट भविष्य में) विवाह-सम्बन्ध नहीं हो पाता है ॥४०५॥ यदि प्रश्नकाल में शुभ निमित्त और शुभ शकुन देखने सुनने में आयें तो वर-कन्या के लिए शुभ होता है तथा यदि निमित्त एवं शकुन आदि अशुभ हों तो अशुभ फल होता है ॥४०६॥ कन्या वरण- पंचांग (तिथि, वार, नक्षत्र, योग, करण) से शुद्ध दिन में यदि वर और कन्या के चन्द्रबल तथा ताराबल प्राप्त हों तो विवाह के लिए विहित नक्षत्र या उसके मुहूर्त में वर को चाहिए कि अपने कुल के श्रेष्ठ जनों के साथ गीत, वाद्य की ध्वनि और ब्राह्मणों के आशीर्वाद (शान्तिमन्त्रपाठ) आदि से युक्त होकर विविध आभूषण, शुभ वस्त्र, फूल, फल, पान, अक्षत, चन्दन और सुगन्धादि लेकर कन्या के घर में जाय और विनीत भाव से कन्या का वरण करे । (कन्या का वरण वर के बड़े भाई अथवा गुरुजन को करना चाहिए) उसके बाद कन्या का पिता प्रसन्नचित्त होकर अभीष्ट वर को कन्या दान करे ॥४०७-४०९॥ कन्या के पिता को चाहिए कि अपनी कन्या से श्रेष्ठ, कुल, शील, वयस्, रूप, धन और विद्या से युक्त वर को वर की अवस्था में छोटी, रूपवती अपनी कन्या प्रदान करे । कन्यादान से पूर्व सब गुणों की आश्रयभूता, तीनों लोकों में सबसे अधिक सुन्दरी, दिव्य गन्ध, माला और वस्त्र से सुशोभित, सम्पूर्ण शुभ लक्षणों से युक्त तथा सब आभूषणों से मण्डित, अमूल्य मणिमालाओं से दसों दिशाओं को प्रकाशित करती हुई, सहल दिव्य

षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४७७ विलासिनीसहस्राद्यैः सेवमानामर्हनिशम्। एवंविधां कुमारीं तां पूजांते प्रार्थयेदिति ॥४१३॥ देवींद्राणि नमस्तुभ्यं देवेंद्रप्रियभामिनि । विवाहे भाग्यमारोग्यं पुत्रलाभं च देहि मे ॥४१४॥ युग्मेऽब्दे जन्मतः स्त्रीणां प्रीतिदं पाणिपीडनम् । एतत्पुंसामयुग्मेऽब्दे व्यत्ययेनाशनम् तयोः ॥४१५॥ माघफाल्गुनवैशाखज्येष्ठमासाः शुभप्रदाः । मध्यमा कार्तिको मार्गशीर्षो वै निंदिताः परे ॥४१६॥ न कदाचिद्दिशर्क्षेषु भानोरार्द्राप्रवेशनात् । विवाहो देवतानां च प्रतिष्ठां चोपनयनम् ॥४१७॥ नास्तंगते सिते जीवे न तयोर्बालवृद्धयोः । न गुरौ सिंहराशिस्ये सिंहांशकगतेऽपि वा ॥४१८॥ पश्चात्प्रागुदितः शुक्नो दशत्रिदिवसं शिशुः । वृद्धः पंचदिनं पक्षं गुरुः पक्षं च सर्वतः ॥४१९॥ अप्रबुद्धो हृषीकेशो यावत्तावन्न मंगलम् । उत्सवे वासुदेवस्य दिवसे नान्यमंगलम् ॥४२०॥ न जन्ममासे जन्मर्भे न जन्मदिवसेऽपि च । आद्य गर्भसुतस्याथ दुहितुर्वा करग्रहः ॥४२१॥ नैवोद्वाहो ज्येष्ठ पुत्रीपुत्रयोश्च परस्परम् । ज्येष्ठमासे तयोरेकज्येष्ठे श्रेष्ठश्च नान्यथा ॥४२२॥ सहेलियों से सुसेविता सर्वगुणसम्पन्ना इन्द्राणी देवी की पूजा करके उनसे प्रार्थना करे—'हे देवि ! हे इन्द्राणि ! हे देवेन्द्रप्रियभामिनि ! आपको मेरा नमस्कार है। देवि ! इस विवाह में आप सौभाग्य, आरोग्य और पुत्र प्रदान करें।' इस प्रकार प्रार्थना करके पूजा के वाद विधानपूर्वक गुणयुक्त वर को अपनी कुमारी कन्या का दान करे ॥४१०-४१४॥ कन्या-वर को वर्षशुद्धि--कन्या के जन्म-समय से सम वर्षों में और वर के जन्मसमय से विषम वर्षों में होने वाला विवाह उन दोनों के प्रेम और प्रसन्नता को बढ़ाने वाला होता है। इससे विपरीत (कन्या के विषम और वर के सम वर्ष में) विवाह वर-कन्या दोनों के लिए घातक होता है ॥४१५॥ विवाहविहित मास—माघ, फाल्गुन, वैशाख और ज्येष्ठ--ये चार मास विवाह में श्रेष्ठ तथा कार्तिक और मार्गशीर्ष ये दो मास मध्यम हैं। अन्य मास निन्दित हैं ॥४१६॥ सूर्य जब आर्द्रा नक्षत्र में प्रवेश करे तब से दस नक्षत्र तक (अर्थात् आर्द्रा से स्वाती तक के नक्षत्रों में जब तक सूर्य रहें तब तक) विवाह, देवता की प्रतिष्ठा और उपनयन नहीं करने चाहिए। बृहस्पति और शुक्र जब अस्त हों, बाल अथवा वृद्ध हों तथा केवल बृहस्पति सिंह राशि या उसके नवमांश में हों, उस समय भी ऊपर कहे हुए शुभ कार्य नहीं करने चाहिए ॥४१७-४१८॥ गुरु तथा शुक्र के बाल्य और वृद्धत्व--शुक्र जब पश्चिम में उदय होता है तो दस दिन और पूर्व में उदय होता है तो तीन दिन तक बालक रहता है तथा जब पश्चिम में अस्त होने को रहता है तो अस्त से पाँच दिन पहले और पूर्व में अस्त होने से पन्द्रह दिन पहले वृद्ध हो जाता है। गुरु उदय के बाद पन्द्रह दिन बालक और अस्त से पहले पन्द्रह दिन वृद्ध रहता है ॥४१९॥ जब तक भगवान् हृषीकेश शयनावस्था में हों तब तक (अर्थात् आषाढ़-शुक्ला एकादशी से कार्तिक- शुक्ला-एकादशी तक) तथा भगवान् के उत्सव (उत्थान या जन्मदिन) में भी अन्य मंगलकार्य नहीं करने चाहिए ॥४२०॥ पहले गर्भ के पुत्र और कन्या के जन्ममास, जन्मनक्षत्र और जन्मतियिवार में भी विवाह नहीं करना चाहिए। आद्य गर्भ की कन्या और आद्य गर्भ के वर का परस्पर विवाह नहीं करना चाहिए। वर-कन्या में कोई एक ही ज्येष्ठ (आद्य गर्भ का) हो तो ज्येष्ठ मास में विवाह श्रेष्ठ है। यदि दोनों ज्येष्ठ हों तो ज्येष्ठ मास में विवाह अनिष्टकारक कहा गया है ॥४२१-४२२॥

