भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 467, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 467

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४४८ नारदीयपुराणम् श्रवणानिलहस्तार्द्राभरणीभाग्यभेषु च । चरञ्छनैश्चरो नॄणां सुभिक्षारोग्यसस्यकृत् ॥७४॥ मुखे चैकं गुदे द्वे च त्रीणि के नयने द्वयम् । हृदये पञ्च ऋक्षाणि वामहस्ते चतुष्टयम् ॥७५॥ वामपादे तथा त्रीणि दक्षिणे त्रीणि भानि च । चत्वारि दक्षिणे हस्ते जन्मभाद्रविजस्थितिः ॥७६॥ रोगो लाभस्तथा हानिर्लाभः सौख्यं च बंधनम् । ॥७७॥ आयासः श्रेष्ठयात्रा च धनलाभः क्रमात्फलम् बहुधारविजस्त्वेवद्वक्रगः फलमीदृशम् । करोत्येव समः साम्यं शीघ्रगेषूक्तमात्फलम् ॥७८॥ विष्णुचक्रोत्कृत्तशिराः पङ्गुः पीयूषपानतः । अमृत्युतां गतस्तत्र खेटत्वे परिकल्पितः ॥७९॥ वरेण धातुरर्केन्दू तुदते सर्वपर्वणि । विक्षेपावनतेर्वंशाद्राहुर्द्रुरंगतस्तयोः ॥८०॥ षण्मासवृद्ध्या ग्रहणं शोधयेद्रविचन्द्रयोः । पर्वेशास्तु तथा सत्यदेवा रव्यादितः क्रमात् ॥८१॥ ब्रह्मेन्द्रिद्रधनाधीशवरुणाग्नियमह्वयाः । पशुसस्यद्विजातीनां वृद्धिर्ब्राह्मे तु पर्वणि ॥८२॥ तद्वदेव फलं सौम्ये श्लेष्मपीडा च पर्वणि । विरोधो भूभुजां दुःखमैन्द्रे सस्यविनाशनम् ॥८३॥ धनिनां धनहानिः स्यात्कौवेरं धान्यवर्धनम् । नृपाणामशिवं क्षेममितरेषां च वारुणे ॥८४॥ प्रवर्षणं सस्यवृद्धिः क्षेमं हौताशपर्वणि । अनावृष्टिः सस्यहानिर्दुर्भिक्षं याम्यपर्वणि ॥८५॥ **शनि-चार-फल--**श्रवण, स्वाती, हस्त, आर्द्रा, भरणी और पूर्वा फाल्गुनी—इन नक्षत्रों में विचरता शनि मनुष्यों के लिए सुभिक्ष, आरोग्य तथा शस्य (फसल) की वृद्धि करता है ॥७४॥ जन्म नक्षत्र से प्रारम्भ करके मनुष्याकृति शनि-चक्र के मुख में एक, गुदा में दो, सिर में तीन, नेत्रों में दो, हृदय में पाँच, बायें हाथ में चार, बायें पैर में तीन, दक्षिण पाद में तीन तथा दक्षिण हाथ में चार--इस तरह नक्षत्रों की स्थापना करे । शनि का वर्तमान नक्षत्र जिस अंग में पड़े, उसका फल निम्नलिखित रूप से जानना चाहिए । शनि नक्षत्र मुख में हो तो रोग, गुदा में हो तो लाभ, सिर में हो तो हानि, नेत्र में हो तो लाभ, हृदय में हो तो सुख, बायें हाथ में हो तो बन्धन, बायें पैर में हो तो परिश्रम, दाहिने पैर में हो तो श्रेष्ठ यात्रा और दाहिने हाथ हो तो धन-लाभ होता है। इस प्रकार क्रमशः फल कहे गये हैं ॥७५-७७॥ बहुधा वक्रगामी होने पर शनि इन फलों को प्राप्ति कराता ही है । यदि वह सम मार्गपर हो तो फल भी मध्यम होता है और यदि वह शीघ्रगति हो तो उत्तम फल प्राप्त होता है ॥७८॥ **राहु-चार-फल--**भगवान् विष्णु के द्वारा चक्र से राहु का मस्तक काट दिये जाने पर भी अमृत पी लेने के कारण उसकी मृत्यु नहीं हुई; अतः उसे ग्रह के पद पर प्रतिष्ठित कर लिया गया ॥७९॥ वह ब्रह्मा के वर से सम्पूर्ण पर्वों (पूर्णिमा और अमावास्या) के समय चन्द्रमा और सूर्य को पीड़ा देता है; किन्तु विक्षेप तथा 'अवनति' अधिक होने के कारण वह उन दोनों से दूर ही रहता है ॥८०॥ एक सूर्यग्रहण के बाद दूसरे सूर्यग्रहण का तथा एक चन्द्रग्रहण के बाद दूसरे चन्द्रग्रहण का विचार छह मास पर पुनः कर लेना चाहिए । प्रति छह मास पर क्रमशः ब्रह्मादि सात देवता पर्वेश (ग्रहण के अधिपति) होते हैं । उनके नाम इस प्रकार हैं--ब्रह्मा, चन्द्रमा, इन्द्र, कुबेर, वरुण, अग्नि तथा यम । ब्राह्मपर्व में ग्रहण होने पर पशु, धान्य और द्विजोँ की वृद्धि होती है ॥८१-८२॥ चन्द्र- पर्व में ग्रहण हो तो भी ऐसा ही फल होता है; किन्तु लोगों को कफ से पीड़ा होती है । इन्द्रपर्व में ग्रहण होने पर राजाओं में विरोध, जगत् में दुःख तथा कृषि और धन का नाश होता है । कुबेर के पर्व में ग्रहण होने पर धान्य की वृद्धि होती है वारुणपर्व में ग्रहण होने पर राजाओं का अकल्याण और प्रजा का कल्याण होता है ॥८३-८४॥ अग्निपर्व में ग्रहण होने पर वृष्टि, धान्यवृद्धि तथा कल्याण की प्राप्ति होती है और यमपर्व में ग्रहण होने पर वर्षा का अभाव, खेतों की हानि तथा दुर्भिक्ष रूप फल प्राप्त होते हैं ॥८५॥ वेलाहीन समय में अर्थात्

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