बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४३५ शुक्राब्जयोर्लग्नगयोः सुखिनीर्ष्यासन्विता । ज्ञेन्द्वोः कलासु निपुणा सुखिता च गुणान्विता ॥३११॥ शुक्रेज्ञयोस्तु सुभगा कलाज्ञा रुचिरांगना । अनेकसौख्यार्थगुणा लग्ने सौम्यत्रये स्थिते ॥३१२॥ क्रूरेऽष्टमेऽष्टमेशांशे यस्य स्यात्तद्वयः समे । वैधव्यं च मृतिस्तस्या स्वयं सत्स्वर्थगेषु तु ॥३१३॥ अल्पापत्यत्वमब्जेऽस्याः कन्यालिहरिगोष्ठ तु । सौरे मध्यबले चन्द्रशुक्रेज्ञर्बलवर्जितैः ॥३१४॥ शेषैः सबीर्यैरोजर्क्षे लग्ने कुरूपिणी भवेत् । जीवार्कविसौम्येषु बलिषु समभे तनौ ॥३१५॥ विख्यातानेकशास्त्रज्ञा वनिता ब्रह्मवादिनी । पापेऽस्ते नवमस्थस्य प्रव्रज्यानेति भामिनी ॥३१६॥ उद्वाहे वरणे प्रश्ने सर्वमेतद्धि चिंतयेत् । मृत्युस्थानं पश्यतां स्याद्बलिना धातुकोषतः ॥२१७॥ नृणां मृत्युहितं युक्तं भगात्रोत्थोपथसूरिभिः । सबीर्येर्बहुजोऽप्यापक्षत्ज्वररुगुद्भवः ॥३१८॥ तदृग्द्भवश्चाष्टमस्थैः सूर्याद्यैश्चं चरादिषु । परस्वाध्वप्रदेशेषु मृत्युः सूर्यमहीजयोः ॥३१९॥ स्वबंधुस्थितयोः पुंसः शैलाग्राभिरतस्य च । बंध्वस्तकर्मगैर्मन्दचन्द्रभूजैः प्रहौ मृतिः ॥३२०॥ स्त्रियां हिमोष्णकरयोः स्वजनात्पापदृक्तयोः । तोयमृतो रवौन्दू तु स्यातां यद्युभयोदये ॥३२१॥ शुक्र और चन्द्रमा लग्न में हों तो वह स्त्री सुखिनी तथा ईर्ष्यालु होतो है । यदि बुध और चन्द्रमा लग्न में हों तो कलाओं को जानने वालो तथा सुख और गुणों से युक्त होतो है शुक्र और बुध लग्न में हों तो सौभाग्यवती, कलाओं को जानने वाली और परमसुन्दरी होती है। लग्न में तीन शुभग्रह हों तो वह अनेक प्रकार के सुख, धन और गुणों से युक्त होती है ॥३११-३१२॥ पापग्रह अष्टम भाव में हो तो वह स्त्री अष्टमेश जिस ग्रह के नवमांश में हो उस ग्रह के पूर्वकथित बाल्य आदि वयस् में विधवा होती है। यदि द्वितीय भाव में शुभग्रह हों तो वह स्त्री स्वयं ही स्वामी के सम्मुख मृत्यु को प्राप्त होती है। कन्या, वृश्चिक, सिंह या वृष राशि में चन्द्रमा हों तो स्त्री थोड़ी संततिवाली होती है, यदि शनि मध्यम बली तथा चन्द्रमा, शुक्र और बुध ये तीनों निर्बल हों तथा शेष ग्रह (सूर्य मंगल और गुरु) बली होकर विषम राशि-लग्न में हों तो वह स्त्री कुरूपा होती है ॥३१३-३१४½॥ गुरु, मंगल, शुक्र, बुध ये चारों बली होकर समराशि लग्न में स्थित हों तथा वह स्त्री अनेक शास्त्रों को जानने वाली ब्रह्मवादिनी तथा लोक में विख्यात होती है ॥३१५½॥ जिस स्त्री के जन्म लग्न से सप्तम में पाप ग्रह हो और नवम भाव में कोई ग्रह हो स्त्री तो पूर्वकथित नवमस्थ ग्रहजनित प्रव्रज्या को प्राप्त होती है। इन (कहे हुए) विषयों का विवाह वरण या प्रश्नकाल में भी विचार करना चाहिए ॥३१६½॥ निर्वाण (मृत्यु) विचार— लग्न से अष्टम भाव को जो ग्रह देखते हैं, उनमें जो बलवान् हो उसके धातु (कफ, पित्त या वात) के प्रकोप से जातक (स्त्री-पुरुष) का मरण होता है। अष्टम भाव में जो राशि हो, वह कालपुरुष के जिस अंग (मस्तकादि) में पड़ती हो, उस अंग में रोग होने से जातक का मरण होता है। बहुत ग्रहों की दृष्टि या योग हो तो उन-उन ग्रहों से सम्बन्ध रखने वाले रोगों से मरण होता है। अष्टम में सूर्य हो तो अग्नि से, चन्द्रमा हो तो जल से, मंगल हो तो शस्त्रघात से, बुध हो तो ज्वर से, गुरु हो तो अज्ञात रोग से, शुक्र हो तो प्यास से और शनि हो तो भूख से मरण होता है। तथा अष्टम भाव में चर राशि हो तो परदेश में, स्थिर राशि हो तो स्वस्थान में और द्विस्वभाव राशि हो तो मार्ग में मृत्यु होती है। सूर्य और मंगल यदि १०, ४ भाव में हों तो पर्वत आदि उच्च स्थान से गिरने से मनुष्य की मृत्यु होतो है ॥३१७-३१९½॥ ४, ७, १० भावों में यदि शनि, चन्द्र, मंगल हों तो कुएं में गिरकर मृत्यु होती है। कन्याराशि में सूर्य और चन्द्रमा दोनों हों, उन पर पापग्रह की दृष्टि हो तो अपने सम्बन्धी के द्वारा मरण होता है। यदि उभयोदय (मीन) लग्न में चन्द्रमा और सूर्य दोनों हों तो जल में मरण होता है। यदि मंगल की राशि में स्थित चन्द्रमा दो पापग्रहों के बीच में हो तो शस्त्र या अग्नि से मृत्यु होती है ॥३२०-३२१½॥