भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 456

पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४३७ स्वगुणैर्निधनं कुर्याद्वलवान्यो द्वयोर्भवेत् । लग्नांशेशसदृक्स्थाने मृत्युर्योगेक्षणादिभिः ॥३३४॥ मोहोऽतेनुदितांशस्य तुल्यो द्विघ्नः स्वपेक्षते । शुभेक्षिते तु त्रिगुणः कल्प्यमन्यत्स्वबुद्धितः ॥३३५॥ वह्न्यम्बुभस्मसकलेदशोषव्यालैर्मृतिस्थितैः । बिद्रुतश्चिन्तनीयश्च यथोक्तो मृत्युरंगिनः ॥३३६॥ गुरुः शशांकशुक्रौ च सूर्यभौमौ यमेंदुजौ । देवपित्रतिरक्तोथ नारकान्कुर्युरष्टमे ॥३३७॥ रवींदुबलवंशनाथाच्छ्रेष्ठसममाधमाः । तुंगः सांदन्केनुगतिः षड्‌भ्रदृक्कपः ॥३३८॥ द्यूनस्थितो गुरुर्वापि रिपुकेंद्रविनाशगः । स्वोच्चस्थोऽंगे व्यये सौम्यभागे मोक्षो बलान्यतः ॥३३९॥ आधाने जन्मज्ञाने तु वृक्षतां लग्नतो वदेत् । पूर्वापराद्धैर्लग्नस्य सौम्ये वाच्यपनेजनिः ॥३४०॥ कारक होता है । लग्न में जो नवमांश होता है, उसका स्वामी जो ग्रह हो, उसके समानस्थान (अर्थात् वह जिस राशि में हो उस राशि का जैसा स्थान बताया गया है, वैसे स्थान) तथा उस पर जिस ग्रह का योग या दृष्टि हो उसके समान स्थान में, परदेश में मनुष्य का मरण होता है तथा लग्न के जितने अंश अनुदिन (भोग्य) हों, उन अंशों में जितने समय हों उतने समय तक मरणकाल में मोह होता है। यदि उस पर अपने स्वामी की दृष्टि हो तो उससे द्विगुणित समय पर्यन्त मोह होता है। शुभग्रह की दृष्टि हो त्रिगुण मोह होता है। इस विषय की अन्य बातें अपनी बुद्धि से विचार कर समझनी चाहिए ॥३३३-३३५॥ शव-परिणाम-अष्टम स्थान में जिस प्रकार का द्रेष्काण हो उसके अनुसार देहधारी की मृत्यु और उसके शव के परिणाम पर विचार करना चाहिए । यथा अग्नि (पापग्रह) का द्रेष्काण हो तो मृत्यु के बाद उसका शव जलाकर भस्म किया जाता है । जल (सौम्य) द्रेष्काण हो तो जल में फेंका जाने पर वहीं गल जाता है। यदि सौम्य द्रेष्काण पापग्रह से युक्त या पाप द्रेष्काण शुभग्रह से युक्त हो तो शव न जलाया जाता है, न जल में गलाया जाता है; अपितु सूर्यकिरण और वायु से सूख जाता है। यदि सर्प द्रेष्काण अष्टम भाव में हो तो उस शव को गीदड़ और कौए आदि नोंचकर खाते हैं ॥३३६॥ पूर्वजन्मस्थिति-सूर्य और चन्द्रमा में जो अधिक बलवान् हो, वह जिस द्रेष्काण में स्थित हो उस द्रेष्काण के स्वामी के अनुसार पूर्वजन्म की स्थिति समझी जाती है। यथा- उक्त द्रेष्काण का स्वामी गुरु हो तो जातक पूर्वजन्म में देवलोक में था। चन्द्रमा या शुक्र द्रेष्काण का स्वामी हो तो वह पितृ लोक में था। सूर्य या मंगल द्रेष्काण का स्वामी हो तो वह जातक पहले जन्म में भी मृत्युलोक में ही था और शनि या बुध हो तो वह पहले नरक लोक में रहा है-ऐसा समझना चाहिए। यदि उक्त द्रेष्काण का स्वामी अपने उच्च में हो तो जातक पूर्वजन्म में देवादि लोक में श्रेष्ठ था । यदि उच्च और नीच के मध्य में हो तो उस लोक में उसकी मध्यम स्थिति थी और यदि अपने नीच में हो तो वह उस लोक में निम्न कोटि की अवस्था में था- ऐसा उच्च और नीच स्थान के तारतम्य से समझना चाहिए ॥३३७॥ गति-भावी जन्म की स्थिति-षष्ठ और अष्टम भाव के द्रेष्काणों के स्वामी में से जो अधिक बली हो, मरने के बाद जातक उसी ग्रह के (पूर्वदर्शित) लोक में जाता है तथा सप्तम स्थान में स्थित ग्रह बली हो तो वह अपने लोक में ले जाता है ॥३३८॥ मोक्ष-योग-यदि वृहस्पति अपने उच्च में होकर ६, १, ४, ७, ८, १० अथवा १२ में शुभग्रह के नवमांश में हो और अन्य ग्रह निर्बल हों तो मरण होने पर मनुष्य का मोक्ष होता है। यह योग जन्म और मरण दोनों कालों से देखना चाहिए ॥३३९॥ अज्ञात जन्म-समय को जानने का प्रकार-जिस व्यक्ति के आधान या जन्म का समय अज्ञात हो, उसके प्रश्नलग्न से जन्म-समय समझना चाहिए। प्रश्नलग्न के पूर्वार्ध (१५ अंश तक) में उत्तरायण और उत्तरार्ध (१५ अंश के बाद) में दक्षिणायन जन्म का समय समझना चाहिए। त्र्यंश (द्रेष्काण) द्वारा क्रमशः लग्न,