भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४६३ उत्पातमृत्युकाणाख्यसिद्धियोगाः प्रकीर्तिता । तिथिवारोद्भवा नेष्टा योगा वारर्क्षसंभवाः ॥२४६॥ हूणवंगखसेष्वन्यदेशेष्वतिशुभप्रदाः । घोराष्टाक्षीमहोदर्यो मन्दा मंदाकिनी तथा ॥२५०॥ मिश्रा राक्षसिका सूर्यवारादिषु यथाक्रमम् । शूद्रतस्करवेश्यक्ष्मादेवभूपगवां क्रमात् ॥२५१॥ अनुक्तानां च सर्वेषां घोराद्याः सुखदाः स्मृताः । पूर्वाह्णे नृपतीन्हन्ति विप्रान्मध्यांदिने विशः ॥२५२॥ अपराह्णेऽस्तगे शूद्रान्प्रदोषे च पिशाचकान् । निशि रात्रिचरान्नाट्यकारानपररात्रिके ॥२५३॥ गोपानुषसि संध्यायां लिंगिनो रविसंक्रमः । दिवा चेन्मेषसंक्रांतिरनर्थकलहप्रदा ॥२५४॥ रात्रौ सुभिक्षमतुलं संध्ययोर्वृष्टिनाशनम् । हरिशार्दूलवाराहखरकुंजरमाहिषाः । अश्वश्वाजबृषाः पादायुधाः करणवाहनाः ॥२५५॥ भुशुंडी च गदा खड्गौ दंड इष्वासतोमरौ ॥२५६॥ कुन्तपाशांकुशास्त्रेषून्बिभ्रति करयोस्त्रिवनः । अन्नं च पायसं भैक्ष्यं सपक्षं च पयो दधि ॥२५७॥ मिष्टान्नं गुडमध्वाज्यशर्करा बवतो हविः । ववोवीवणिजेविश्यां बालवे गोचरस्थितौ ॥२५८॥ कौलवे शकुनौ भानुः किस्तुघ्ने चोर्द्धसंस्थितः । चतुष्पादे तिले नागे सुप्तः क्रांति करोति हि ॥२५६॥ परिहार--ये जो ऊपर तिथि और वार के संयोग से तथा वार और नक्षत्र के संयोग से अनिष्टकारक योग बताये गये हैं, वे सब हूणों के देश--भारत के पश्चिमोत्तरभाग में, बंगाल में और नेपाल देश में ही त्याज्य हैं। अन्य देशों में ये अत्यन्त शुभप्रद होते हैं।। २४९३ ।। सूर्यसंक्रान्तिकथन--रवि आदि वारों में सूर्य की संक्रान्ति होने पर क्रमशः घोरा, ध्वांक्षी, महोदरी, मन्दा, मन्दाकिनी, मिश्रा तथा राक्षसी--ये संक्रान्ति के नाम होते हैं। उक्त घोरा आदि संक्रान्तियाँ क्रमशः शूद्र, चोर, वैश्य, ब्राह्मण, क्षत्रिय, गो आदि पशु तथा चारों वर्गों से अतिरिक्त मनुष्यों को सुख देने वाली होती हैं। यदि सूर्य की संक्रान्ति पूर्वाह्न में हो तो वह क्षत्रियों को हानि पहुँचाती है। मध्याह्न में हो तो ब्राह्मणों को, अपराह्न में हो तो वैश्यों को, सूर्यास्त-समय में हो तो शूद्रों को, रात्रि के प्रथम प्रहर में हो तो पिशाचों को, द्वितीय प्रहर में हो तो निशाचरों को, तृतीय प्रहर में हो तो नाट्यकारों को, चतुर्थ प्रहर में हो तो गोपालकों को और सूर्योदय समय में हो तो लिंगधारियों (बहुरूपियों, पाखण्डियों अया आश्रम-सम्प्रदाय के चिह्न धारण करने वालों) को हानि पहुँचाती है ॥२५०-२५३३॥ यदि सूर्य की मेषसंक्रान्ति दिन में हो तो संसार में अनर्थ और कलह पैदा करने वाली होती है। रात्रि में मेष संक्रान्ति हो तो अनुपमसुख और तथा दोनों संध्याओं के समय हो तो वह वृष्टि का नाश करती है ॥२५४३॥ करणसंक्रान्तिवश सूर्य के वाहनभोजनादि--बव आदि ग्यारह करणों में संक्रान्ति होने पर क्रमशः १ सिंह, २ बाघ, ३ सूअर, ४ गदहा, ५ हाथी, ६ भैंसा, ७ घोड़ा, ८ कुत्ता, ६ बकरा, १० बैल और ११ मुर्गा- ये सूर्य के वाहन होते हैं तथा १ भुशुण्डी, २ गदा, ३ तलवार, ४ लाठी, ५ धनुष, ६ बरछी, ७ कुन्त (भाला), ८ पाश, ६ अंकुश, १० अस्त्र और ११ बाण--इन्हें क्रमशः सूर्यदेव अपने हाथों में धारण करते हैं। १ अन्न, २ खीर, ३ भिक्षान्न, ४ पकवान, ५ दूध, ६ दही, ७ मिठाई, ८ गुड़, ९ मधु, १० घृत और ११ चीनो-ये वव आदि की संक्रान्ति में क्रमशः भगवान् सूर्य के हविष्य (भोजन) होते हैं ॥२५५-२५७३॥ सूर्य की स्थिति--बव, वणिज, विष्टि, बालव और गर--इन करणों में सूर्य बैठे हुए, कौलव, शकुनि और किस्तुघ्न--इन करणों में खड़े हुए तथा चतुष्पद, तैतिल और नाग--इन करणों में सोते हुए, संक्रान्ति करते (एक राशि से दूसरी राशि में जाते) हों तो इन तीनों अवस्थाओं की संक्रान्ति में प्रजा को क्रमशः धर्म, आयु और वर्षा के विषय में समान, श्रेष्ठ और अनिष्ट फल प्राप्त होते हैं तथा ऊपर कहे हुए अस्त्र, वाहन और