बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४३६ नारदीयपुराणम् शस्त्राग्निरोगोऽशुभांतस्थे चंद्रे भौमगृहस्थिते । मृत्युश्चाथ मृगे चंद्रे कर्के मंदे जलोदरात् ॥३२२॥ स्त्रियामिदौ रक्तशोथात्सौरैरज्ज्वग्निपातजः । पुत्रधर्मस्थस्योर्बधात्पापयोः सददृष्टयोः ॥३२३॥ सपाशसर्पनिगडेॄङ्केमृत्यौ तु बंधनः । स्त्रियां सपापेऽब्जे द्यूने सिते मेषे रवौ तनौ ॥३२४॥ मरणं स्वीकृते गेहे ह्यथ तुर्य कुजे रवौ । यमे खैऽगत्रिकोणस्थैः क्षीणचंद्राशुभैः सकृत् ॥३२५॥ तुर्येऽर्के खे कुजे क्षीणचन्द्रदृष्टे समिद्धतः । रंध्रखांग जलैः क्षीणेंद्वारार्किविसंयुतैः ॥३२६॥ लकुटेनाथ तैरैव खांकांगतययस्थितैः । धूमानिबंधनैः कार्यः कुदनैर्मरणं भवेत् ॥३२७॥ बंध्वस्तखस्थैभौमार्कमंदैः शस्त्राग्निराजभिः । सौरेंद्वारैः स्वांबुखस्थैः क्षतकेभ्यंगया ततः ॥३२८॥ खेऽर्के तुर्ये कुजे यानपातादथ कुजेऽस्तगे । यंत्रोसीदुनतः क्षीणचंद्रयुक्ते मृतिमर्वेत् ॥३२९॥ भौमार्कशीतकिरणैर्जूकाशशनिभस्थितैः । क्षीणेंद्वर्ककुजैः खास्तांबुस्थैर्वारकरे मृतिः ॥३३०॥ बल्यारदृष्टे क्षीणेदौ मंदे निधनसंस्थिते । गुह्यरुक्क्रिमिशस्त्राग्निदाहजो मृत्युरंगिनः ॥३३१॥ सौरेऽर्केऽस्ते मृतो मंदे क्षीणेदौ भुव्यसंयुते । लग्नध्यायास्तपःस्थार्कभौमचन्द्रनिशाकरैः ॥३३२॥ शैलशृंगस्वरग्रपातोर्नुनिधनं भवेत् । दृक्कोत्तरे तुर्द्वाविंशस्तत्पतिर्मृत्युपोपि वा ॥३३३॥ मकर में चन्द्रमा और कर्क में शनि हो तो जलोदर रोग से मरण होता है। कन्याराशि में स्थित चन्द्रमा दो पापग्रहों के बीच में हो तो रक्तशोथ रोग से मृत्यु होती है, यदि दो पापग्रहों के बीच में स्थित चन्द्रमा, शनि की राशि (मकर और कुम्भ) में हों तो रज्जु (रस्सी), अग्नि अथवा ऊंचे स्थान से गिरकर मृत्यु होती है। ५, ९ भावों में पापग्रह हों और उन पर शुभग्रह की दृष्टि न हो तो बन्धन से मृत्यु होती है ॥३२३॥ अष्टम भाव में पाश, सर्प या निगड द्रेष्काण हो तो भी बंधन से ही मृत्यु होती है। पापग्रह के साथ बैठा हुआ चन्द्रमा यदि कन्याराशि में होकर सप्तम भाव में स्थित हो तथा मेष में शुक्र और लग्न में सूर्य हों तो अपने घर में स्त्री के निमित्त से मरण होता है। चतुर्थ भाव में मंगल या सूर्य हों, दशम भाव में शनि हो और लग्न, ५, ९ भावों में पापग्रहसहित चन्द्रमा हो अथवा चतुर्थ भाव में सूर्य और दशम में मंगल रहकर क्षीण चन्द्रमा से दृष्ट हों तो इन योगों में काष्ठ से आहत होकर मृत्यु होती है ॥३२४-३२५॥ यदि ८, १०, लग्न, तथा ४ भावों में क्षीण चन्द्रमा, मंगल, शनि और सूर्य हों तो लाठी के प्रहार से मृत्यु होती है। यदि वे ही (क्षीण चन्द्रमा, मंगल, शनि तथा सूर्य) १०, ९, लग्न और ५ भावों में हों तो मुद्गर आदि के आघात से मृत्यु होती है ॥३२६-३२७॥ यदि ४, ७, १० भावों में क्रमशः मंगल, रवि और शनि हों तो शस्त्र, अग्नि तथा राजा के द्वारा मृत्यु होती है यदि शनि, चन्द्रमा और मंगल-ये २, ४, १० भावों में हों तो कीड़ों के क्षत से मरण होता है ॥३२८॥ यदि दशम भाव में सूर्य और चतुर्थ भाव में मंगल हों तो सवारी पर से गिरने के कारण मृत्यु होती है। यदि क्षीण चन्द्रमा के साथ मंगल सप्तम भाव में हो तो यन्त्र (मशीन) के आघात से मृत्यु होती है ॥३२९॥ यदि मंगल, शनि और चन्द्रमा - ये तुला, मेष तथा शनि की राशि (मकर, कुम्भ) में हों अथवा क्षीण चन्द्रमा, सूर्य और मंगल - थे १०, ७, ४ भावों में स्थित हो तो विष्ठा के समीप मृत्यु होती है ॥३३०॥ क्षीण चन्द्रमा बली, मंगल से दृष्ट हो और शनि सप्तम भाव में हो तो गुह्य (बवासीर आदि) रोग या कीड़ा, शस्त्र, अग्नि अथवा काष्ठ के आघात से मृत्यु होती है। मंगल सहित सूर्य सप्तम भाव में, शनि अष्टम में और क्षीण चन्द्रमा चतुर्थ भाव में हो तो पक्षी द्वारा मृत्यु होती है, यदि लग्न, ५, ८, ९ भावों सूर्य, मंगल, शनि और चन्द्रमा हों तो पर्वत-शिखर से गिरने के कारण अथवा वज्रपात से या दीवार गिरने से मृत्यु होती है ॥३३१-३३२॥ लग्न से १२ वां द्रेष्काण अर्थात् अष्टम भाव का द्रेष्काण जो हो उसका स्वामी अथवा अष्टम भाव का स्वामी- ये दोनों या इनमें से जो बली हो वह अपने गुणों से (पूर्वोक्त अग्निशस्त्रादि द्वारा) मनुष्य के लिए मरण-