बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 458, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४३६ द्विघ्ने समर्तुमासाः स्युः पक्षतिथ्यौ गजाहते । सप्तघ्नं होनिशाक्षणीबुधैर्नागांशेष्टहोरिका ॥३४७॥ पुमान्परशुधृक्कृष्णो रक्तदृग्रक्षितुं क्षमः । तृषार्तकपदाश्वास्यो रक्तवस्त्रो घटाकृतिः ॥३४८॥ कपिलो ह्यधदृक्क्रूरो रक्तवस्त्रः क्षतव्रतः । क्षुत्तृषातर्तिदुग्धपटो लूनकुंचितमूर्धजः ॥३४९॥ मलिनः क्षुत्परोजास्यो दक्षः कृष्यादिकर्मणि । द्विपकायः सरभपात्पिंगलो व्याकुलांतरः ॥३५०॥ सौचिकीरूपिणी साध्वी ह्यप्रजोच्छ्रितपाणिका । उद्याने कवची धन्वी क्रीडेच्छुर्गस्डाननः ॥३५१॥ नृत्यादिविद्वरुणवद्वहुरत्नोधनुर्धरः । द्विपास्यकंठक्रोडास्यः काननेशरमाहिकः ॥३५२॥ आतन्वशाखां पालाशीं रौति मूर्द्धाहिकर्कशा । चिपिटास्यो हि संवीतो नौस्थः स्त्यर्थवज्रज्जले ॥३५३॥ तथा उक्त ध्रुवपिण्ड को १० से गुणा करके गुणनफल से वर्ष, ऋतु और और मास समझे । पक्ष और तिथि जाननी हो तो ध्रुवपिण्ड को ८ से गुणा करके २ से भाग देकर एक शेष हो तो शुक्ल पक्ष और दो शेष हो तो कृष्णपक्ष समझे । इसमें भी ९ जोड़ या घटाकर ग्रहण करना चाहिए । अर्थात् गुणनफल में ९ जोड़ या घटाकर भाग देना चाहिए । इसी प्रकार पक्षज्ञान होने पर गुणनफल में ही १५ से भाग देकर शेष के अनुसार प्रतिपदा आदि तिथि समझे तथा अहोरात्र जानना हो तो ध्रुवपिण्ड को ७ से गुणा करके दो से भाग देकर एक शेष हो तो दिन और दो शेष हो तो रात्रि समझे । लग्न-नवमांश, इष्ट-घड़ी तथा होरा जानना हो तो ध्रुवपिण्ड को ५ से गुणा करके अपने-अपने विकल्प से (अर्थात् लग्न जानने के लिए १२ से, इष्टघड़ी जानने के लिए ६० से) अथवा दिन या रात का ज्ञान होने पर दिनमान या रात्रिमान-घटी से), नवमांश के लिए ९ से तथा होरा के लिए २ से भाग देकर शेष द्वारा सबका ज्ञान करना चाहिए । इस प्रकार जिनके जन्मसमय आदि का ज्ञान न हो उनके लिए इन सब बातों का विचार करना चाहिए ॥३४७॥ द्रेष्काण का स्वरूप-हाथ में फरसा लिये हुए काले रंग का पुरुष, जिसकी आँखें लाल हों और जो सब जीवों की रक्षा करने में समर्थ हो, मेष के प्रथम द्रेष्काण का स्वरूप है । प्यास से पीडित एक पैर से चलने वाला, घोड़े के समान मुख, रक्तवस्त्रधारी और घड़े के समान आकार--यह मेष के द्वितीय द्रेष्काण का स्वरूप है ॥३४८॥ कपिलवर्ण, क्रूरदृष्टि, क्रूरस्वभाव, लाल वस्त्रधारी और अपनी प्रतिज्ञा भंग करने वाला-यह मेष के तृतीय द्रेष्काण का स्वरूप है । भूख और प्यास से पीडित, कटे-छँटे घुँघराले केश तथा दूध के समान धवल वस्त्र-यह वृष के प्रथम द्रेष्काण का स्वरूप है ॥३४९॥ मलिनशरीर भूख से पीडित, बकरे के समान मुख और कृषि आदि कार्यों में कुशल -यह वृष के दूसरे द्रेष्काण का रूप है । हाथी के समान विशालकाय, शरभ के समान पैर वाला, पिंगलवर्ण और व्याकुलचित्त--यह वृषभ के तीसरे द्रेष्काण का स्वरूप है ॥३५०॥ सुई से सीने- पिरोने का काम करने वाली, रूपवती, सुशीला तथा सन्तानहीना नारी, जिसने हाथ को ऊपर उठा रखा है, मिथुन का प्रथम द्रेष्काण है। कवच और धनुष धारण किये हुए उपवन में क्रीडा करने की इच्छा से उपस्थित गरुडसदृश मुख वाला पुरुष मिथुन का दूसरा द्रेष्काण है ॥३५१॥ नृत्य आदि की कला में प्रवीण, वरुण के समान रत्नों के अनन्त भांडार से भरा-पूरा, धनुर्धर वीर पुरुष मिथुन का तीसरा द्रेष्काण है। गणेश के समान कण्ठ, शूकर के सदृश मुख, शरभ के-से पैर और वन में रहने वाला-यह कर्क के प्रथम द्रेष्काण का रूप है ॥३५२॥ सिर पर सर्प धारण किये, पलास की शाखा पकड़कर रोती हुई कर्कशा स्त्री--यह कर्क दूसरे द्रेष्काण का स्वरूप है । चिपटा मुख, सर्प से वेष्टित, स्त्री की खोज में नौका पर बैठकर जल में यात्रा करने वाला पुरुष-यह कर्क के तीसरे द्रेष्काण का रूप है ॥३५३॥ सेमल के वृक्ष के नीचे गोदड़ और गोध को लेकर रोता