भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 479, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 479

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का संपूर्ण पाठ्य रूपान्तरण दिया गया है:

४६० नारदीयपुराणम् सावित्री कमला गौरी नासत्यौ पितरोऽदितिः । वैधृतिश्च व्यतीपातो महापातावुभौ सदा ॥२१३॥ परिघस्य च पूर्वार्द्धं सर्वकार्येषु गर्हितम् । विष्कंभं भवञ्जयोस्तिस्रः षड्वा गंड़ातिगंडयोः ॥२१४॥ व्याघाते नव शूले तु पंच नाड्यो हि गर्हिताः । अदितींदुमघाह्यश्वमूलमैत्रेज्यभानि च ॥२१५॥ ज्ञेयानि सहचित्राणि मूर्द्धभानि यथाक्रमम् । लिखेदूर्ध्वगतामेकां तिर्यग्रेखास्तत्रयोदश ॥२१६॥ तत्र खार्जूरिकं चक्रं कथितं मूर्ध्नि भे न्यसेत् । भाज्यैकरेखागतयोः सूर्याचंद्रमसोमिथः ॥२१७॥ एकार्गलो दृष्टिपातश्चाभिजिव्र्जौर्जितानि वै । विनाडीभिर्द्वादशभी रहितं घटिकाद्वयम् ॥२१८॥ योगं प्रकरणं योगाः क्रमात्तु सप्तविंशतिः । इन्द्रः प्रजापतिर्मित्रस्त्वष्टाभूह्रितप्रिया ॥२१९॥ कोनाशः कलिरुद्राख्यो तिष्यर्द्धशास्त्रवाहिमंरुत् । बवादिवाणिजांतानि शुभानि करणानि षट् ॥२२०॥ परीता विपरीता वा विष्टिर्नेष्टा तु मंगले । मुखे पंच गले चैका वक्षस्येकादश स्मृतः ॥२२१॥ नाभौ चतस्रः षट् कट्यां तिस्रः पुच्छाख्यनाडिकाः । कार्यहानिर्मुखे मृत्युर्गले वक्षसि निःस्वता ॥२२२॥ कट्यामुन्मत्तता नाभौ च्युतिः पुच्छे ध्रुवं जयः । स्थिराणि मध्यमान्येषां मध्यनागचतुष्पदौ ॥२२३॥ दिवामुहूर्ता रुद्राहीमित्रपितृवसुदकम् । विश्वेविधातृब्रह्माेंद्रद्रग्निवसुतोयपाः ॥२२४॥


देना चाहिए। परिघ योग का पूर्वार्ध और वज्र योग के आरम्भ की तीन घड़ियाँ, गण्ड और अतिगण्ड की छह घड़ो, व्याघात योग की ९ घड़ी और शूल योग की ५ घड़ी सब शुभ कार्यों में निन्दित हैं ॥ खार्जूर चक्र--इन नो निन्द्य योगों (वैधृति, व्यतीपात, परिघ, विष्कम्भ, वज्र, गण्ड, अतिगण्ड, व्याघात और शूल) में क्रमशः पुनर्वसु, मृगशिरा, मघा, अश्लेषा, अश्विनी, मूल, अनुराधा, पुष्य और चित्रा--ये नो मूर्धा (मस्तक) के नक्षत्र कहे गये हैं। एक ऊर्ध्वरेखा लिखे, फिर उसके ऊपर तेरह तिरछी रेखाएं अंकित करे। यह खार्जूर चक्र कहलाता है। इस चक्र में ऊपर कहे हुए निन्द्य योगों में उनके मूर्धंगत नक्षत्र को रेखा के मस्तक के ऊपर लिखकर क्रमशः २८ नक्षत्रों को लिखे। इसमें यदि सूर्य और चन्द्रमा एक रेखा में विभिन्न भाग में पड़े तो उन दोनों का परस्पर का दृष्टिपात 'एकार्गल' दोष कहलाता है। यह शुभ कार्य में त्याज्य है, परन्तु यदि सूर्य और चन्द्रमा में कोई एक अभिजित् में हो तो वेध-दोष नहीं होता है ॥२१३-२१७३॥ प्रत्येक योग में अन्तर्भाग--१२ पल रहित २ घड़ी के मान से एक-एक योग में सत्ताईस योग बीतते हैं ॥२१८३॥ करण के स्वामी और शुभाशुभ विभाग--'इन्द्र, ब्रह्मा, मित्र, विश्वकर्मा, पृथ्वी, हरितप्रिया (लक्ष्मी), कोनाश (यम), कलि, रुद्र, सर्प तथा मरुत्--ये ग्यारह देवता क्रमशः बव आदि (बव, बालव, कौलव, तैतिल गर, वणिज, विष्टि, शकुनि, चतुष्पद, नाग और किस्तुघ्न--इन) ग्यारह करणों के स्वामी हैं। इनमें बव से लेकर छह करण शुभ होते हैं। किन्तु 'विष्टि' नामक करण क्रम से आया हो या विपरीत क्रम से, किसी भी दशा में वह मंगलकार्य में शुभ नहीं है ॥२१९-२२०३॥ विष्टि के अंगों में घटी और फल--विष्टि के मुख पाँच घटी, गले में एक, हृदय में ग्यारह, नाभि में चार, कटि में छह और पुच्छ में तीन घड़ियां होती हैं। मुख की घड़ियों में कार्य आरम्भ करने से कार्य की हानि होती है। गले की घड़ी में मृत्यु, हृदय की घड़ी में निर्धनता, कटि की घड़ो में उन्मत्तता, नाभि की घड़ी में पतन तथा पुच्छ की घड़ी में कार्य करने से निश्चय ही विजय प्राप्त होती है। भद्रा के बाद जो चार स्थिर करण हैं, वे मध्यम हैं, विशेषतः नाग और चतुष्पद ॥२२१-२२३॥ मुहूर्त कथन--दिन में क्रमशः रुद्र, सर्प, मित्र, पितर, वसु, विश्वेदेव, विधि (अभिजित), ब्रह्मा, इन्द्र,

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या) · पृष्ठ 479, कुल 1008 में से · BharatKosha