बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनौस्थोऽधौसंविधिभूषार्थं नानारत्नकरोचितः । नौस्थाब्धेः कूलमायांती सयूथां चम्पकानना ॥३६३॥ गर्ते सर्पावृतो नग्नो रुदंश्चौरानलादितः । एतादृशाः क्रियाश्चास्तु षड्विंशदुदिताः क्रमात् ॥३६४॥ एतत्संक्षेपतः प्रोक्तं जातकं मुनिसत्तम । निबोध संहितास्कंधं लोककृत्युपयोगिनम् ॥३६५॥ इति श्रीनारदीयपुराणे पूर्वभागे द्वितीयपादे बृहदुपाख्याने जातकनिरूपणन्नाम पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥५५॥ अथ षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः सनंदन उवाच क्रमाच्चैत्रादिमासेषु मेषाद्याः संक्रमा मताः । चैत्रशुक्लप्रतिपदि यो वारः स नृपः स्मृतः ॥१॥ मेषप्रवेषे सेनानीः कर्कटे शस्यपो भवेत् । समोद्यधीशवरः सूर्यो मध्यमश्चोत्तमो विधुः ॥२॥ नेष्टः कुजो बुधो जीवो भृगुस्त्वतिशुभंकरः । अधमो रविजो वाच्यो ज्ञात्वा चैषां बलाबलम् ॥३॥
शरीर में श्याम कान्ति, मस्तक पर किरीट तथा हाथ में फल-पत्र धारण करने वाला बर्तन का व्यापारी कुम्भ का तीसरा द्रेष्काण है। भूषण बनाने के लिए नाना प्रकार के रत्नों को हाथ में लेकर समुद्र में नौका पर बैठा हुआ पुरुष मीन का प्रथम द्रेष्काण है। जिसके मुख की कान्ति चम्पा के पुष्प के सदृश मनोहर है, वह अपने परिवार के साथ नौका पर बैठकर समुद्र के बीच से तट की ओर आती हुई स्त्री मीन का दूसरा द्रेष्काण है। गड्ढे के समीप तथा चोर और अग्नि से पीड़ित होकर रोता हुआ, सर्प से वेष्टित, नग्न शरीर वाला पुरुष मीन राशि का तीसरा द्रेष्काण है। इस प्रकार मेषादि बारह राशियों में होने वाले छत्तीस द्रेष्काणों के रूप क्रम से बताये गये हैं। मुनिश्रेष्ठ नारद ! यह संक्षेप में जातक नामक स्कन्ध कहा गया है। अब लोक व्यवहार के लिए उपयोगी संहिता स्कन्ध का वर्णन सुनो ॥३६१-३६५॥ श्री नारदीयपुराण के पूर्वभाग के द्वितीयपाद में जातक निरूपण नामक पचपनवां अध्याय समाप्त ॥५५॥
अध्याय ५६ त्रिस्कन्ध ज्योतिष का संहिताप्रकरण (विविध उपयोगी विषयों का वर्णन) सनन्दन बोले-नारद ! चैत्रादि मासों में क्रमशः मेषादि राशियों में सूर्य की संक्रान्ति होती है। चैत्र- शुक्ल-प्रतिपदा के आरम्भ में जो वार (दिन) हो, वही ग्रह उस (चान्द्र) वर्ष का राजा होता है। सूर्य के मेषराशि-प्रवेश के समय जो वार हो वह सेनापति (या मन्त्री) होता है। कर्क राशि की संक्रान्ति के समय जो वार हो, वह सस्य का अधिपति होता है। उक्त वर्ष आदि का अधिपति यदि सूर्य हो तो मध्यम (शुभ और अशुभ दोनों) फल देता है। चन्द्रमा हो तो उत्तम फल देता है। मंगल अधिपति हो तो (अशुभ) फल देता है। बुध, गुरु और शुक्र-ये तीनों अतिउत्तम फल देते हैं। शनि अधिपति हो तो अशुभ फल होता है। इन ग्रहों के बलाबल देखकर तदनुसार इसके न्यून या पूर्ण फल समझने चाहिए ॥१-३॥ ५६ ना० पु०