४७८ नारदीयपुराणम् उत्पातग्रहणादूर्ध्वं सप्ताहमाखिलग्रहे । नाखिले त्रिदिनं नेष्टं त्रिद्युस्पृक् च क्षयं तथा ॥४२३॥ ग्रस्तास्ते त्रिदिनं पूर्वं पश्चाद्ग्रस्तोदयेऽथवा । संध्यायां त्रिदिनं तद्वन्निशीथे सप्त एव च ॥४२४॥ मासान्ते पंच दिवसांस्त्यजेद्रिक्तां तथाष्टमीम् । व्यतीपातं वैधृतिं च संपूर्णं परिघार्द्धकम् ॥४२५॥ पौष्णभदृगुत्तरामैत्रमरुच्चंद्राकं पित्र्यभैः । समूलभैरविद्धैस्तैः स्वीकरग्रह इष्यते ॥४२६॥ विवाहे बलमावश्यं दंपत्योर्गुरुसूर्ययोः । चेत्पूजा यत्नतः कार्या दुर्बलग्रहयोस्तयोः ॥४२७॥ गोचरं वेधजं चाष्टवर्गजंरूपजं बलम् । यथोत्तरं बलाधिक्यं स्थूलं गोचरमार्गजम् ॥४२८॥ चंद्राताराबलं वीक्ष्य ततः पंचांगजं बलम् । तिथिरेकगुणा वारो द्विगुणस्त्रिगुणं च भम् ॥४२९॥ योगश्चतुगु णः पञ्चगुणः तिथ्यर्द्धसंज्ञितम् । ततो मुहूर्तो बलवांस्ततो लग्नंबलाधिकम् ॥४३०॥ ततो बलवती होरा द्रेष्काणो बलवांस्ततः । ततो नवांशो बलवान्द्वादशांशो बली ततः ॥४३१॥ त्रिंशांशो बलवांस्तस्माद्वीक्ष्यमेतद्बलाबलम् । शुभेक्षितयुताः शस्ता उद्वाहेऽखिलराशयः ॥४३२॥ चंद्राकॅज्यादयः पंच यस्य राशेस्तु खेचराः । इष्टस्तच्छुभदं लग्नं चत्वारोऽपि बलान्विताः ॥४३३॥

