भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 463

४४४ नारदीयपुराणम् कार्यहानिः कार्यवृद्धिर्हानिवृद्धियंथाक्रमम् । सुभिक्षकृद्विशालैन्दुर्विशालोधघनाशनः ॥२५॥ अधोमुखे शस्त्रभयं कलहो दण्डसन्निभे । कुजायैर्निहते शृंगे मंडले वा यथाक्रमम् ॥२६॥ क्षेमान्नं वृष्टिभूपालजननाशः प्रजायते । सत्याष्टनवमर्क्षेषु सोदयाद्विक्रमे कुजे ॥२७॥ तद्वक्रमुष्णसंज्ञं स्यात्प्रजापीडाग्निसंभ्रमः । दशमैकादशे ऋक्षे द्वादशर्वा प्रतीपयः ॥२८॥ कृक्रं वक्रमुखं ज्ञेयं सस्यवृष्टिविनाशकृत् । कुजे त्रयोदशे ऋक्षे वक्रिते वा चतुर्दशे ॥२९॥ व्यालास्यवक्रं तत्तस्मिन्सस्यवृष्टिविनाशनम् । पंचदशे षोडशर्के वक्रे स्याद्रुधिराननम् ॥३०॥ दुर्भिक्षं क्षुद्भयं रोगान्करोति क्षितिनंदनः । अष्टादशे सप्तदशे तद्वक्रं मुशलाह्वयम् ॥३१॥ दुर्भिक्षं धनधान्यादिनाशनं भयकृत्सदा । फाल्गुन्योरुदितो भौमो वैश्वदेवे प्रतीपगः ॥३२॥ अस्तगश्चतुरास्यार्के लोकत्रयविनाशकृत् । उदितः श्रवणे पुष्ये वक्रगोधनहानिदः ॥३३॥ यद्दिग्गोऽभ्युदितो भौमस्तद्दिग्भूपभयप्रदः । मघामध्यगतो भौमस्तत्र चैव प्रतीपगः ॥३४॥ अवृष्टिशस्त्रभयदः पीडद्यं देवा नृपांतकृत् । पितृद्विदैवधातॄणां भिद्यंते गंडतारकाः ॥३५॥ दुर्भिक्षं मरणं रोगं करोति क्षितिजस्तदा । त्रिषूत्तरासु रोहिण्यां नैर्ऋते श्रवणे मृगे ॥३६॥ अवृष्टिदश्चरन्भौमो दक्षिणेरोहिणीस्थितः । भूमिजः सर्वधिष्ण्यानामुद्गामी शुभप्रदः ॥३७॥


प्रद है। तिथि के अनुसार चन्द्रमा में यदि शुक्लता में (कमी) हो तो प्रजा के कार्यों में हानि और शुक्लता में वृद्धि (अधिकता) हो तो प्रजाजन की वृद्धि होती है। समता में समता होतो है। यदि चन्द्रमा का बिम्ब मध्यम मान से विशाल (बड़ा) देखने में आये तो सुभिक्षकारक और छोटा दीख पड़े तो दुर्भिक्षकारक होता है ॥२३-२५॥ चन्द्रमा का शृंग अधोमुख हो तो शस्त्र का भय लाता है। दण्डाकार हो तो (राजा-प्रजा में) कलह होता है। चन्द्रमा का शृंग अथवा बिम्ब मंगलादि ग्रहों (मंगल) बुध, गुरु, शुक्र तथा शनि) से आहत दीख पड़े तो क्रमशः क्षेम, अन्नादि, वर्षा, राजा और प्रजा का नाश होता है ॥२६॥

भौम-चार-फल- जिस नक्षत्र में मंगल का उदय हो, उससे सातवें, आठवें या नवें नक्षत्र में वक्र हो तो वह 'उष्ण' नामक वक्र होता है। उसमें प्रजा को पीड़ा और अग्नि का भय होता है। यदि उदय के नक्षत्र से दसवें, ग्यारहवें तथा बारहवें नक्षत्र में मंगल वक्र हो तो वह 'अश्वमुख' नामक वक्र होता है। उसमें अन्न और वर्षा का नाश होता है। यदि तेरहवें या चौदहवें नक्षत्र में वक्र हो तो 'व्यालमुख' वक्र कहलाता है। उसमें भी अन्न और वर्षा का नाश होता है। पन्द्रहवें या सोलहवें नक्षत्र में वक्र हो तो 'रुधिरानन' वक्र कहलाता है। उसमें मंगल दुर्भिक्ष, क्षुधा तथा रोग को बढ़ाता है। १७ वें या १८ वें नक्षत्र में वक्र हो तो वह 'मुसल' नामक वक्र होता है। उससे धन-धान्य का नाश तथा दुर्भिक्ष का भय होता है। यदि मंगल पूर्वाफाल्गुनी या उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में उदित होकर उत्तराषाढ़ में वक्र हो तथा रोहिणी में अस्त हो तो तीनों लोकों के लिए नाशकारी होता है। यदि मंगल श्रवण में उदित होकर पुष्य में वक्रगति हो तो धन की हानि करने वाला होता है ॥२७-३३॥

मंगल जिस दिशा में उदित होता है, उस दिशा के राजा के लिए भयकारक होता है। यदि मघा नक्षत्र के मध्य होकर चलता हुआ मंगल उसी में वक्र हो जाय तो अवर्षण और शस्त्र का भय लाता, है तथा राजा के लिए विनाशकारी होता है। यदि मंगल मघा, विशाखा या रोहिणी के योगतारा का भेदन करके चले तो दुर्भिक्ष मरण तथा रोग लाने वाला होता है। उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़, उत्तर भाद्रपद, रोहिणी, मूल, श्रवण और मृगशिरा--इन नक्षत्रों के बीच में तथा रोहिणी के दक्षिण होकर मंगल चले तो अनावृष्टिकारक होता है। मंगल सब नक्षत्रों के उत्तर होकर चले तो शुभप्रद है और दक्षिण होकर चले तो अशुभ फल और मनुष्यों में विरोध होता है ॥३४-३७॥