बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 444, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४२५ मृगे बह्वात्मजधनः कुम्भे दुःख्यनृती खलः । स्त्रीद्वेष्यः स्वजनद्वेषीनिर्यरत्यः सधीधनः ॥२२६॥ समानार्थः सपुत्रस्त्रीसणंः सूर्यादिभे बुधे । सेनानीः स्त्र्यर्थपुत्राढ्यः दक्षमैश्यः परिच्छदी ॥२२७॥ मंडलेशः सार्थसुखः सर्पास्याम्यर्कभाद्धरौ । स्वप्त्याप्तार्थो मंदशोकाढ्यो बंधुद्वेषी धनाढवान् ॥२२८॥ सार्थः प्राज्ञः समः ख्यातिः स्त्रीजितोऽर्कादिभे भृगौ । व्यंगजार्थो खप्रसूको विधिमित्रो सुखत्रयः ॥२२९॥ सत्पुत्रस्त्रीधनो राजा ग्रामे शोकादिभेऽर्कजे । भूपज्ञगुणि चौरास्वाद्दष्टेब्जेजेसृगादिभिः ॥२३०॥ निःस्वःस्तेननृपाः प्रज्ञप्रेष्यामविन्मिथुन्मगे । धात्वाजीवी नृपज्ञाभीतंतुवायाधनाः स्वभे ॥२३१॥ युयुत्सुकविसूरोज्यधातुजीविद्गगामयाः । ज्योतिर्ज्ञाढ्येज्यनु खलु नृपेज्ञादिकहैरौ ॥२३२॥ बुध यदि सूर्य की राशि (सिंह) में हो तो स्त्री का द्वेषी, चन्द्रराशि (कर्क) में हो तो अपने परिजनों का द्वेषी, मंगल की राशि (मेष-वृश्चिक) में हो तो निर्धन और सत्त्वहीन, अपनी राशि (मिथुन-कन्या) में हो तो बुद्धिमान् और धनवान्, गुरु की राशि (धनु-मीन) में हो तो मान और धन से युक्त, शुक्र की राशि (वृष-तुला) में हो तो पुत्र और स्त्री से युक्त तथा शनि की राशि (मकर-कुम्भ) में हो तो ऋणी होता है ॥२२६३॥ गुरु यदि सिंह में हो तो सेनापति, कर्क में हो तो स्त्रीपुत्रादि से युक्त एवं धनी, मंगल की राशि (मेष- वृश्चिक) में हो तो धनी और क्षमाशील, बुध की राशि (मिथुन-कन्या) में हो तो वस्त्रादि विभव से युक्त, अपनी राशि (धनु-मीन) में हो तो मण्डल का अधिपति, शुक्र की राशि (वृष-तुला) में हो तो धनी और सुखी तथा शनि की राशि (मकर-कुम्भ) में हो तो मकर में ऋणवान् और कुम्भ में धनवान् होता है ॥२२७३॥ शुक्र सिंह में हो तो जातक स्त्री द्वारा धनलाभ करने वाला, कर्क में हो तो अभिमानी और शोक युक्त, मंगल की राशि (मेष-वृश्चिक) में हो तो बन्धुओं का द्वेषी, बुध की राशि (मिथुन-कर्क) में हो तो धनी और पाप स्वभाव, गुरु की राशि (धनु-मीन) में हो तो धनी और पण्डित, अपनी राशि (वृष-तुला) में हो तो धन- वान् और क्षमावान् तथा शनि की राशि (मकर-कुम्भ) में हो तो स्त्री से पराजित होता है ॥२२९३॥ शनि यदि सिंह में हो तो पुत्र और धन से रहित, कर्क में हो तो धन और संतान से हीन, मंगल की राशि (मेष-वृश्चिक) में हो तो निर्बुद्धि और मित्रहीन, बुध की राशि (धनु-मीन) में हो तो सुपुत्र, उत्तम स्त्री और धन से युक्त, शुक्र की राशि (वृष-तुला) में हो तो राजा और अपनी राशि (मकर-कुम्भ) में हो तो जातक ग्राम का अधिपति होता है ॥२२६३॥ चन्द्र पर दृष्टि का फल-मेष स्थित चन्द्रमा पर मंगल आदि ग्रहों की दृष्टि हो तो जातक क्रम से राजा, पण्डित, गुणवान्, चोर स्वभाव तथा निर्धन होता है ॥२३०॥ वृषस्थ चन्द्रमा पर मंगल आदि ग्रहों की दृष्टि हो तो क्रम से निर्धन, चोर-स्वभाव, राजा, पण्डित तथा प्रेष्य (भृत्य) होता है। मिथुन राशि में स्थित चन्द्रमा पर मंगल आदि ग्रहों की दृष्टि होने से मनुष्य क्रमशः धातुओं से आजीविका करने वाला, राजा, पण्डित, निर्भय, वस्त्र बनाने वाला तथा धनहीन होता है। अपनी राशि (कर्क) में स्थित चन्द्रमा पर यदि मंगलादि ग्रहों की दृष्टि हो तो जातक क्रमशः योद्धा, कवि, पण्डित, धनी, धातु से जीविका करने वाला तथा नेत्ररोगी होता है। सिंह राशिस्थ चन्द्रमा पर यदि बुधादि ग्रहों की दृष्टि हो तो मनुष्य क्रमशः ज्योतिषी, धनवान्, लोक में पूज्य, नाई, राजा तथा नरेश होता है। कन्याराशिस्थित चन्द्रमा ५४ ना० पु०