बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 468, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंषट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४४६ वेलाहीने सस्यहानिर्नृपाणां दारुणं रणम् । अतिवेले पुष्पहानिर्भयं सस्यविनाशनम् ॥८६॥ एकस्मिन्नेव मासे तु चन्द्रार्कग्रहणं यदा । विरोधो धरणीशानामर्थवृष्टिविनाशनम् ॥८७॥ ग्रस्तोदितावस्तमितौ नृपधान्यविनाशदौ । सर्वग्रस्ताविनेन्दू तु क्षुद्व्याध्यग्निभयप्रदौ ॥८८॥ सौम्यायने क्षत्रविप्रानितरां हन्ति दक्षिणे । द्विजातींश्चक्रमाद्धंति राहुर्दृष्टोदगादितः ॥८९॥ तथैव ग्रासभेदाः स्युर्मोक्षभेदास्तथा दश । नो शक्ता लक्षितुं देवाः किं पुनः प्राकृता जनाः ॥९०॥ आनीय खेटान्गणितांस्तेषां चारं विचिंतयेत् । शुभाशुभाख्यैः कालस्य ग्राहयामो हि लक्षणम् ॥९१॥ तस्मादन्वेषणीयं तत्कालज्ञानाय धीमता । उत्पातरूपाः केतूनामुदयास्तमया नृणाम् ॥९२॥ दिव्यांतरिक्षा भौमास्ते शुभाशुभफलप्रदाः । यज्ञध्वजास्त्रभवनरवद्विद्गजोपमाः ॥९३॥ स्तम्भशूलांकुशाकारा आंतरिक्षाः प्रकीर्तिताः । नक्षत्रसंस्थिता दिव्या भौमा ये भूमिसंस्थिताः ॥९४॥ एकोऽपि भिन्नरूपः स्याज्जंतूनामशुभाय वै । यावन्तो दिवसान्केतुर्दृश्यते विविधात्मकः ॥९५॥ तावन्मासैः फलं यच्छत्यसौ सौरैर्व्यवत्सरैः । ये दिव्याः केतवस्तेऽपि शश्वज्जीवफलप्रदाः ॥९६॥
वेला से पहले ग्रहण हो तो खेती को हानि तथा राजाओं को दारुण भय या युद्ध होता है । और 'अतिवेल' काल में अर्थात् वेला बिताकर ग्रहण हो तो फूलों की हानि भय और कृषि का नाश होता है ॥८६॥ जब एक ही मास में चन्द्रमा सूर्य—दोनों का ग्रहण हो तो राजाओं में विरोध होता है तथा धन और वृष्टि का विनाश होता है ॥८७॥ यदि सूर्य और चन्द्र ग्रस्त हुए ही उदित या अस्त हों तो राजा और धान्य का विनाश होता है। ग्रहण लगे हुए चन्द्रमा और सूर्य का सर्वग्रास ग्रहण हो तो वे भुखमरी, रोग तथा अग्नि का भय उपस्थित करने वाले होते हैं ॥८८॥ उत्तरायण में ग्रहण हो तो ब्राह्मणों और क्षत्रियों को तथा दक्षिणायन में ग्रहण होने पर अन्य वर्ण के लोगों को हानि पहुँचती है । सूर्य या चन्द्रमा के बिम्ब के उत्तर, पूर्व आदि भाग में यदि राहु का दर्शन हो (ग्रहण का स्पर्श दिखे) तो वह क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों को हानि पहुँचाता है ॥८९॥ इसी तरह ग्रहण के समय ग्रास के और मोक्ष के भी दस-दस भेद होते हैं जिनकी सूक्ष्म गति को देवता भी नहीं जान सकते फिर साधारण मनुष्यों की तो बात ही क्या है ॥९०॥ गणित द्वारा ग्रहों को लाकर उनके 'चार' (गतिमान) स्पर्श और मोक्षकाल की स्थिति) पर विचार करना चाहिए । जिससे उन ग्रहों द्वारा ग्रहणकाल के शुभ और अशुभ लक्षण (फल) को हम देख और जान सकें ॥९१॥ अतः बुद्धिमान्-पुरुष को चाहिए कि उस समय का ज्ञान प्राप्त करने के लिए अनुसन्धान करे । धूम-केतु आदि तारों का उदय और अस्त मनुष्यों के लिए उत्पातरूप होता है ॥९२॥ वे उत्पात दिव्य, भौम और अन्तरिक्ष भेद से तीन प्रकार के हैं । वे शुभ और अशुभ दोनों प्रकार के फल देने वाले हैं । आकाश में यज्ञ की ध्वजा, अस्त्र-शस्त्र, भवन और बड़े हाथी के सदृश तथा खंभा, त्रिशूल और अंकुश-इन वस्तुओं के समान जो केतु दिखाई देते हैं, 'अन्तरिक्ष' उत्पात कहलाते हैं। साधारण तारा के साथ उदित होकर किसी नक्षत्र के साथ केतु हो तो 'दिव्य' उत्पात कहा गया है । भूलोक से सम्बन्ध रखने वाले (भूकम्प आदि) उत्पातों को 'भौम' उत्पात कहते हैं ॥९३-९४॥ केतु तारा एक होकर भी प्राणियों को अशुभ फल देने के लिए भिन्न-भिन्न रूप धारण करता है । जितने दिनों तक आकाश में विविधरूपधारी केतु देखने में आता है, उतने ही मास या सौर वर्षों तक वह अपना शुभाशुभ फल देता है। जो दिव्य केतु हैं, वे सदा प्राणियों को विविध फल देते हैं ॥९५-९६॥ ५७ ना० पु०