बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४२३ सेज्येज्ञे नृत्यगीताढ्यो मायादक्षः [सभार्यवे]। समंदे लुब्धकः क्रूरो नरो भवति नारद ॥१२०८॥ सशुक्रे वाक्पतौ विद्वान्सासितेऽन्नघटंकरः । कवौ समंदमंदाक्षो वनिताश्रयवित्तवान् ॥१२०९॥ एकस्थैश्चतुराद्यैस्तु खवार्थाः खचरैः पृथक् । कुजज्ञेज्यांशुकार्किसूर्यैः परिव्रजेन्नरः ॥२१०॥ शाक्याजीवकवृद्धार्थिचरकाखफलाशनः । तत्स्वामिभिः पराजितैः प्रव्रज्याप्रच्युतिर्भवेत् ॥२११॥ अदीक्षितोऽल्पस्तगतैः सबलैस्तत्स्थभक्तयः । जन्मपोऽन्यैरद्यदृष्टो मंदं पश्यति नारद ॥२१२॥ मंदो वा जन्मपं नष्टं तथा च मंदकाङ्गण । भौमार्कांशे सौरदृष्टे चंद्रे वा दीक्षितो भवेत् ॥२१३॥ सुरूपो भूषितोऽश्विन्यां दक्षः सत्यवचा यमे । बह्नुपदासक्तौ स्थिरधीः प्रियवाक्तथा ॥२१४॥ ब्राह्मे धनीमृगे भोगी रौद्रे हिंस्रः शठोऽघकृत् । दांतो रोगी शुभोऽदित्यां पुष्येऽर्जन्मा कविः सुखी॥२१५॥ धूर्तः शठः कृतघ्नोऽह्नौ पापः सर्वाशनो भवेत् । पन्ने भोगी धनी भक्तो दाता प्रियवचा भगे ॥२१६॥ धनी भोगी नरोर्यम्णे स्तेनो धृष्टो घृणी करे । चित्रांवरः सुदृक्तवाष्ट्रे न च धर्मदयापरः ॥२१७॥ दीशे लुब्धः पटुः क्रोधी मदैंचो आठनोविदेशगः । शाक्रे धर्मपरस्तुष्टो मूले मानी धनी सुखी ॥२१८॥ आप्ये मानी सुखी हृष्टो वैश्वे नम्रश्च धार्मिकः । कर्णे धनी सुखी ख्यातो दाता शूरो धनी वसौ ॥२१९॥
नारद ! बुध यदि बृहस्पति से युक्त हो तो उत्पन्न शिशु नृत्य और संगीत का प्रेमो होता है। शुक्र से युक्त हो तो मायावी और शनि से युक्त हो तो उत्पन्न मनुष्य लोभी और क्रूर होता है ॥१२०८॥ गुरु यदि शुक्र से युक्त हो तो मनुष्य विद्वान, शनि से युक्त हो तो रसोइया अथवा घटनिर्माता होता है। शुक्र यदि शनि से युक्त हो तो मंद दृष्टि वाला तथा स्त्री के सहारे धनोपार्जन करने वाला होता है ॥१२०९॥ प्रव्रज्या योग—यदि जन्म-समय में चार या चार से अधिक ग्रह एक स्थान में हों तो मनुष्य गृहत्यागी संन्यासी होता है। उन ग्रहों में मंगल, बुध, गुरु, चन्द्रमा, शुक्र, शनि और सूर्य बली हों तो मनुष्य क्रमशः शाक्य (बौद्ध), आजीवक (दण्डी), भिक्षु (यति), वृद्ध (वृद्धश्रावक), चरक (चक्रधारी), अह्नी (नग्न) और फलाहारी होता है। प्रव्रज्याकारक ग्रह यदि अन्य ग्रह से पराजित हो तो मनुष्य उस प्रव्रज्या से च्युत हो जाता है। यदि प्रव्रज्याकारक ग्रह सूर्य-सन्निध्यवश अस्त हो तो मनुष्य उसकी दीक्षा ही नहीं लेता और यदि वह ग्रह बलवान् हो तो उसकी प्रव्रज्या में प्रीति रहती है। जन्मराशीश पर यदि अन्य ग्रह की दृष्टि न हो और जन्मराशीश यदि शनि को देखता हो अथवा निर्बल जन्मराशीश को शनि देखता हो या शनि के द्रेष्काण अथवा मंगल या शनि के नवमांश में चन्द्रमा हो और उस पर शनि की दृष्टि हो तो इन योगों में विरक्त होकर गृहत्याग करने वाला पुरुष संन्यास-धर्म की दीक्षा लेता है ॥२१०-२१३॥ अश्विन्यादि नक्षत्रों में जन्म का फल--अश्विनी नक्षत्र में उत्पन्न बालक सुन्दर और भूषणप्रिय होता है। भरणी में उत्पन्न शिशु सब कार्य में दक्ष और सत्यवादी होता है। कृत्तिका में उत्पन्न अमिताहारी, परस्त्री में आसक्त, स्थिरबुद्धि और प्रियवक्ता होता है, रोहिणी में, पैदा हुआ मनुष्य धनवान्; मृगशिरा में उत्पन्न भोगी; आर्द्रा में उत्पन्न हिंसास्वभाव वाला, शठ और अपराधी; पुनर्वसु में जितेन्द्रिय, रोगी ओर सुशील तथा पुष्य में कवि और सुखी होता है ॥२१४-२१५॥ आश्लेषा नक्षत्र में उत्पन्न मनुष्य धूर्त, शठ, कृतघ्न, नीच और खान-पान में अविवेकी या सर्वभक्षी, मघा में भोगी, धनी तथा देवादि का भक्त होता है। पूर्वा फाल्गुनी में दाता और प्रियवक्ता होता है। उत्तराफाल्गुनी में धनी और भोगी; हस्त में चोरस्वभाव, ढीठ और निर्लज्ज तथा चित्रा में नाना प्रकार के वस्त्र धारण करने वाला धर्मात्मा और दयालु होता है। विशाखा में लोभी, चतुर और क्रोधी; अनुराधा में भ्रमणशील और विदेशवासी; ज्येष्ठा में धर्मात्मा और सन्तोषी तथा मूल में धनीमानी और सुखी होता है। पूर्वाषाढ़ में मानी, सुखी और हृष्ट; उत्तराषाढ़ में विनयी और धर्मात्मा; श्रवण में धनी सुखी और