बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४४२ नारदीयपुराणम् दंडाकारे कबन्धे वा ध्वांक्षाकारेडथ कीलके । दृष्टेऽर्क्रमण्डले व्याधिभ्रान्तिश्चोरार्थनाशनम् ॥४॥ छत्रध्वजपताकाद्यसन्निभैस्तिमितैर्ध्वनैः । रविमंडलगैर्धूमैः सस्फुलिंगैर्जगत्क्षयः ॥५॥ सितरक्तैः पीतकृष्णैर्वणैर्विप्रादिपीडनम् । घ्नंति द्वित्रिचतुर्वर्णैर्भुवि राजजनान्मुने ॥६॥ ऊर्ध्वभानुकरैस्ताम्रैर्नाशं याति चमूपतिः । पीतैर्नृपसुतः श्वेतैः पुरोधाश्चित्रितैर्जनाः ॥७॥ धूम्रैर्नृपपिशंगैस्तु जलदाधोमुखैर्जगत् । शुभोऽर्कः शिशिरे ताम्रः कुंकुमाभा वसंतिके ॥८॥ ग्रीष्मश्चपांडुरश्चैव विचित्रो जलदागमे । पद्मोदराभः शरदि हेमंते लोहितच्छविः ॥६॥ पीतः शीते सिते वृष्टौ ग्रीष्मे लोहितमा रविः । रोगानं वृष्टिभयकृत् क्रमादुक्तो मुनीश्वर ॥१०॥ इन्द्रचापार्द्धमूर्तिस्तु भानुर्भूपविरोधकृत् । शशरक्तनिभे भानौ संग्रामो न चिराद्भुवि ॥११॥ मयूरपत्रसंकाशो द्वादशाब्दं न वर्षति । चन्द्रमासदृशो भानुः कुर्याद्भूपान्तरं क्षितौ ॥१२॥ अर्के श्यामे कीटभयं भस्मामे राष्ट्रजं तथा । छिद्रेऽर्क्रमंडले दृष्टं महाराजविनाशनम् ॥१३॥ धूमकेतु-पुच्छलतारा आदि के फल--यदि कदाचित् सूर्य-मण्डल में दण्ड (लाठी, कबन्ध (मस्तकहीन शरीर) कौआ या कील के आकार वाले केतु (चिह्न) देखने में आये तो वहाँ व्याधि, भ्रान्ति तथा चोरों के उपद्रव से धन का नाश होता है ॥४॥ छत्र, ध्वज, पताका या सजल मेघखण्ड सदृश अथवा चिनगारो-सहित धूम सूर्य-मण्डल में दीख पड़े तो उस देश का नाश हो जाता है ॥५॥ श्वेत, लाल, पीला अथवा काला सूर्यमण्डल दीखने में आये तो क्रम से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्णों को पीड़ा होती है। मुनीश्वर ! यदि दो, तीन या चार प्रकार के रंग सूर्यमंडल में दीख पड़े तो राजाओं का विनाश करता है। यदि सूर्य की ऊर्ध्वगामिनी किरण लाल रंग की दीख पड़े तो सेनापति का नाश होता है। यदि उसका पीला वर्ण हो तो राजकुमार का, श्वेत वर्ण हो तो राज- पुरोहित का तथा उसके अनेक वर्ण हों तो प्रजाजनों का नाश होता है। इसी तरह धूम वर्ण हो तो राजा का और पिशंग (कपिल) वर्ण हो तो मेघ का नाश होता है। यदि सूर्य की उक्त किरणें नीचे की ओर हों तो संसार का नाश होता है ॥६-७१/२॥ सूर्य शिशिर ऋतु (माघ-फाल्गुन) में तांबे के समान (लाल) दीखे तो संसार के लिए शुभ (कल्याणकारी) होता है। ऐसे हो वसन्त (चैत्र-वैशाख) में कुंकुमवर्ण, ग्रीष्म में पाण्डु (श्वेतपीतमिश्रित)-वर्ण, वर्षा में अनेकवर्ण, शरद् ऋतु में कमलवर्ण तथा हेमन्त में रक्तवर्ण का सूर्यबिम्ब दिखाई दे, तो उसे शुभप्रद समझना चाहिए। मुनिश्रेष्ठ नारद ! यदि शीतकाल में (अगहन से फाल्गुन तक) सूर्य का बिम्ब पीला, वर्षा में (श्रावण से कार्तिक तक) श्वेत तथा ग्रीष्म में (चैत्र से आषाढ़ तक) लाल रंग का दीख पड़े तो क्रम से रोग, अवर्षण तथा भय उपस्थित करने वाला होता है ॥८-१०॥ यदि कदाचित् सूर्य का आधा बिम्ब इन्द्रधनुष के सदृश दीख पड़े तो राजाओं में परस्पर विरोध उत्पन्न करता है। खरगोश के रक्त के सदृश हो तो शीघ्र ही राजाओं में युद्ध होता है यदि सूर्य का वर्ण मोर की पांख के समान हो, तो वहाँ बारह वर्षों तक वर्षा नहीं होती है। यदि सूर्य कभी चन्द्रमा के समान दिखाई दे, तो वहाँ के राजाओं को जीतकर दूसरा राजा राज्य करता है ॥११-१२॥ यदि सूर्य श्याम रंग का दीख पड़े तो कीड़ों का भय होता है। भस्म समान दीख पड़े तो समूचे राज्य पर भय उपस्थित होता है और यदि सूर्य मण्डल में छिद्र दिखाई दे, तो वहाँ के सम्राट् का नाश