**विवाह में वर्ज्य--**भूकम्पादि उत्पात तथा सर्वग्रास सूर्यग्रहण या चन्द्रग्रहण हो तो उसके बाद सात दिन तक का समय शुभ नहीं है। यदि खण्डग्रहण हो तो उसके बाद तीन दिन अशुभ होते हैं। तीन दिन का स्पर्श करने वाली (वृद्धि) तिथि, क्षयतिथि तथा ग्रस्तास्त (ग्रहण लगे चन्द्र, सूर्य का अस्त) हो तो पूर्व के तीन दिन अच्छे नहीं माने जाते। यदि ग्रहण लगे हुए सूर्य, चन्द्र का उदय हो तो बाद के तीन दिन अशुभ होते हैं । संध्या समय में ग्रहण हो तो पहले और बाद के भी तीन दिन अनिष्टकारक हैं तथा मध्यरात्रि में ग्रहण हो तो सात दिन (तीन पहले के और तीन बाद के तथा एक ग्रहण वाला दिन) अशुभ होते हैं ॥४२३-४२४॥ मास के अन्तिम दिन, रिक्ता, अष्टमी, व्यतीपात ओर वैधृतियोग सम्पूर्ण तथा परिघ योग का पूर्वार्ध--ये विवाह में वर्जित हैं ॥४२५॥ **विहित नक्षत्र--**रेवती, रोहिणी, तीनों उत्तरा, अनुराधा, स्वाती, मृगशिरा, हस्त, मघा और मूल-- ये ग्यारह नक्षत्र वेधरहित हों तो इन्हीं में स्त्री का विवाह शुभ कहा गया है ॥४२६॥ विवाह में वर को सूर्य का और कन्या को बृहस्पति का बल अवश्य प्राप्त होना चाहिए। यदि ये दोनों अनिष्टकारक हों तो यत्नपूर्वक इनकी पूजा करनी चाहिए ।॥४२७॥ गोचर, वेध और अष्टकवर्गसम्बन्धी बल उत्तरोत्तर अधिक है। इसलिए गोचरबल स्थूल (साधारण) माना जाता है। अर्थात् ग्रहों का अष्टकवर्ग-बल ग्रहण करना चाहिए । प्रथम तो वर-कन्या के चन्द्रबल और ताराबल देखने चाहिए। उसके बाद पंचांग (तिथि, वार आदि) के बल देखे । तिथि में एक, वार में दो, नक्षत्र में तीन, योग में चार और करण में पांच गुने बल होते हैं। इन सब की अपेक्षा मुहूर्त बली होता है। मुहूर्त से भी लग्न, लग्न से भी होरा (राश्यर्ध), होरा से द्रेष्काण, द्रेष्काण से नवमांश, नवमांश से भी द्वादशांश तथा उससे भी विंशांश बली होता है । इसलिए इन सबके बल देखने चाहिए ॥४२८-४३१॥ विवाह में शुभग्रह से युक्त या दृष्ट होने पर सभी राशियां प्रशस्त हैं। चन्द्रमा, सूर्य, बुध, बृहस्पति तथा शुक्र आदि पाँच ग्रह जिस राशि के इष्ट हों, वह लग्न शुभप्रद होता है। यदि चार ग्रह भी बली हों तो भी उन्हें शुभप्रद ही समझना चाहिए ॥४३२-४३३॥

षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४७६ जामित्रशुद्ध्यैकविंशन्महादोषविवर्जितम् । एकविंशतिदोषाणां नामरूपफलानि च ॥४३४॥ वक्ष्यतेऽत्र समासेन शृणु नारद सांप्रतम् । पञ्चांगशुद्धिराहित्यं दोषस्त्वाद्यः प्रकीर्तितः ॥४३५॥ उदयास्तशुद्धिहीनिद्वितीयः सूर्यसंक्रमः । तृतीयः पापषड्वर्गो भृगुः षष्ठः कुजोऽष्टमः ॥४३६॥ गंडांतं कर्तरी रिष्फषडष्टेष्वनुगतो ग्रहः । दंपत्योरष्टमं लग्नं राशिविषघटी तथा ॥४३७॥ दुर्मुहूर्तो वारदोषः खार्जूरिकसमाङ्घ्रिभम् । ग्रहणोत्पातभं क्रूरविद्धक्षं क्रूरसंयुतम् ॥४३८॥ कुनवांशो महापातो वैधृतिश्चैकविंशतिः । तिथिवारसंयोगानां करणस्य च मेलनम् ॥४३९॥ पंचांगमस्य शुद्धिरिस्तु पंचांगशुद्धिरीरिता । यस्मिन्पंचांगदोषोऽस्ति तस्मिल्लग्ने निरर्थकम् ॥४४०॥ त्यजेत्पंचैष्टिकं चापि विषसंयुक्तदुग्धवत् । लग्नं लग्नांशको स्वस्वपतिना वीक्षितौ युतौ ॥४४१॥ न चेदान्योन्यपतिना शुभमित्रेण वा तथा । वरस्य मृत्युः स्यात्ताभ्यां सप्तसप्तोदयांशकौ ॥४४२॥ एवं तौ न युतौ दृष्टौ मृत्युर्वध्वाः करग्रहे । त्याज्याः सूर्यस्य संक्रांतेः पूर्वतः परतस्तथा ॥४४३॥ विवाहादिषु कार्येषु नाड्यः षोडशषोडश । षड्वर्गः शुभदः श्रेष्ठो विवाहस्थापनादिषु ॥४४४॥ मुने ! लग्न से सप्तम स्थान शुद्ध (ग्रहवर्जित) हो और २१ महा दोषों से रहित हो तो उसे विवाह में ग्रहण करना चाहिए। अब मैं उन इक्कीस दोषों के नाम, स्वरूप और फल का संक्षेप से वर्णन करता हूँ, सुनो ॥४३४॥ विवाह के २१ दोष--'पञ्चांग-शुद्धि का न होना, यह प्रथम दोष कहा गया है। उदयास्त की शुद्धि का न होना २, उस दिन सूर्य की संक्रान्ति का होना ३, पापग्रह का षड्वर्ग में रहना ४, लग्न से छठे भाव में शुक्र की स्थिति ५, अष्टम में मंगल का रहना ६, गण्डान्त होना ७, कर्तरीयोग ८, बारहवें, छठे और आठवें चन्द्रमा का होना तथा चन्द्रमा के साथ किसी अन्य ग्रह का होना ९, वर-कन्या की जन्मराशि से अष्टम राशि लग्न हो या दैनिक चन्द्रराशि हो १०, विषघटो ११, दुर्मुहूर्त १२, वारदोष १३, खर्जूर १४, नक्षत्रैकचरण १५, ग्रहण और उत्पात के नक्षत्र १६, पापग्रह से विद्ध नक्षत्र १७; पाप से युक्त नक्षत्र १८, पापग्रह का नवमांश १६, महापात २० और वैधृति २१--विवाह में ये २१ दोष कहे गये हैं ॥४३५-४३८॥ मुने ! तिथि, वार, नक्षत्र योग और करण-इन पाँचों का मेल पंचांग कहलाता है । उसको शुद्धि पंचांगशुद्धि कहलाती है । जिस दिन पंचांग के दोष हों, उस दिन विवाह लग्न बताना निरर्थक है। इस प्रकार का लग्न यदि पाँच इष्ट ग्रहों से युक्त हो तो भी उसको विषमिश्रित दूध के समान त्याग देना चाहिए ॥४३६- ४४०॥ लग्न या उसके नवमांश अपने-अपने स्वामी से युक्त या दृष्ट न हों अथवा परस्पर (लग्नेश से नवमांश और नवमांशपति से) लग्नेश युक्त या दृष्ट न हों अथवा अपने स्वामी के शुभग्रह मित्र से लग्न से युक्त या दृष्ट न हों तो वर के लिए घातक होते हैं । इसी प्रकार सप्तम और उसके नवमांश में भी ये दोनों यदि अपने-अपने स्वामो से अथवा परस्पर युक्त या दृष्ट नहीं हों या अपने-अपने स्वामी के शुभ मित्र से युक्त या दृष्ट न हों तो वह वधू के लिए घातक है ॥४४१-४४२॥ सूर्य की संक्रान्ति के समय से पूर्व और पश्चात् सोलह-सोलह घड़ी विवाह आदि शुभ कार्यों में त्याज्य है। लग्न का षड्वर्ग (राशि, होरा, द्रेष्काण, नवमांश, द्वादशांश तथा त्रिंशांश) शुभ हो तो विवाह, देवप्रतिष्ठा आदि कार्यों में श्रेष्ठ होता है ॥४४३-४४४॥

भृगुषष्ठाव्हयो दोषो लग्नात्षष्ठगते सिते । उच्चगे शुभसंयुक्ते तल्लग्नं सर्वदा त्यजेत् ॥४४५॥ कुजोऽष्टमो महादोषो लग्नादष्टमगे कुजे । शुभत्रययुतं लग्नं न त्यजेत्तुंगगो यदि ॥४४६॥ पूर्णानन्दाद्वयोस्तिथ्योः संधिर्नाडीद्वयं यदि । गंडांतं मृत्युदं जन्मयात्रोद्वाहव्रतादिषु ॥४४७॥ कुलीरसिंहयोः कीटचापयोर्मीनमेषयोः । गंडांतमंतरालं स्याद्घटिकार्द्धं मृतिप्रदम् ॥४४८॥ सार्पेन्द्रयौष्णभेष्वंत्यषोडशंशा भसन्धयः । तदग्निभेष्व्वाद्यपादा भान्तां गंडांतसंज्ञकाः ॥४४६॥ उग्रं च संधित्रितयं गंडांतं त्रिविधं महत् । लग्नाभिमुखयोः पापग्रहयोरूञ्चुवक्रयोः ॥४५०॥ सा कर्तरीति विज्ञेया दंपत्योगलकंतरी । कर्तरीयोगदुष्टं यल्लग्नं तत्परिवर्जयेत् ॥४५१॥ अपि सौम्यग्रहैर्युक्तं गुणैः सर्वैः समन्वितम् । षड्वृरिष्फगे चंद्रे लग्नदोषः स्वसंज्ञकः ॥४५२॥ तल्लग्नं वर्जयेद्यत्नाज्जीवशुक्रसमन्वितम् । उच्चगे नीचगे वापि मित्रभे शत्रुराशिगे ॥४५३॥ अपि सर्वगुणोपेतं दंपत्योर्निधनप्रदम् । शशांके ग्रहसंयुक्ते दोषः संग्रहसंज्ञकः ॥४५४॥

