भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 512, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 512

षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ४६३ पूर्वादिगेष्वलिदेषु गृहभेदास्तु षोडश । स्नानागारं दिशि प्राच्यामाग्नेय्यां पाकमंदिरम् ॥५८५॥ याम्यां च शयनागारं नैऋत्यां शास्त्रमंदिरम् । प्रतीच्यां भोजनगृहं वायव्यां धान्यमंदिरम् ॥५८६॥ कौबेर्यां देवतागारमीशान्यां क्षीरमंदिरम् । शय्यामूत्रास्त्रतद्विच्च भोजनं मंगलाश्रयम् ॥५८७॥ धान्यस्त्रीभोगवित्तं च शृंगारायतनानि च । ईशान्यादिक्रमेस्तेषां गृहनिर्माणकं शुभम् ॥५८८॥ एतेष्वेतानि शस्त्राणि स्वं स्थाप्यानि स्वदिक्ष्वपि । ध्वजो धूम्रोऽथ सिंहःश्वा सौरमेयः खरो गजः ॥५८६॥ ध्वांक्षश्चैव भवंत्यष्टौ पूर्वादिपाः क्रमादमी । प्लक्षोदुंबरचूताख्या निंबस्तु हि विभीतकाः ॥५६०॥ ये कंटका दुग्धवृक्षा वृक्षाश्वत्थकपित्थकाः । अगस्तिसिधुवालाख्यतितिडीकाश्च निंदिताः ॥५६१॥ धित्त्वाग्नजदेहस्यात्पश्चिमे दक्षिणे तथा । गृहपादागृहस्तंभाः समाः शस्ताश्च नासमाः ॥५६२॥ नात्युच्छ्रितं नातिनीचं कुडचोत्सेधं यथार्हति । गृहोपरि गृहादीनामेवं सर्वत्र चिंतयेत् ॥५६३॥ गृहादीनां गृहस्रावं क्रमशोडष्टविधं स्मृतम् । पांचालमानं वैदेहं कौरवं च कुजन्यकम् ॥५६४॥ मागधं शूरसेनं च गांधारावितका स्मृतम् । सचतुर्भागविस्तारमुत्सेधं यत्तदुच्यते ॥५६५॥ पांचालमातुलानां च ह्युत्तरोत्तरवृद्धितः । वैदेहादीन्यशेषाणि मानानि स्युर्यथाक्रमम् ॥५६६॥ पांचालमानं सर्वेषां साधारणमतः परम् । अवंतिमानं विप्राणां गांधारं क्षत्रियस्य च ॥५६७॥ कौजन्यमानं वैश्यानां विप्रादीनां यथोत्तरम् । यथोदितं जलस्राव्यं द्वित्रिभूमिकवेश्मनाम् ॥५६८॥ वास्तुभूमि की पूर्वदिशा में स्नानगृह, अग्निकोण में पाकगृह, दक्षिण में शयनगृह, नैऋत्यकोण में शस्त्रागार, पश्चिम में भोजनगृह, वायुकोण में धनधान्यादि रखने का घर, उत्तर में देवताओं का गृह और ईशानकोण में जल का गृह बनाना चाहिए तथा आग्नेयकोण से आरंभ करके उक्त दो-दो घरों के बीच क्रमशः मन्थन (दूध-दही से घृत निकालने) का, घृत रखने का, पैखाने का, विद्याभ्यास का, स्त्रीसहवास का, औषध का और शृङ्गार की सामग्री रखने का घर बनाना शुभ है । अतः इन सब घरों में उन-उन वस्तुओं को रखना चाहिए ॥५८५-५८८१/२॥ आयों के नाम और दिशा—पूर्वादि आठ दिशाओं में क्रम से ध्वज, धूम्र, सिंह, श्वान, वृष, (खर गदहा), गज और ध्वांक्ष (काक)-ये आठ आय होते हैं ॥५८९१/२॥ घर के समीप निन्द्य वृक्ष—पाकर, गूलर, आम, नीम, बहेड़ा तथा कांटे वाले और दुग्धवाले सब वृक्ष, पीपल, कपित्थ (कैथ), अगस्त्य वृक्ष, सिन्धुवार (निर्गुण्डी) और इमली ये सब वृक्ष घर के समीप निन्दित कहे गये हैं । विशेषतः घर के दक्षिण और पश्चिम-भाग में वृक्ष हों तो धन आदि का नाश करने वाले होते ॥५९०-५९११/२॥ गृह प्रमाण--घर के स्तम्भ घर के पैर होते हैं । इसलिए वे समसंख्या (४,६,८ आदि) में होने पर ही उत्तम कहे गये हैं; विषम संख्या में नहीं । घर को न तो अधिक ऊँचा ही करना चाहिए, न अधिक नीचा ही। इसलिए अपनी इच्छा (निर्वाह) के अनुसार दीवार की ऊँचाई करनी चाहिए। घर के ऊपर जो घर (दूसरा मंजिल) बनाया जाता है, उसमें भी इस प्रकार का विचार करना चाहिए । घरों की ऊँचाई के प्रमाण आठ प्रकार के कहे गये हैं, जिनके नाम क्रमशः इस प्रकार हैं-१पाञ्चाल, २ वैदेह, ३ कौरव, ४ कुजन्य (कान्यकुब्ज ?), ५ मागध, शूरसेन, ७ गान्धार और ८ आवन्तिक । जहाँ घर की ऊँचाई उसकी चौड़ाई से सवागुनी अधिक होती है, वह भूतल से ऊपरतक का पाञ्चालमान कहलाता है, फिर उसी ऊँचाई को उत्तरोत्तर सवागुनी बढ़ाने से वैदेह आदि सब मान होतेहैं। इनमें पाञ्चालमान तो सर्वसाधारण जनों के लिए शुभ हैं। ब्राह्मणों के लिए आवन्तिकमान, क्षत्रियों के लिए गान्धारमान तथा वैश्यों के लिए कौजन्यमान है। इस प्रकार ब्राह्मणादि वर्णों के लिए यथोत्तर गृहमान समझना चाहिए तथा दूसरे मंजिल और तीसरे मंजिल के मकान में भी पानी का बहाव पहले बताये अनुसार ही बनाना चाहिए ॥५६२-५९८॥