बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंषट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४४७ शस्यवृद्धिः प्रजारोग्यं युद्धं जीवात्यवर्षणम् । ईति द्विजातिमध्यां तु गोनृपस्त्रीसुखं महत् ॥६२॥ निःस्वनावृष्टिफणिभिर्वृष्टिः स्वास्थ्यं महोत्सवः । महार्धमपि संपत्चिर्देशनाशोऽतिवर्षणम् ॥६३॥ अवैरे रोगमभयं रोगभीः सस्यवर्षणे । रोगो धान्यं नभोऽदृष्टिमघाद्यक्षगते गुरौ ॥६४॥ सौम्यमध्यमयाम्येषु मार्गेषु वीथिकात्रयम् । शुक्रस्य दस्रभाज्ज्ञेयं पर्यायैश्च त्रिभिस्त्रिभिः ॥६५॥ नागेभैरावताश्चैव वृषभोष्ट्रखराह्वयाः । मृगाजदहनाह्वयाः स्युर्याम्यांता वीथयो नव ॥६६॥ सौम्यमार्गे च तिसृषु चरन्वीथिषु भार्गवः । धान्यार्थवृष्टिसस्यानां परिपूर्ति करोति हि ॥६७॥ मध्यमार्गे च तिसृषु सर्वमप्यधमं फलम् । पूर्वस्यां दिशि मेघस्तु शुभदः पितृपंचके ॥६८॥ स्वातित्रये पश्चिमायाँ तस्यां शुक्रस्तथाविधः । विपरीते त्वनावृष्टिर्वृष्टिकृद्बुधसंयुतः ॥६९॥ कृष्णाष्टम्यां चतुर्दश्याममायां च यदा सितः । उदयास्तमनं याति तदा जलमयी मही ॥७०॥ मिथः सप्तमराशिस्थौ पश्चात्प्राग्विथिसंस्थितौ । गुरुशुक्रावनावृष्टिदुर्भिक्षसमरप्रदौ ॥७१॥ कुजज्ञजीव रविजाः शुक्रस्याग्रेसरा यदि । युद्धातिवायुदुर्भिक्षजलनाशकरा मताः ॥७२॥ जलमिवार्यमार्द्राद्रनक्षत्रेषु सुभिक्षकृत् । सच्छस्त्रावृष्टिदो मूलेऽहिबुध्न्यर्त्यात्यभयोभयम् ॥७३॥
सुभिक्ष और कल्याणादि होते हैं ॥५६-६१॥ यदि मघा आदि नक्षत्रों में वृहस्पति हो तो वह क्रमशः शस्य-वृद्धि, प्रजा में आरोग्य, युद्ध, अनावृष्टि, द्विजातियों को पीड़ा, गोओं को सुख, राजाओं को सुख, स्त्री समाज को सुख, वायु का अवरोध, अनावृष्टि, सर्पभय, सुवृष्टि, स्वास्थ्य, उत्सववृद्धि, महार्ध, सम्पत्ति को वृद्धि, देश का नाश, अतिवृष्टि, निर्वैरता, रोग, अभय, रोगभय, अन्न की वृद्धि, वर्षा, रोग की वृद्धि, धान्य को वृद्धि और अनावृष्टि रूप फल देता है ॥६२-६४॥ शुक्र-चार-फल-शुक्र के तीन मार्ग हैं—सौम्य (उत्तर), मध्य और याम्य (दक्षिण) । इनमें से प्रत्येक में तीन-तीन वीथियां हैं और एक-एक वीथी में बारी-बारी से तीन-तीन नक्षत्र आते हैं। इन नक्षत्रों को अश्विनी से आरंभ करके जानना चाहिए । इस प्रकार उत्तर से दक्षिण तक शुक्र के मार्ग में क्रमशः नाग, इभ, ऐरावत, वृष, उष्ट्र, खर, मृग, अज तथा दहन-ये नौ वीथियां हैं ॥६५-६६॥ उत्तरमार्ग की तीन वीथियों में विचरण करने वाला शुक्र धान्य, धन, वृष्टि और शस्य-इन सब वस्तुओं को परिपूर्ण करता है, मध्यममार्ग की तीन वीथियों में शुक्र के जाने से सब अशुभ ही फल प्राप्त होते हैं । मघा से पाँच नक्षत्रों में शुक्र के जाने पर पूर्व दिशा में उठा हुआ मेघ सुवृष्टिकार क तथा शुभप्रद होता है । स्वाती से तीन नक्षत्र तक जब शुक्र रहता है, तब पश्चिम दिशा (देश) में मेघ सुवृष्टिकारक और शुभदायक होता है । शेष सब नक्षत्रों में उसका फल विपरीत (अनावृष्टि और दुर्भिक्ष करने वाला) होता है । शुक्र जब बुध के साथ रहता है तो सुवृष्टिकारक होता है । कृष्णपक्ष को अष्टमी, चतुर्दशी और अमावस्या में यदि शुक्र का उदय या अस्त हो तो पृथ्वी जल से परिपूर्ण होती है । गुरु और शुक्र परस्पर सप्तम राशि में हों तथा एक पूर्व वीथी में और दूसरा पश्चिम वीथी में विद्यमान हो तो वे दोनों देश में अनावृष्टि तथा दुर्भिक्षकारक और राजाओं में परस्पर युद्धप्रद होते हैं । मंगल, बुध, गुरु और शनि यदि शुक्र से आगे होते हैं तो युद्ध, अतिवायु, दुर्भिक्ष और अनावृष्टि करने वाले होते हैं ॥६७-७२॥ पूर्वाषाढ़, अनुराधा, उत्तरा फाल्गुनो, अश्लेषा, ज्येष्ठा-इन नक्षत्रों में शुक्र हो तो सुभिक्षकारक होता है। मूल में हो तो शस्त्रभय और अनावृष्टि, उत्तरभाद्रपद और रेवती में शुक्र के रहने पर भय प्राप्त होता है ॥७३॥