बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४२६ नारदीयपुराणम् षष्ठे शुभैर्नृपचमूपनैपुण्यवतिताशयाः । जूके भूपस्वर्णकारवणिजः शेषैर्वृगुते ॥२३३॥ द्विपैतृकाब्धिध्वजिनो व्यंगा स्वक्षितिपा अलौ । ज्ञातिक्षमाजनपाश्चापे सद्धिर्मदम्भीशठस्तथा ॥२३४॥ भूपपण्डितसखे ज्यामृगे भूपान्यदारिकौ । कुम्भे शेषैश्च हास्यज्ञनृपज्ञाः सद्धिर्भरंत्यभे ॥२३५॥ होरेशर्क्षदलस्थैस्तु दृष्टो युक्तः शशी शुभः । त्र्यंशे तत्पतिमित्रर्क्षगतैर्युक्त क्षितस्तथा ॥२३६॥ द्वादशांशे फलं प्रोक्तं नवांशेऽप्यथ कीर्त्यते । आरक्षेको वधरुचिर्नियुद्धकुशलोऽर्थवान् ॥२३७॥ कलहः क्षितिजांश्ये शौक्रे मूर्खोऽन्यदारदः । कविः सुखी बुधांशे तु नटचौरज्ञशिल्पिनः ॥२३८॥ स्वांशे त्वल्पतनुः सखस्तपस्वी लोभतत्परः । क्रोधी निधीशो मात्यो वा नृपो हिंस्रो सुतो हरेः ॥२३९॥ पर बुध आदि ग्रहों की दृष्टि हो तो शुभग्रहों (बुध, गुरु, शुक्र) की दृष्टि होने पर जातक क्रमशः राजा, सेनापति एवं निपुण होता है और अशुभ (शनि, मंगल, रवि) की दृष्टि होने पर स्त्री के आश्रय से जीविका चलाने वाला होता है। तुलाराशिस्थ चन्द्रमा पर यदि बुध आदि (बुध, गुरु, शुक्र) की दृष्टि हो तो उत्पन्न बालक क्रम से भूपति, सोनार और व्यापारी होता है तथा शेष ग्रह (शनि, रवि और मंगल) की दृष्टि होने पर वह हिंसा के स्वभाव वाला होता है ॥२३१-२३३॥ वृश्चिक राशिस्थ चन्द्रमा पर बुध आदि ग्रहों की दृष्टि होने पर क्रम से जातक दो संतान का पिता, मृदुस्वभाव, वस्त्रादि को रंगाई करने वाला, अंगहीन, निर्धन और भूमिपति होता है। धनुराशिस्थ चन्द्रमा पर बुध आदि शुभग्रहों की दृष्टि हो तो उत्पन्न बालक क्रमशः अपने कुल, पृथ्वी तथा जनसमूह का पालक होता है। शेष ग्रहों (शनि, रवि तथा मंगल) की दृष्टि हो तो जातक दंभी और शठ होता है ॥२३४॥ मकरराशिस्थित चन्द्रमा पर बुध आदि की दृष्टि हो तो वह क्रमशः भूमिपति, पण्डित, धनी, लोक में पूज्य, भूपति तथा परस्त्री में आसक्त होता है। कुम्भराशिस्थ चन्द्रमा पर भी उक्त ग्रहों की दृष्टि होने पर भी इसी प्रकार (मकरराशिस्थ के समान) फल समझना चाहिए। मीनराशिस्थ चन्द्रमा पर शुभग्रहों (बुध, गुरु और शुक्र) की दृष्टि हो तो जातक क्रमशः हास्यप्रिय, राजा और पण्डित होता है। (तथा शेष ग्रहों (पापग्रहों) की दृष्टि होने पर अनिष्ट फल होता है ॥२३५॥ होरा (लग्न) के स्वामी की होरा में स्थित चन्द्रमा पर उसी होरा में स्थित ग्रहों की दृष्टि हो तो वह शुभप्रद होता है। जिस तृतीयांश (द्रेष्काण) में चन्द्रमा हो उसके स्वामी से तथा मित्रराशिस्थ ग्रहों से युक्त या दृष्ट चन्द्रमा शुभफल देता है ॥२३६॥ प्रत्येक राशि में स्थित चन्द्रमा पर ग्रहों की दृष्टि होने से जो-जो फल कहे गये हैं, उन राशियों के द्वादशांश में स्थित चन्द्रमा पर भी उन-उन ग्रहों की दृष्टि होने से वे ही फल प्राप्त होते हैं। अब नवमांश में स्थित चन्द्रमा पर भिन्न-भिन्न ग्रहों की दृष्टि हो तो जातक क्रमशः मूर्ख, परस्त्री में आसक्त, सुखी, काव्यकर्ता, सुखी तथा परस्त्री में आसक्ति रखने वाला होता है। बुध के नवमांश में स्थित चन्द्रमा पर यदि सूर्यादि ग्रहों की दृष्टि हो तो बालक क्रमशः नर्तक, चोर स्वभाव, पण्डित, मन्त्री, संगीतज्ञ तथा शिल्पकार होता है ॥२३७-२३८॥ अपने (कर्क) नवमांश में स्थित चन्द्रमा पर यदि सूर्यादि ग्रहों की दृष्टि हो तो वह छोटे शरीर वाला, धनवान्, तपस्वी, लोभी, अपनी स्त्री की कमाई पर पलने वाला तथा कर्तव्यपरायण होता है। सूर्य के नवमांश (सिंह) में स्थित चन्द्रमा पर यदि सूर्यादि ग्रहों की दृष्टि हो तो बालक क्रमशः क्रोधी, राजमन्त्री, निधिपति या मन्त्री, राजा, हिंसा के स्वभाव वाला तथा पुत्रहीन होता है। गुरु के नवमांश में स्थित चन्द्रमा पर