बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंषट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४५६ द्विपुष्करे द्वयं दद्यान्न दोषस्त्वृक्षभोऽपि वा । क्रूरविद्धो युतो वापि पुष्यो यदि बलान्वितः ॥२००॥ विना पाणिग्रहं सर्वमंगलेष्विष्टदः सदा । रामाग्निऋतुबाणाग्निरूवेदाग्निशरेषु च ॥२०१॥ नेत्रबाहुशरैर्द्विदुबाहुवेदाग्निसंकुराः । वेदनेत्राब्ध्यग्निशतबाहुनेत्ररदाः क्रमात् ॥२०२॥ तारासंख्याश्च विज्ञेया दस्रादीनां पृथक् पृथक् । या दृश्यंते दीप्तताराः स्वगणे योगतारकाः ॥२०३॥ वृषो वृक्षोश्चथायाम्यधिष्ण्येयमकरस्तमः । उडुंबरश्चाग्निधिष्ण्ये रोहिण्यां जंबुकस्तरः ॥२०४॥ इन्दुभात्खदिरो जातः कृष्णप्लक्षकश्च रौद्रभात् । संभूतोऽदितिभाद्वंशः पिप्पलः पुष्यसंभवः ॥२०५॥ सर्पधिष्ण्यान्नागवृक्षो वटः पितृसंभवः । पालाशो भाग्यभाज्जातः अक्षश्चार्यमसंभवः ॥२०६॥ अरिष्टवृक्षो रविमाच्छ्रीवृक्षस्त्वाष्ट्रसंभवः । स्वात्यृक्षजोऽर्जुनो वृक्षो द्विदैवत्याद्विकंकतः ॥२०७॥ मित्रभाद्वकुलो जातो विष्टिः पौरंदरर्क्षजः । सर्ज्जवृक्षो मूलभाच्च वंजुलो वारिधिष्ण्यजः ॥२०८॥ पनसो वैश्वभाज्जातश्चार्कवृक्षश्च विष्णुभात् । वसुधिष्ण्याच्छमीवृक्षः कदंबो वारुणर्क्षजः ॥२०९॥ अजाहेर्घूतवृक्षोभूद् बुद्ध्यजः पिचुमन्दकः । मधूवृक्षः पौष्णधिष्ण्याद्धिष्ण्यवृक्षः प्रकीर्तितः ॥२१०॥ यस्मिन्ऋक्षैश्चरो धिष्ण्ये तद्वृक्षोऽर्च्यः प्रयत्नतः । योगेशा यमविश्वेंदुधातुजीव निशाकराः ॥२११॥ इंद्रतोयाहिवह्न्वर्क भूमिरुद्रकतोयपाः । गणेशरुद्रधनदत्वष्टृमित्रषडाननाः ॥२१२॥
**पुष्य नक्षत्र की प्रशंसा—**पाप ग्रह से विद्ध या युक्त होने पर भी पुष्य नक्षत्र बलवान् होता है और विवाह छोड़कर वह सब शुभ कर्मों में अभीष्ट फल देने वाला है ॥२००॥ **नक्षत्रों में योग-ताराओं की संख्या—**अश्विनी आदि (अभिजित्सहित) अट्ठाईस नक्षत्रों में क्रमशः ३, ३, ६, ५, ३, १, ४, ३, ५, ५, २, २, ५, १, १, ४, ४, ३, ११, २, २, ३, ३, ४, १००, २, २ और ३२ योगतारामें होती हैं। अपने-अपने आकाशीय विभाग में जो अनेक ताराओं का पुञ्ज देता हैं, उसमें जो अत्यन्त उद्दीप्त तारायें दीख पड़ती हैं, वे योगतारायें कहलाती हैं ॥ २०१-२०३॥ **नक्षत्रों से वृक्षों की उत्पत्ति—**जितने भी वृष अर्थात् श्रेष्ठ वृक्ष हैं, उनकी उत्पत्ति अश्विनी से हुई है। भरणी से यमक (जुड़े हुए दो) वृक्ष, कृत्तिका से उदुम्बर (गूलर), रोहिणी से जामुन, मृगशिरा से खैर, आर्द्रा से काली पाकर, पुनर्वसु से बाँस, पुष्य से पीपल, अश्लेषा से नागकेसर, मघा से बरगद, पूर्वा फाल्गुनी से पलाश, उत्तरा फाल्गुनी से रुद्राक्ष का वृक्ष, हस्त से अरिष्ट (रीठो का वृक्ष), चित्रा से श्रीवृक्ष (बेल), स्वाती से अर्जुन वृक्ष, विशाखा से विकंकत (जिसकी लकड़ी से कलछियां बनती हैं), अनुराधा से बकुल (मौलसिरी), ज्येष्ठा से विष्टिवृक्ष, मूल से सर्ज (शाल का वृक्ष) पूर्वाषाढ़ से वंजुल (अशोक), उत्तराषाढ़ से कटहल, श्रवण आक से धनिष्ठा से शमी वृक्ष शतभिषा से कदम्ब पूर्व भाद्रपद से हैं। आम्रवृक्ष, उत्तरभाद्रपद से निम्बवृक्ष तथा रेवती से महुए की उत्पत्ति हुई इस प्रकार ये नक्षत्र सम्बन्धी वृक्ष कहे गये हैं ॥२०४-२१०॥ जब जिस नक्षत्र में शनैश्चर विद्यमान हो, उस समय उस नक्षत्रसम्बन्धी वृक्ष का यत्नपूर्वक पूजन करना चाहिए ॥२११॥ **योगों के स्वामी—**यम, विश्वेदेव, चन्द्र, ब्रह्मा, गुरु, चन्द्र, इन्द्र, जल, सर्प अग्नि सूर्य, भूमि, रुद्र, बह्मा, वरुण, गणेश, रुद्र, कुबेर, विश्वकर्मा, मित्र, कार्तिकेय, सावित्रो, कमला, गौरी, अश्विनोकुमार, पितर और अदिति—ये क्रमशः विष्कम्भ आदि सत्ताईस योगों के स्वामी हैं ॥२१२॥ **निन्द्य योग—**वैधृति और व्यतीपात—ये दोनों महापात हैं, इन दोनों को शुभ कार्यों में सदा त्याग