लग्न से छठे स्थान में शुक्र हो तो वह 'भृगुषष्ठ' नामक दोष कहलाता है । उच्चस्थ और शुभ ग्रह से युक्त होने पर भी उस लग्न को सदा त्याग देना चाहिए। लग्न से अष्टम स्थान में मंगल हो तो यह 'भौममहादोष' कहलाता है। यदि मंगल उच्च में हो और तीन शुभ ग्रह लग्न में हों तो इस लग्न का त्याग नहीं करना चाहिए (अर्थात् ऐसी स्थिति में अष्टम मंगल का दोष नष्ट हो जाता है) ॥४४५-४४६॥

गण्डान्तदोष—पूर्णा (५, १०, १५) तिथियों के अन्त और नन्दा (१, ६, ११) तिथियों की आदि की संधि में दो घड़ी 'तिथिगण्डान्त दोष है। यह जन्म, यात्रा, उपनयन और विवाहादि शुभ कार्यों में घातक होता है ॥४४७॥ कर्क लग्न के अन्त और सिंह लग्न के आदि की सन्धि में, वृश्चिक और धनु की सन्धि में तथा मीन और मेष लग्न की सन्धि में आधा घड़ी 'लग्नगण्डान्त' कहलाता है। यह भी घातक होता है ॥४४८॥ अश्लेषा का चतुर्थ चरण और मघा का प्रथम चरण तथा ज्येष्ठा के अन्त को १६ घड़ी और मूल का प्रथम चरण एवं रेवती नक्षत्र के अन्त की ग्यारह घड़ी और अश्विनी का प्रथम चरण—इस प्रकार इन दो-दो नक्षत्रों की सन्धि का काल 'नक्षत्रगण्डान्त' कहलाता है। ये तीनों प्रकार के गण्डान्त महाक्रूर होते हैं ॥४४७-४४६१/२॥

कर्तरीदोष—लग्न से बारहवें में मार्गी और द्वितीय में वक्री दोनों पापग्रह हों तो लग्न में आगे-पीछे दोनों ओर जाने के कारण यह 'कर्तरीदोष' कहलाता है। इसमें विवाह होने से यह कर्तरीदोष वर-वधू दोनों के के गला काटने वाला (उनका अनिष्ट करने वाला) होता है। ऐसे कर्तरीदोष से युक्त लग्न का परित्याग कर देना चाहिए ॥४५०-४५१॥

लग्नदोष—यदि लग्न से छठे, आठवें तथा बारहवें में चन्द्रमा हो तो यह 'लग्नदोष' कहलाता है। ऐसा लग्न शुभग्रहों तथा अन्य सम्पूर्ण गुणों से युक्त होने पर भी दोषयुक्त होता है। वह लग्न बृहस्पति और शुक्र से युक्त हो तथा चन्द्रमा उच्च, नीच, मित्र या शत्रुराशि में (कहीं भी) हो, तो भी यत्नपूर्वक त्याग देना चाहिए। क्योंकि यह सब गुणों से युक्त होने पर भी वर-वधू के लिए 'घातक' होता है ॥४५१-४५३१/२॥

संग्रहदोष—चन्द्रमा यदि किसी ग्रह से युक्त हो तो 'संग्रह' नामक दोष होता है। इस दोष में भी विवाह नहीं करना चाहिए। चन्द्रमा यदि सूर्य से युक्त हो तो दरिद्रता, मंगल से युक्त हो तो घात अथवा रोग

षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४८१ तस्मिन्संग्रहदोषे तु विवाहं नैव कारयेत् । सूर्येण संयुते चंद्रे दारिद्र्यं भवति स्फुटम् ॥४५५॥ कुजेन मरणं व्याधिः सौम्येन त्वनपत्यता । दौर्भाग्यं गुरुणा युक्ते सापत्न्यं भार्गवेण तु ॥४५६॥ प्रव्रज्या सूर्यपुत्रेण राहुणा मूलसंक्षयः । केतुना संयुते चन्द्रे नित्यं कष्टं दरिद्रता ॥४५७॥ पापग्रहुते चन्द्रे दंपत्योर्मरणं भवेत् । शुभग्रहयुते चंद्रे स्वोच्चस्थे मित्रराशिगे ॥४५८॥ दोषायनं भवेल्लग्नं दंपत्योः श्रेयसे सदा । स्वोच्चगो वा स्वक्षंगो वा मित्रक्षेत्रगतोऽपि वा ॥४५८॥ पापग्रहयुतश्चन्द्रः करोति मरणं तयोः । दंपत्योरष्टमं लग्नमष्टमो राशिरैव च ॥४६०॥ यदि लग्नगतः सोऽपि दंपत्योर्मरणप्रदः । स राशिः शुभसंयुक्तो लग्नं वा शुभसंयुक्तम् ॥४६१॥ लग्नं विवर्जयेद्यस्मात्तद्वंशांशतदीशवराम् । दंपत्योर्द्वादशं लग्नं राशिर्वा यदि लग्नगः ॥४६२॥ अर्थहानिस्तयोरस्मात्तदंशस्वामिनं त्यजेत् । जन्मराश्युदयश्चैव जन्मलग्नोदयः शुभः ॥४६३॥ तयोरुपचयस्थानं लग्नेऽत्यंतशुभप्रदम् । खमार्गणा वेदपक्षाः खरामा वेदमार्गणाः ॥४६४॥ वह्निचंद्रा रूपदक्षाः खरामा व्योमबाहवः । द्विरामाः स्वान्नयः शून्यदक्षाः कुंजरक्ष्मयः ॥४६५॥ रूपपक्षा व्योमहक्षा वेदचंद्राश्चतुर्दश । शून्यचन्द्रा वेदचन्द्रा षड्व्रक्षा वेदबाहवः ॥४६६॥

