भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 462

षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४४३

घटाकृतिः क्षुद्भयकृत्पुरघ्ना तोरणाकृतिः । छत्राकृते देशहतिः खंडभानुर्नृपांतकृत् ॥१४॥ उदयास्तमये काले विद्युदुल्का शनैर्यदि । तदा नृपवधो ज्ञेयस्तथवा राजविग्रहः ॥१५॥ पक्षं पक्षाद्धमर्केन्दुपरिविष्टावहर्निशम् । राजानमन्यं कुरुतो लोहिताम्बुदयस्तमौ ॥१६॥ उदयास्तमये भानुराच्छिन्नः शस्त्रसन्निभैः । घनैर्युद्धं खरोष्ट्राद्यैः पापरूपैर्भयप्रदम् ॥१७॥ याम्यशृंगोन्नतश्चंद्रः शुभदो मीनमेषयोः । सौम्यशृंगोन्नतः श्रेष्ठो नृयुङ्मकरयोस्तथा ॥१८॥ घटोक्षणस्तु समः कर्कचापयोः शरसन्निभः । चापवत्कीर्महर्योश्च शूलवत्तुलकर्कयोः ॥१९॥ विपरीतोदितश्चंद्रो दुर्भिक्षकलहप्रदः । आषाढद्वयमूसेंद्रधिष्ण्यानां याम्यगः शशी ॥२०॥ अग्निप्रदस्तोयचरवनसर्पविनाशकृत् । विशाखा मित्रयोर्याम्यपार्श्वगः पापगः शशी ॥२१॥ मध्यमः पितृदैवत्ये द्विदैवे सौम्यगः शशी । अप्राप्यपौष्णभाद्रौद्रामदुक्षार्विशशी शुभः ॥२२॥ मध्यगो द्वारदक्षाणि अतीत्य नववासवात् । यमेंद्राहीशनायेशमरुत्सार्द्रांततारकाः ॥२३॥ ध्रुवादितिद्विदैवाः स्युरध्यर्द्धाऽश्वापराः समाः । याम्यशृंगोन्नतो नेष्टः शुभः शुक्ले पिपीलिका ॥२४॥


होता है ॥१३॥ कलश के समान आकार वाला सूर्य देश में भुखमरी का भय उपस्थित करता है। तोरणसदृश आकारवाला सूर्य ग्राम तथा नगरों का नाशक होता है। छत्राकार सूर्य उदित हो तो देश का नाश और सूर्य बिम्ब खण्डित दीख पड़े तो राजा का विनाश होता है ॥१३-१४॥ यदि सूर्योदय या सूर्यास्त के समय बिजली की गड़गड़ाहट और वज्रपात एवं उल्कापात हो तो राजा का नाश या राजाओं में परस्पर युद्ध होता है। यदि पन्द्रह या साढ़े सात दिन तक दिन में सूर्य पर तथा रात में चन्द्रमा पर परिवेश (मण्डल) हो अथवा उदय और अस्त-समय में वह अत्यन्त रक्तवर्ण का दिखाई दे, तो राजा का परिवर्तन होता है ॥१५-१६॥ उदय या अस्त के समय यदि सूर्य शस्त्र के समान आकार वाले या गदहे या ऊंट आदि के सदृश अशुभ आकार वाले मेघ से खण्डित-सा प्रतीत हो तो राजाओं में भयानक युद्ध होता है ॥१७॥ चन्द्रशृङ्गोन्नति-फल--मीन और मेष राशि में यदि (द्वितीया तिथि को उदयकाल में) चन्द्रमा का दक्षिण शृंग उन्नत हो तो वह शुभप्रद होता है। मिथुन और मकर में यदि उत्तर शृङ्ग उन्नत हो तो शुभ होता है कुम्भ और वृष में यदि दोनों शृंग सम हो तो शुभ है। कर्क और धनु में बाण के सदृश हो तो शुभ वृश्चिक और सिंह में भी धनुष सदृश हो तो शुभ है तथा तुला ओर कन्या में यदि चन्द्रमा का शृंग शूल के सदृश दीख पड़े तो शुभ फल समझना चाहिए। इससे विपरीत स्थिति में चन्द्रमा का उदय हो तो उस मास में पृथ्वी पर दुर्भिक्ष, राजाओं में परस्पर विरोध आदि अशुभ फल होते हैं ॥१८-१९३॥ पूर्वाषाढ़, उत्तराषाढ़, और मूल ज्येष्ठा--इन नक्षत्रों में चन्द्रमा यदि दक्षिण दिशा में हो तो जलचर, वन चर और सर्प का नाश तथा अग्नि का भय होता है। विशाखा और अनुराधा में यदि दक्षिण भाग में हो तो पापफल देने वाला होता है। मघा और विशाखा में यदि चन्द्रमा मध्यभाग में होकर चले तो भी शुभ प्रद होता है। रेवती से मृगशिरा पर्यन्त ६ नक्षत्र 'अनागत' आर्द्रा से अनुराधा पर्यन्त बारह नक्षत्र 'मध्ययोगी' ओर वासव (ज्येष्ठा) से नौ नक्षत्र 'गतयोगी' हैं। इनमें भी चन्द्रमा उत्तरभाग में रहने पर शुभप्रद होता है ॥२०-२२३॥ भरणी, ज्येष्ठा, अश्लेषा, आर्द्रा, शतभिषा और स्वाती—ये अर्धभोग (४०० कला), ध्रुव संज्ञक (तीनों उत्तरा, रोहिणी), पुनर्वसु और विशाखा—ये सार्धक इयोढ़ा (१२०० कला) भोग करने वाले हैं तथा अन्य नक्षत्र सम (पूर्ण) भोग (८०० कला) हैं। साधारणतया चन्द्रमा की दक्षिण शृङ्गोन्नति अशुभ और उत्तर शृङ्गोन्नति शुभ-