भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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४६४ | नारदीयपुराणम् उष्ट्रकुंजरशालानां ध्वजायेऽथ वा गजे । पशुशालाश्च शालानां ध्वजायेऽथ वा गजे ॥५९६६॥ द्वारशय्याशनानामथध्वजाः सिंहवृषध्वजाः । वास्तुपूजाविधिं वक्ष्ये नववेश्मप्रवेशने ॥६००॥ हस्तमात्रा लिखेल्लेखा दश पूर्वा दशोत्तराः । गृहमध्ये तंडुलोपर्येकाशीतिपदं भवेत् ॥६०१॥ पंचोत्तरान्वक्ष्यमाणांश्चत्वारिंशत्सुरान् लिखेत् । द्वात्रिंशद्वाह्यतः पूज्यास्त्वंतःस्थास्त्रयोदश ॥६०२॥ तेषां स्थानानि नामानि वक्ष्यामि क्रमशोधुना । ईशानकोणतो बाह्ये द्वात्रिंशत्त्रिदशा अमी ॥६०३॥ कृपीटयोनिः पर्जन्यो जयंतः पाकशासनः । सूर्यः शशो मृगाकशी वायुः पूषा च नैऋतिः ॥६०४॥ गृहाक्षतो दंडधरो गांधर्वो भृगुराजकः । मृगः पितृगणाधीशस्ततो दौवारिकाह्वयः ॥६०५॥ सोमः सुग्रीऽदितिदिती द्वात्रिंशत्त्रिदशा अमी । अथेशानादिकोणस्थाश्चत्वारस्तत्समीपगाः ॥६०६॥ आपः सावित्रसंज्ञश्च जयो रुद्रः क्रमादमी । एकांतराः स्युः प्रागाद्याः परितो ब्रह्मणः स्मृताः । ६०७॥ अर्यमा सविता बिबविवस्वान्वसुधाधिपः । मित्रोऽथ राजयक्ष्मा च तथा पृथ्वीधराह्वयः ॥६०८॥ आपवत्सोऽष्टमः पंचचत्वारिंशत्सुरा अमी । आपश्चैवापवत्सश्च पर्जन्योऽग्निर्दितिः क्रमात् ॥६०९॥ यद्विकानां च वर्गोऽयमेवं कोणेष्वशेषतः । तन्मध्ये विंशतिर्बाह्या द्विपदास्ते तु सर्वदा ॥६१०॥

घर में प्रशस्त आय—ध्वज अथवा गज आय में ऊँट और हाथी के रहने के लिए घर बनवाये तथा अन्य सब पशुओं के घर भी उसो (ध्वज ओर गज) आय में बनाने चाहिए । द्वार, शय्या, आसन, छाता और ध्वजा-इन सबों के निर्माण के लिए सिंह, वृष अथवा ध्वज आय होने चाहिए ॥५९९१/२॥ अब मैं नूतनगृह में प्रवेश के लिए वास्तुपूजा की विधि बताता हूँ-घर के मध्यभाग में तन्दुल (चावल) पर पूर्व से पश्चिम की ओर एक-एक हाथ लम्बो दस रेखायें खींचे । फिर उत्तर से दक्षिण की ओर भी उतनी ही लम्बी-चौड़ी दस रेखायें बनाये । इस प्रकार उसमें बराबर-बराबर ८१ पद (कोष्ठ) होते हैं । उनमें आगे बताये जाने वाले ४५ देवताओं का यथोक्त स्थान में नामोल्लेख करे । बत्तीस देवता बाहर (प्रान्त के कोष्ठ में) और तेरह देवता भीतर पूजनीय होते हैं । उन ४५ देवताओं के स्थान और नाम का क्रमशः वर्णन करता हूँ । किनारे के बत्तीस कोष्ठों में ईशान कोण से आरंभ करके क्रमशः बत्तीस देवता पूज्य हैं । उनके नाम इस प्रकार हैं-कृपीट- योनि (अग्नि) १, पर्जन्य २, जयन्त ३, इन्द्र ४, सूर्य ५, सत्य ६, भृश ७, आकाश ८, वायु ९, पूषा १०, अनृत ११, गृहक्षत १२, यम १३, गन्धर्व १४, भृंगराज १५, मृग १६, पितर १७, दौवारिक १८, सुग्रीव १९, पुष्पदन्त २०, वरुण २१, असुर २२, शेष २३, राजयक्ष्मा २४, रोग २५, अहि २६, मुख्य २७, भल्लाटक २८, सोम २९, सर्प ३०, अदिति ३१, और दिति-ये चारों किनारों के देवता हैं । ईशान, अग्नि, नैऋत्य और वायु कोण के देवों के समीप क्रमशः आप ३३, सावित्र ३४, जय ३५, तथा रुद्र ३६ के पद हैं । ब्रह्मा के चारों ओर पूर्व आदि आठों दिशाओं में क्रमशः अर्यमा ३७, सविता ३८, विवस्वान् ३९, विबुधाधिप ४०, मित्र ४१, राजयक्ष्मा ४२, पृथ्वीधर ४३, आपवत्स ४४, हैं और मध्य के नव पदों में ब्रह्माजी (४५) को स्थापित करना चाहिए । इस प्रकार सब पदों में ये पेंतालीस देवता पूजनीय होते हैं । जैसे ईशान-कोण में आप, आपवत्स, पर्जन्य, अग्नि और दिति-ये पाँच देव एक पद होते हैं, उसी प्रकार अन्य कोष्ठों ये पाँच-पांच देवता भी एकपद के भागी हैं । अन्य जो बाह्य पंक्ति के (जयन्त, इन्द्र आदि) बीस देवता है, वे सब द्विपद दो-दो पदों के भागी हैं तथा ब्रह्मा से पूर्व, दक्षिण, पश्चिम और उत्तर दिशा में जो अर्यमा, विवस्वान्, मित्र और पृथ्वीधर-ये चार देवता हैं, वे त्रिपद (तीन-तीन पदों के भागी) हैं, अतः वास्तु-विधि के ज्ञाता विद्वान् पुरुष को चाहिए कि ब्रह्माजी सहित इन एकपद, द्विपद तथा त्रिपद