बुध से युक्त हो तो अनपत्यता, गुरु से युक्त हो तो दौर्भाग्य, शुक्र से युक्त हो तो पत्नि-पत्नी में शत्रुता, शनि से युक्त हो तो प्रव्रज्या (गृहत्याग), राहु युक्त हो तो सर्वस्व हानि और केतु से युक्त हो तो कष्ट और दरिद्रता होती है ॥४५४-४५७॥ पापग्रह की निन्दा और शुभग्रहों की प्रशंसा-मुने ! इस प्रकार संग्रहदोष में चन्द्रमा यदि पापग्रह से युक्त हो तो वर-वधू दोनों के लिए घातक होता है। यदि वह शुभग्रहों से युक्त हो तो उस स्थिति में यदि उच्च या मित्र की राशि में चन्द्रमा हो तो लग्न दोषयुक्त रहने पर भी वरवधू के लिए कल्याणकारी होता है। परन्तु चन्द्रमा स्वोच्च में या स्वराशि में अथवा मित्र की राशि में रहने पर यदि पापग्रह से युक्त हो तो वरवधू दोनों के लिए घातक होता है ॥४५८-४५९॥ अष्टमराशि लग्नदोष--वर या वधू के जन्मलग्न से अथवा उनकी जन्मराशि से अष्टमराशि विवाह- लग्न में पड़े तो यह दोष भी वर-वधू के लिए घातक होता है। वह राशि या वह लग्न शुभग्रह से युक्त हो तो भी उस लग्न को, उस नवमांश से युक्त लग्न को अथवा उसके स्वामी को यत्नपूर्वक त्याग देना चाहिए ॥४६०-४६१३॥ द्वादश राशिदोष--वर-वधू के जन्म लग्न या जन्मराशि से द्वादश राशि यदि विवाहलग्न में पड़े तो वर-वधू के धन की हानि होती है। इसलिए उस लग्न को, उसके नवमांश को और उसके स्वामी को भी त्याग देना चाहिए ॥४६२३॥ जन्मलग्न और जन्म-राशि की प्रशंसा--जन्मराशि और जन्मलग्न का उदय विवाह में शुभ होता है तथा दोनों के उपचय (३, ६, १०, ११) स्थान यदि विवाह लग्न में हो तो अत्यन्त शुभप्रद होते हैं ॥ विषघटी ध्रुवाङ्क--अश्विनी का ध्रुवांक ५० भरणी का २४, कृत्तिका का ३०, रोहिणी का ५४, मृगशिरा का १३, आर्द्रा का २१, पुनर्वसु का ३०, पुष्य का २०, अश्लेषा का ३२, मघा का ३०, पूर्वा फाल्गुनी का २०, उत्तरा फाल्गुनी का १८, हस्त का २१, चित्रा का २०, स्वाती का १४, विशाखा का १४, उत्तराषाढ़ का २०, ६१ ना० पु०

४८२ नारदीयपुराणम् शून्यदश्राः शून्यचंद्राः पूर्णचंद्रा गतेंदवः । तर्कचन्द्रा वेदपक्षाः खरामाश्चाश्विमाक्रमात् ॥४६७॥ आभ्यः परास्तु घटिकाश्चतस्रो विषसंज्ञिताः । विवाहादिषु कार्येषु विषनाडीं विवर्जयेत् ॥४६८॥ भास्करादिषु वारेषु ये मुहूर्त्ताश्च निंदिताः । विवाहादिषु ते वर्ज्या अपिलक्षगुणैर्युताः ॥४६६॥ निहिता वारदोषा ये सूर्यवारादिषु क्रमात् । अपि सर्वगुणोपेतास्ते वर्ज्याः सर्वमंगले ॥४७०॥ एकागर्लान्त्रितुल्यं यत्तल्लग्नं च विवर्जयेत् । अपिशुक्रेज्यसंयुक्तं विषसंयुक्तदुग्धवत् ॥४७१॥ ग्रहणोत्पातभं त्याज्यं मंगलेषु ऋतुत्रयम् । यावच्च शशिना मुक्ता मुक्तभं दग्धकाष्ठवत् ॥४७२॥ मंगलेषु त्यजेत्खेटैर्विद्धं च क्रूरसंयुतम् । अखिलं पञ्चगव्यं सुराविद्युतं यथा ॥४७३॥ पाद एव शुभैर्विद्धमशुभं नैव कृत्स्नभम् । क्रूरविद्धं युतं धिष्ण्यं निखिलं नैव मंगलम् ॥४७४॥ तुलामियुनकन्यांशा धनुरंत्यार्धसंयुताः । एते नवांशाः शुभदा वृषमस्यांशकाः खलु ॥४७५॥ अत्यांशास्तेऽपि शुभदा यदि वर्गोत्तमाह्वयाः । अन्ये नवांशा न ग्राह्या यतस्ते कुनवांशकाः ॥४७६॥ कुनवांशकलग्नं यत्त्याज्यं सर्वगुणान्वितम् । यस्मिन्दिने महापातस्तद्दिनं वर्जयेच्छुभे ॥४७७॥ अपि सर्वगुणोपेतं दम्पत्योर्मृत्युदं यतः । अनुक्ताः स्वल्पदोषाः स्युर्विद्युन्नीहारवृष्टयः ॥४७८॥

