भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 480

षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४६१ अर्यमा भगसंज्ञश्च विज्ञेया दश पंच च । ईशाजपादहिर्बुध्न्यपूषाश्वियमवह्नवः ॥२२५॥ धातृन्द्रादितोज्याख्या विश्वत्वंष्टृत्ववायवः । अह्नः पंचदशोभागस्तथा रात्रिप्रमाणतः ॥२२६॥ मुहूर्तमानं द्वरावक्षणक्षणि समेश्वरम् । अर्यमा राक्षसब्राह्मौ पित्र्याग्नेयौ तथाभिजित् ॥२२७॥ राक्षसाख्यौ ब्राह्मपित्र्यौ भार्गाजांशाविनादिषु । वारेषु वर्जनीयास्ते मुहूर्ताः शुभकर्मसु ॥२२८॥ येषु ऋक्षेषु यत्कर्म कथितं निखिलं च तत् । तद्देवत्ये मुहूर्तेऽपि कार्यं यात्रादिकं सदा ॥२२८॥ भूकम्पं सूर्यभात्सप्तमर्क्षे विद्युच्च पंचमे । शूलोऽष्टमे च दशमे शनिरष्टादशे ततः ॥२३०॥ केतुः पंचदशे दंड उल्का एकोनविंशतौ । निर्घातपातसंज्ञश्च ज्ञेयः स नवपंचमे ॥२३१॥ मोहनिर्घातकंपाश्च कुलिशं परिवेषणम् । विज्ञेया एकविंशादांरभ्य च यथाक्रमम् ॥२३२॥ चन्द्रयुतेषु भेष्वेबु शुभकर्म न कारयेत् । सूर्यभात्सप्तपित्यक्षं त्वाष्ट्रमित्राप्तभेषु च ॥२३३॥ सविष्णुभेषु क्रमश्रो हस्तभाच्चंद्रसंयुतः । धिष्ण्ये तातेति सत्यत्र दुष्टयोगः पतत्यसौ ॥२३४॥ चंडीशचंडायुधाख्यस्तस्मिन्नेवावचरेच्छुभम । वायोदश स्युर्मिलनसंख्यया तिथिवारयोः ॥२३५॥ क्रकचो नाम योगोऽयं मंगलेष्वतिगर्हितः । सप्तम्यामर्कवारश्चेत्प्रतिपत्सौम्यवासरे ॥२३६॥ संवर्तयोगो विज्ञेयः शुभकर्मविनाशकृत् । आनन्दः कालदंडाख्यो धूम्रधातुसुधाकराः ॥२३७॥

इन्द्राग्नि, राक्षस, वरुण, अर्यमा और भग-ये पन्द्रह मुहूर्त जानने चाहिए। रात्रि में शिव, अजपाद, अहि- र्बुध्न्य, पूषा, अश्विनीकुमार, यम, अग्नि, ब्रह्मा, चन्द्रमा, अदिति, बृहस्पति, विष्णु, सूर्य, विश्वकर्मा और वायु-ये क्रमशः पन्द्रह मुहूर्त व्यतीत होते हैं। दिनमान का पन्द्रहवां भाग रात्रि के मुहूर्त का मान समझना चाहिए। इनसे दिन तथा रात्रि में क्षण-नक्षत्र का विचार करे ॥२२४-२२६॥

वारों में निन्द्य मुहूर्त-रविवार को अर्यमा, सोमवार को ब्राह्म तथा राक्षस, मंगलवार को पितर और अग्नि, बुधवार को अभिजित्, गुरुवार को राक्षस और जल, शुक्रवार को ब्राह्म और पितर तथा शनिवार को शिव और सर्प मुहूर्त निन्द्य माने गये हैं; इसलिए शुभ कार्यों में इनका त्याग कर देना चाहिए ॥२२९॥

भूकम्पादि संज्ञाओं से युक्त नक्षत्र- सूर्य जिस नक्षत्र में हो उससे सातवें नक्षत्र की भूकम्प, पाँचवें की विद्युत, आठवें की शूल, दसवें की अशनि, अठारहवें की केतु, पन्द्रहवें की दण्ड, उन्नीसवें की उल्का, चौदहवें की निर्घातपात, इक्कीसवें की मोह, बाईसवें की निर्धात, तेईसवें को कम्प, चौबीसवें की कुलिश तथा पचीसवें की परिवेष संज्ञा समझनी चाहिए; इन संज्ञाओं से युक्त चन्द्र-नक्षत्रों में शुभ कर्म नहीं करने चाहिए ॥२३०-२३२॥

सूर्य के नक्षत्र से अश्लेषा, मघा, चित्रा, अनुराधा, रेवती तथा श्रवण तक की जितनी संख्या हो, उतनी ही यदि अश्विनी से चन्द्र-नक्षत्र तक की संख्या हो तो उस पर दुष्टयोग का सम्पात अर्थात् रुद्र के प्रचण्ड अस्त्र का प्रहार होता है। अतः उसका नाम 'चण्डीश चण्डायुध' योग है। उसमें शुभ कर्म नहीं करना चाहिए ॥२३३-२३४॥

क्रकचयोग-प्रतिपदादि तिथि की तथा रवि आदि वार की संख्या मिलाने से यदि १३ हो तो 'क्रकच- योग' होता है। यह शुभ कार्य में अत्यन्त निन्दित है ॥२३५॥

संवर्तयोग-रविवार को सप्तमो और बुधवार को प्रतिपदा हो तो संवर्तयोग होता है। यह शुभ कार्य विनाशक होता है ॥२३६॥

आनन्दादि योग-१ आनन्द, २ कालदण्ड, ३ धूम्र, ४ धाता, ५ सुधाकर (सौम्य), ६ध्वांक्ष, ७ केतु,