भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 459, कुल 1008 में से

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४४० नारदीयपुराणम् श्वा नरो जंबुकंगृध्रं गृहीत्वा रौति शाल्मलौ । धन्वी कृष्णाजिनो सिंहवाश्वोन्नतमातुरः ॥३५४॥ फलामिषघ्नः कूर्ची ना भल्लास्यः कपिचेष्टितः । पुष्पपूर्णघटाकन्याविद्येल्ला मलिनांबरा ॥३५५॥ धन्वी व्ययापकृच्छ्यामो लिपिकृद्रोमशोनरः । गौरीधौतांशु कासूच्चाकुंभहस्तासुरालये ॥३५६॥ मानोन्मान्मापसोतौलीभांडमुल्यविविंचतकः । क्षुत्तृड्युतो नरः कुंभीगोध्वास्यः स्त्रीसुतोपगः ॥३५७॥ धन्वीकिंतरचेष्टस्तु हेमवर्मामृगानुगः । सिंधु कूलंव्रजंतीस्त्रीनानासर्पसितांध्रिका ॥३५८॥ सौख्यस्पृहाह्रावृतांगीमर्व्रथंकच्छपाकृतिः । कूर्मास्यो मलये सिंहः श्वक्रोडमृगभीषकः ॥३५९॥ वास्यः श्वकायो धानुष्को रक्षस्तापसयज्ञिये । चंपकाभासने मध्या सिंधुरत्नविवर्द्धिनी ॥३६०॥ कूर्चासने चंपकाभो दंडो कौशेयकानिनी । परमोऽर्थे गृध्रमुखः स्नेहमद्याशनस्पृहः ॥३६१॥ दग्धानस्था लोहधरा समूषाभांडकच्चरा । भांडी रोमश्रवाः श्यामः किरीटी फलयंतधृक् ॥३६२॥ हुआ कुत्ते-जैसा मनुष्य--यह सिंह के प्रथम द्रेष्काण का स्वरूप है। धनुष और कृष्णमृगचर्म धारण किये, सिंह सदृश पराक्रमी तथा घोड़े के समान आकृति वाला मनुष्य--यह सिंह के दूसरे द्रेष्काण का स्वरूप है ॥३५४॥ फल और भोज्य पदार्थ रखने वाला, लम्बी दाढ़ी से सुशोभित, भालू जैसा मुख और वानरों के चंचल स्वभाववाला मनुष्य सिंह के तृतीय द्रेष्काण का रूप है। फूल से भरे कलश वाली, विद्याभिलाषिणी, मलिन वस्त्रधारिणी कुमारी कन्या--यह कन्या राशि के प्रथम द्रेष्काण का स्वरूप है। हाथ में धनुष, आय-व्यय का हिसाब रखने वाला, श्याम वर्ण शरीर, लेखनकार्य में चतुर तथा रोएं से भरा मनुष्य--यह कन्या राशि के दूसरे द्रेष्काण का स्वरूप है। गोरे अंगों पर धुले हुए स्वच्छ वस्त्र, ऊँचा कद, हाथ में कलश लेकर देव-मन्दिर की ओर जाती हुई--यह कन्या राशि के तीसरे द्रेष्काण का परिचय है ॥३५५-३५६॥ हाथ में तराजू और बटखरे लिये बाजार में वस्तुएं तोलने वाला तथा बरतन-भांडों की कीमत कूतने वाला पुरुष तुलाराशि का प्रथम द्रेष्काण है। हाथ में कलश लिये भूख- प्यास से व्याकुल तथा गोध के समान मुखवाला पुरुष, जो स्त्री पुत्र के साथ विचरता है, तुला का दूसरा द्रेष्काण है ॥३५७॥ हाथ में धनुष लिये हरिण का पीछा करने वाला, किन्नर के समान चेष्टा वाला, सुवर्ण कवचधारी पुरुष तुला का तृतीय द्रेष्काण है। एक नारी, जिसके पैर नाना प्रकार के सर्प लिपटे होने से श्वेत दिखाई देते हैं, समुद्र से किनारे की ओर जा रही है, यही वृश्चिक के प्रथम द्रेष्काण का रूप है ॥३५८॥ जिसके सब अंग सर्पों से ढके हैं और आकृति कछुए के समान है तथा जो स्वामी के लिए सुख की इच्छा करने वाली है, ऐसी स्त्री वृश्चिक दूसरा द्रेष्काण है। मलयगिरि का निवासी सिंह, जिसकी मुखाकृति कछुए-जैसी है, कुत्ते, सूकर और हरिण आदिका को डरा रहा है, वही वृश्चिक का तीसरा द्रेष्काण है ॥३५९॥ मनुष्य के समान मुख, घोड़े-जैसा शरीर, हाथ में धनुष लेकर तपस्वी और यज्ञों की रक्षा करनेवाला पुरुष धनु राशि का प्रथम द्रेष्काण है। चम्पापुष्प के समान कान्तिवाली, आसन पर बैठी हुई, समुद्र के रत्नों को बढ़ाने वाली, मझोले कद की स्त्री धनु का दूसरा द्रेष्काण है ॥३६०॥ दाढ़ी-मूंछ बढ़ाये, आसन पर बैठा हुआ, चम्पापुष्प के समान कान्तिमान्, दण्ड, पट्टवस्त्र और मृगचर्म धारण करने वाला पुरुष धनु का तीसरा द्रेष्काण है। (मगर के समान दाँत, रोएं से भरा शरीर तथा सूअर जैसी आकृति वाला पुरुष मकर का प्रथम द्रेष्काण है। कमलदल के समान नेत्रों वाली, आभूषणप्रिया, श्यामा स्त्री मकर का दूसरा द्रेष्काण है। हाथ में धनुष, कम्बल, कलश और कवच धारण करने वाला किन्नर के समान पुरुष मकर का तीसरा द्रेष्काण है।) गोध के समान मुख, तेल, घी और मधु पीने की इच्छा वाला, कम्बलधारी पुरुष कुम्भ का प्रथम द्रेष्काण है, हाथ में लोहा, शरीर में आभूषण, तथा मस्तक पर भाँड़ (बर्तन) लिये मलिन वस्त्र पहनकर जली गाड़ी पर बैठी हुई स्त्री कुम्भ का दूसरा द्रेष्काण है। कान में बड़े-बड़े रोम,

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