श्रवण का १०, धनिष्ठा का १०, शतभिषा का १८, पूर्वभाद्रपद का १६, उत्तरभाद्रपद का २४ और रेवती का ध्रुवांक ३० है। इन अश्विनो आदि नक्षत्रों के अपने-अपने ध्रुवांक तुल्य घड़ी के बाद ४ घड़ी तक विषघटी होतो है। विवाह आदि शुभ कार्यों में विषघटिकाओं का त्याग कर देना चाहिए ॥४६३-४६८॥ रवि आदि वारों में जो मुहूर्त निन्दित कहा गया है, वह यदि अन्य लाख गुणों से युक्त हो तो भी विवाह आदि शुभ कार्यों में वर्जनीय ही है ॥४६९॥ रवि आदि दिनों में जो-जो वार-दोष कहे गये हैं वे अन्य सब गुणों से युक्त हों तो भी शुभ कार्य में त्याज्य हैं ॥४७०॥ नक्षत्र के जिस चरण में पूर्वोक्त 'एकार्गल दोष' हो, उस चरण (नवांश) से युक्त जो लग्न हो उसमें यदि गुरु, शुक्र का योग हो तो भी विषयुक्त दूध के समान उसका परित्याग कर देना चाहिए ॥४७१॥ ग्रहण तथा उत्पात से दूषित नक्षत्र को तीन ऋतु (६ मास) तक शुभ कार्य में छोड़ देना चाहिए। जब चन्द्रमा को भोगकर छोड़ दे तो वह नक्षत्र जली हुई लकड़ी के समान निष्फल हो जाता है अर्थात् दोषकारक नहीं रह जाता। शुभ कार्यों में ग्रह से विद्ध और पापग्रह से युक्त सम्पूर्ण नक्षत्र को मदिरामिश्रित पञ्चगव्य के समान त्याग देना चाहिए; परन्तु यदि नक्षत्र शुभग्रह से विद्ध हो तो उसका केवल विद्धचरण ही त्याज्य है, सम्पूर्ण नक्षत्र नहीं। किन्तु पापग्रह से विद्ध नक्षत्र शुभकार्य में सम्पूर्ण रूप से त्याज्य हैं ॥४७२-४७४॥ विहित नवमांश—वृष, तुला, मिथुन, कन्या और धन का उत्तरार्ध तथा इन राशियों के नवमांस विवाह लग्न शुभप्रद है किसी भी लग्न में अन्तिम नवमांश यदि वर्गोत्तम हो तभी उसे शुभप्रद समझना चाहिए। अन्यथा विवाहलग्न का अन्तिम नवमांश (२६ अंश ४० कला के बाद) अशुभ होता है। यहाँ अन्य नवमांश नहीं ग्रहण करने चाहिए। क्योंकि वे कुनवमांश कहलाते हैं। लग्न में कुनवमांश हों तो अन्य सब गुणों से युक्त होने पर भी वह त्याज्य है। जिस दिन महापात (सूर्य-चन्द्रमा का क्रान्ति-साम्य) हो, वह दिन भी शुभ कार्य में छोड़ देने योग्य है। क्योंकि वह अन्य सब 'गुणों' से युक्त होने पर भी वर-वधू के लिए घातक होता है। इन दोषों से भिन्न विद्युत्, नीहार (कुहरा) और वृष्टि आदि दोष, जिनका अभी वर्णन नहीं किया गया है, (स्वल्पदोष) कह- लाते हैं ॥४७५-४७८॥

षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४८३ प्रत्यर्कपरिवेषेन्द्रचापांबुधरगर्जनाः । लत्तोपग्रहपाताह्या मासद्ग्धाह्वया तिथिः ॥४७९॥ दग्धलग्नांधबधिरपंगुसंज्ञाश्च राशयः । एवामाद्यास्ततस्तेषां व्यवस्था क्रियतेऽधुना ॥४८०॥ अकालजा भवन्त्येते विद्युन्नीहारवृष्टयः । दोषाय मंगले ननमदोषाग्रैव कालतः ॥४८१॥ बृहस्पतिः केंद्रगतः शुक्नो वा यदि वा बुधः । एकोऽपि दोषनिचयं हरत्येव न संशयः ॥४८२॥ तिर्यक्पंचोर्ध्वगाः पञ्च रेखा द्वे द्वे च कोणयोः । द्वितीये शंभुकोणेऽग्निधिष्ण्यं चक्रे प्रविन्यसेत् ॥४८३॥ मान्यत्र साभिजित्येकरेखाखेटेन विद्धभम् । पुरतः पृष्ठतोऽर्काद्या दिनक्षं लत्तयंति यत् ॥४८४॥ अर्काकृतिगुणाष्टांगबाणाष्टनवसंख्यभम् । सूर्यनक्षाह्सर्पापंञ्चर्क्षात्त्यत्त्वाष्ट्रमितोडुविष्णुभम् ॥४८५॥ संख्यया दिनभे तावदशिभभात्पातदुष्टभम् । सौराष्ट्रे सालवदेशे तु लत्तितं भं विवर्जयेत् ॥४८६॥ कलिगवंगदेशेषु पातितं न शुभप्रदम् । बाल्हिके कुरुदेशे चान्यस्मिन्देशे न दूषणम् ॥४८७॥ तिथयो मासद्ग्धाश्च दग्धलग्नानि यान्यपि । मध्यदेशे विवर्ज्यानि न दुष्टानीतरेषु च ॥४८८॥ षङ्ग्वंधकाणलग्नानि मासशून्याश्च राशयः । गौडमालवयोस्त्याज्या अन्यदेशे न गर्हिताः ॥४८९॥

लघु दोष—विद्युत् नीहार वृष्टि, प्रतिसूर्य (दो सूर्य-सा दीखना) परिवेष (घेरा), इन्द्रधनुष, मेघगर्जन, लत्ता, उपग्रह, पात, मासद्ग्धतिथि, दग्ध, अन्ध, वधिर तथा पंगु—इन राशियों के लग्न, एवं छोटे-छोटे और भी अनेक दोष हैं । अब उनकी व्यवस्था का प्रतिपादन किया जाता है ॥४७९-४८०॥ विद्युत्, नीहार, वृष्टि--ये यदि असमय में हों तभी दोष समझे जाते हैं । यदि समय पर हों (जैसे जाड़े के दिन में पाला पड़े, वर्षा ऋतु में वर्षा हो तथा सघन मेघ में बिजली चमके) तो सब शुभ ही समझे जाते हैं ॥४८१॥ यदि वृहस्पति, शुक्र अथवा बुध इनमें से एक भी केन्द्र में हो तो इन सब दोषों को नष्ट कर देते हैं । इसमें संशय नहीं ॥४८२॥ पञ्चशलाका-वेध--पाँच रेखायें पड़ी और पाँच रेखायें खड़ी खींचकर दो-दो रेखायें कोणों में खींचने (बनाने) से पञ्चशलाका-चक्र बनता है । इस चक्र के ईशान कोण वाली दूसरी रेखा में कृत्तिका को लिखकर आगे प्रदक्षिणा-क्रम से रोहिणी आदि अभिजित् सहित सम्पूर्ण नक्षत्रों का उल्लेख करे । जिस रेखा में ग्रह हों, उसी रेखा की दूसरी ओर वाला नक्षत्र विद्ध समझा जाता है ॥४८३३॥ लत्तादोष--सूर्य आदि ग्रह क्रमशः अपने आश्रित नक्षत्र से आगे और पीछे १२, २२, ३, ७, ६, ५, ८ तथा ९वें दैनिक नक्षत्र को लातों से दूषित करते हैं, इसलिए इसका नाम 'लत्तादोष' है । पातदोष—सूर्य जिस नक्षत्र में हो उससे अश्लेषा, मघा, रेवती, चित्रा, अनुराधा और श्रवण तक की जितनी संख्या हो, उतनी ही यदि अश्विनी से दिननक्षत्र तक गिनने से संख्या हो तो वह नक्षत्र पातदोष से दूषित होता है ॥४८४-४८५३॥ परिहार--सौराष्ट्र (काठियावाड़) और शाल्वदेश में लत्तादोष वर्जित है । कलिंग (जगन्नाथपुरी से कृष्णा नदी तक का भूभाग), वंग (बंगाल), बाल्हिक (बलख) और कुरु (कुरुक्षेत्र) देश में पातदोष त्याज्य हैं; अन्य देशों में ये दोष त्याज्य नहीं हैं ॥४८६-४८७॥ मासद्ग्ध तिथि तथा दग्ध लग्न--ये मध्यदेश (प्रयाग से पश्चिम, कुरुक्षेत्र से पूर्व, विन्ध्य और हिमालय के मध्य) में वर्जित हैं । अन्य देशों में ये दूषित नहीं हैं ॥४८८॥ पंगु, अंध, काण लग्न तथा मासों में जो शून्य राशियां कही गई हैं, वे गौड़ (बंगाल से भुवनेश्वर तक) और मालव (मालवा) देश में त्याज्य हैं । अन्य देशों में निन्दित नहीं हैं ॥४८९॥