बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४२२ नारदीयपुराणम् मित्रोपकारकृच्छत्रे कूटे चानृतबंधराट् । नौजः सकीर्तिः सुखभाक् मानवो भवति ध्रुवम् ॥१९६॥ त्यागी यज्वात्मवान् यपे हिंस्रो गुह्याधिपः शरैः । । शक्तौ नीचोऽलसो निःस्वो दण्डे प्रियवियोगभाक् ॥१९८॥ व्यर्कैः स्वांत्योभयगतैः खेटैः स्यात्सुनफानफा । दुरुधरा चैव विधौ ज्ञेयः केमद्रुमोऽन्यथा ॥२००॥ स्वोपार्जितार्थभुग्दाता सुनफायां धनी सुखी । नीरोगः शीलवान् ख्यातः सुवेषश्चानफाभवः ॥२०१॥ भोगी सुखी धनीदानी त्यागी दुरुधरोद्भवः । केमद्रुमेऽतिमलिनो दुःखी नीचोऽथ निर्धनः ॥२०२॥ यन्त्राश्मकारंशाजोको भौमपुष्ककृते ध्वगः । सुज्ञः सुकीर्तिर्निपुणं विद्वांसं धनिनं तथा ॥२०३॥ सेन्योन्यकार्यनिरतं सास्फुजिच्छस्त्रजीवनम् । समंदो धातुकुशलं तथा भाडविदं मुने ॥२०४॥ कूटस्त्र्याशवपण्याठं नसासंगिदुः प्रसूद्विषम् । कुर्यात्सज्ञोऽर्थनिपुणं नम्रं सत्कीर्तिसंयुक्तम् ॥२०५॥ सेज्योऽस्थिरवयं वंश्यं विक्रांतं च समर्थिनम् । ससितोसुक्रवेत्तारं सार्किपौनर्भवं मुने ॥२०६॥ आरे सज्ञे बाहुयोधी पुराध्यक्षः सगौष्पतौ । सशुक्रे द्यूतकृच्छौंड्यो नृती द्यूती समंदके ॥२०७॥ में उत्पन्न मिथ्याभाषी और जेल का अधीक्षक होता है। नौका योग में उत्पन्न पुरुष निश्चय ही यशस्वी और सुखी होता है। यूपयोग में जन्म लेने वाला मनुष्य दानी, यज्ञकर्ता और मनस्वी होता है। शरयोग में उत्पन्न मनुष्य दूसरों को कष्ट देने वाला और गोपनीय स्थानों का स्वामी होता है। शक्तियोग में उत्पन्न नीच, आलसी और निर्धन होता है। दण्डयोग में उत्पन्न पुरुष अपने प्रियवियोग का कष्ट भोगता है ॥१९७-१९९॥ चतुर्योग का कथन—यदि चन्द्रमा से द्वितीय में सूर्य को छोड़कर कोई भी अन्य ग्रह हो तो 'सुनफा' योग होता है। द्वादश में हो तो 'अनफा' और दोनों (२, १२) स्थानों में ग्रह हों तो 'दुरुधरा' योग होता है। अन्यथा (अर्थात् २, १२ में कोई ग्रह नहीं हो तो) 'केमद्रुम' योग होता है ॥२००॥ उक्तयोगों का फल—सुनफा योग में जन्म लेने वाला पुरुष अपने भुजबल से उपार्जित धन का भोगी, दाता, धनवान् और सुखी होता है। अनफायोग में उत्पन्न मनुष्य नीरोग, सुशील, विख्यात और सुन्दर होता है। दुरुधरा में जन्म लेने वाला भोगी, सुखी, धनवान्, दाता और विषयों से निःस्पृह होता है। केमद्रुम योग में उत्पन्न पुरुष मलिन, दुःखी नीच और निर्धन होता है ॥२०१-२०२॥ द्विग्रहयोगफल—मुने ! सूर्य यदि चन्द्रमा से युक्त हो तो भाँति-भाँति के यन्त्र और पत्थर के कार्य में कुशल बनाता है। मंगल से युक्त हो तो वह बालक को नीच कर्म में लगाता है। बुध से युक्त हो तो यशस्वी, कार्यकुशल, विद्वान् एवं धनी बनाता है, गुरु से युक्त हो तो दूसरों के कार्य करने वाला, शुक्र से युक्त हो तो धातुओं (ताँबा आदि) के कार्य में निपुण तथा पात्र-निर्माण-कला का जानकार बनाता है ॥२०३-२०४॥ चन्द्रमा यदि मंगल से युक्त हो तो जातक कूटवस्तु (नकली सामान), स्त्री और आसव-अरिष्टादि का क्रय-विक्रय करने वाला तथा माता-पिता का द्रोही होता है। बुध के साथ चन्द्रमा हो तो उत्पन्न शिशु को धनी, कार्यकुशल, विनयी एवं यशस्वी बनाता है; गुरु से युक्त हो तो चंचलवृद्धि, कुल में मुख्य, पराक्रमी और धनाढ्य बनाता है। मुने ! यदि शुक्र से युक्त चन्द्रमा हो तो बालक को वस्त्रनिर्माण-कला का ज्ञाता बनाता है और यदि शनि से युक्त हो तो वह बालक ऐसी स्त्री से उत्पन्न होता है, जिसने पति के मरने पर या जीते जी दूसरे पति से सम्बन्ध स्थापित कर लिया हो ॥२०५-२०६॥ मंगल यदि बुध से युक्त हो तो उत्पन्न हुआ बालक बाहु से युद्ध करने वाला (पहलवान) होता है। गुरु से युक्त हो तो नगर का स्वामी, शुक्र से युक्त हो तो जूआ खेलने वाला तथा गायों का पालक और शनि से युक्त हो तो मिथ्यावादी तथा जुआड़ो होता है ॥२०७॥