भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 465, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 465

४४६ नारदीयपुराणम् वैशाखे श्रावणे पौषे आषाढेऽभ्युदितो बुधः । जगतां पापफलदस्त्वितरेषु शुभप्रदः ॥५१॥ इषोर्जमासयोः शस्त्रदुर्भिक्षाग्निभयप्रदः । उदितश्चंद्रजः श्रेष्ठो रजतस्फटिकोपमः ॥५२॥ द्विभाटजोदिमास्तस्य पंचमैकादशास्त्रिभात् । यन्नक्षत्रादितो जीवस्तन्नक्षत्राख्यवत्सरः ॥५३॥ कार्त्तिको मार्गशीर्षश्च नृणां दुष्टफलप्रदः । शुभप्रदौ पौषमाघौ मध्यमौ फाल्गुनो मधुः ॥५४॥ माधवः शुभदो ज्येष्ठो नृणां मध्यफलप्रदः । शुचिर्मध्यो नभः श्रेष्ठो भाद्रः श्रेष्ठः क्वचिन्तरः ॥५५॥ अतिश्रेष्ठ इषः प्रोक्तो मासानां फलमीदृशम् । सौम्ये भागे चरन्भानां क्षेमारोग्यसुभिक्षकृत् ॥५६॥ विपरीतो गुर्याम्ये मध्ये चरंसि मध्यमम् । पीताग्निश्यामहरितरक्तवर्णोङ्गिराः क्रमात् ॥५७॥ व्याध्यग्निचौरशस्त्रास्त्रभयदः प्राणिनां भवेत् । अनावृष्टि धूमनिभः करोति सुरपूजितः ॥५८॥ दिवादृष्टो नृपव्याध्यामयं वा राष्ट्रनाशनम् । संवत्सरशरीरं स्यात्कृत्तिका रोहिणी तथा ॥५९॥ नाभिस्त्वषाढयुगलमार्द्रा हृत्कुसुमं मघा । दुर्भिक्षाम्ररुद्भौतः शरीरे क्रूरपीडिते ॥६०॥ नाभ्यां क्षुत्तृड्भयं पुष्ये सम्यङ्मूलफलक्षयः । हृदये शस्य निधनं शुभं स्यात्संयुक्तैः शुभैः ॥६१॥ कारक होता है। वैशाख, श्रावण, पौष और आषाढ में उदित होने पर बुध पाप रूप फल देता है और अन्य मासों में उदित होने पर वह शुभ फल देता है। आश्विन और कार्तिक में बुध का उदय हो तो शस्त्र, दुर्भिक्ष और अग्नि का भय उत्पन्न करता है। यदि उदित हुए बुध की कान्ति चांदी अथवा स्फटिक के समान स्वच्छ हो तो वह श्रेष्ठ फल देता है ॥४८-५२॥ बृहस्पति-चार-फल- कृत्तिका आदि दो नक्षत्रों के आश्रय से कार्तिक आदि मास होते हैं; परन्तु अन्तिम (आश्विन), पञ्चम (फाल्गुन) और एकादश (भाद्रपद)-ये तीन नक्षत्रों से पूर्ण होते हैं। इसी प्रकार बृहस्पति का जिस नक्षत्र में उदय होता है, उस नक्षत्र से (मध्यम के अनुसार) संवत्सर का नाम होता है। उन संवत्सरों में कार्तिक और मार्गशीर्ष नामक संवत्सर प्राणियों के लिए अशुभ होते हैं। पौष और माघ नामक संवत्सर शुभ फल देते हैं। फाल्गुन और चैत्र नामक संवत्सर मध्यम (शुभ-अशुभ दोनों) फल देते हैं। वैशाख शुभप्रद और ज्येष्ठ मध्यम फल देने वाला होता है। आषाढ़ मध्यम और श्रावण उत्तम होता है तथा भाद्रपद भी कभी श्रेष्ठ होता है और कभी नहीं होता; परन्तु आश्विन संवत्सर प्रजा के लिए अत्यन्त श्रेष्ठ होता है। मुनिश्रेष्ठ ! इस प्रकार संवत्सरों का फल होता है ॥५३-५५३॥ बृहस्पति जब नक्षत्रों के उत्तर होकर चलता है, तब संसार में कल्याण, आरोग्य तथा सुभिक्ष करनेवाला होता है। जब नक्षत्रों के दक्षिण होकर चलता है, तब विपरीत परिणाम (अशुभ, रोगवृद्धि तथा दुर्भिक्ष) उपस्थित करता है। तथा जब मध्य होकर चलता है, उस समय मध्यम फल प्रस्तुत करता है। गुरु का बिम्ब यदि पीतवर्ण, अग्निसदृश, श्याम, हरित और लाल हो तो प्रजामें क्रमशः व्याधि, अग्नि, चोर, शस्त्र और अस्त्र का भय उप- स्थित करता है। यदि गुरु का वर्ण धुएं के समान हो तो वह अनावृष्टि कारक होता है। यदि गुरु दिन में (प्रातः सायं छोड़कर) दृश्य हो तो राजा का नाश, रोगभय अथवा राष्ट्र का विनाश होता है। कृत्तिका तथा रोहिणी ये संवत्सर के शरीर हैं। पूर्वाषाढ़ और उत्तराषाढ़ ये दोनों नाभि हैं, आर्द्रा हृदय और मघा संवत्सर का पुष्प हैं। यदि शरीर पापग्रह से पीड़ित हो तो दुर्भिक्ष, अग्नि और वायु का भय उपस्थित होता है। नाभि पापग्रह से युक्त हो तो क्षुधा और तृषा से पीड़ा होती है। पुष्य पापग्रह से आक्रान्त हो तो मूल और फलों का क्षय होता है। यदि हृदय-नक्षत्र पापग्रह से पीडित हो तो अन्नादि का नाश होता है। शरीर आदि शुभग्रह से संयुक्त हों तो