बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४३८ नारदीयपुराणम् लग्नत्रिकोणे धीज्यत्यंशेविकल्पावयवाः समाः । ग्रीष्मोगेऽर्के परे रम्यापनतांप्रतुरर्कभात् ॥३४१॥ चन्द्रज्ञजीवावृव्यस्याः शुक्रारार्किभिरन्यथा । दृक्केराद्यैः पूर्वमासस्तिथिस्तत्वानुपातः ॥३४२॥ विलोमजन्म भागैश्च वेला रात्रियुसंज्ञके । त्रिकोणोत्तमवार्यवि लग्नं वा लग्भनामने ॥३४३॥ यावदूनो विधुर्लग्नात्तावच्चंद्राच्च जन्मभे । गोहरी युग्मवसुभे क्रियजूके मृगांगने ॥३४४॥ दशाष्टसप्तविषये गुण्याः शेषाः स्वसंख्यया । जीवसोमकर्विज्ञाः स्युः राघवाद्यायरेञ्जवत् ॥३४५॥ भानां नित्यो विधिः खेटवशाद्वर्गणास्तथा । सप्तघ्नं भहृतं शेषमृक्षं नवधनर्णतः ॥३४६॥
५, ९ राशि में गुरु समझकर फिर प्रश्नकर्ता के वयस् के अनुसार वर्षमान की कल्पना करनी चाहिए। लग्न में सूर्य हो तो ग्रीष्म ऋतु, अन्यथा अन्य ग्रहों के ऋतु का वर्णन पहले किया जा चुका है। अयन और ऋतु में भिन्नता हो तो चन्द्रमा, बुध और गुरु की ऋतुओं के स्थान में क्रम से शुक्र, मंगल, शनि की ऋतु परिवर्तित करके समझना चाहिए तथा ऋतु सर्वथा सूर्य की राशि से ही (सौर मास से ही) ग्रहण करनी चाहिए। इस प्रकार अयन और ऋतु के ज्ञान होने पर लग्न के द्रेष्काण में पूर्वार्ध हो तो ऋतु का प्रथम मास, उत्तरार्ध हो तो द्वितीय मास समझना चाहिए तथा द्रेष्काण के पूर्वार्ध या उत्तरार्ध के भुक्तांशों से अनुपात द्वारा तिथि (सूर्य के गत अंशादि) का ज्ञान करना चाहिए ॥३४०-३४२॥ दिन-रात्रि-जन्म-ज्ञान--प्रश्नलग्न में दिनसंज्ञक, रात्रिसंज्ञक राशियां हों तो विलोम क्रम से (दिनसंज्ञक राशि में रात्रि और रात्रिसंज्ञक राशि में दिन) जन्म का समय समझना चाहिए और लग्न के अंशादि से अनुपात द्वारा इष्ट घट्यादि को समझना चाहिए ! जन्मलग्नज्ञान--केवल जन्मलग्न जानने के लिए प्रश्नकर्ता प्रश्न करे तो लग्न से १, ५, ९ में जो राशि बली हो, वही उसका जन्मलग्न समझना चाहिए अथवा वह जिस अंग का स्पर्श करते हुए प्रश्न करे, उस अंग की राशि को ही जन्मलग्न कहना चाहिए ॥३४३॥ जन्मराशिज्ञान--जन्म-राशि जानने के लिए प्रश्न करे तो प्रश्नलग्न से जितने आगे चन्द्रमा हो, चन्द्रमा से उतने ही आगे जो राशि हो वह पूछने वाले की जन्मराशि समझनी चाहिए ॥३४३१/२॥ प्रकारान्तर से अज्ञात जन्मकालादि का ज्ञान--प्रश्नलग्न में वृष या सिंह हो तो लग्नराश्यादि को कलात्मक बनाकर १० से गुणा करे। मिथुन या वृश्चिक हो तो ८ से, मेष या तुला हो तो ७ से, मकर या कन्या हो तो ५ से गुणा करे। शेष राशियों (कर्क, धन, कुम्भ, मीन) में से कोई लग्न हो तो उसकी कला को अपनी संख्या से (जैसे-कर्क को ४ से) गुणा करे। यदि लग्न में ग्रह हो तो फिर उसी गुणनफल को ग्रहगुण कों से भी गुणा करे। जैसे--बृहस्पति हो तो १० से, मंगल हो तो ८ से, शुक्र हो तो ७ से, बुध हो तो ५ से, अन्य ग्रह (रवि) शनि और चन्द्रमा) हों तो ५ से गुणा करे। इस प्रकार लग्न की राशि के अनुसार गुणन तो निश्चित ही रहता है। यदि उसमें ग्रह हो तभी ग्रह का गुणन भी करना चाहिए। जितने ग्रह हों, सबके गुणक से गुणा करना चाहिए। इस प्रकार गुणनफल को ध्रुवपिण्ड मानकर उसको ७ से गुणा कर २७ के द्वारा भाग देकर १ आदि शेष के अनुसार अश्विनी आदि जन्मनक्षत्र समझना चाहिए। इस प्रणाली में विशेषता यह है कि उक्त रीति से आयी हुई संख्या में कभी ९ जोड़कर और कभी ९ घटाकर नक्षत्र लिया जाता है ॥३४४-३४६॥