बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५०० नारदीयपुराणम् तस्याग्रे खलमैत्रीव न स्थिरा रिपुवाहिनी । त्रिखंडायेषु मन्दारौ बलवंतः शुभा यदि ॥६६२॥ यात्रायां नृपतस्तस्य हस्तस्था शत्रुमेदिनी । स्वोच्चस्थे लग्ने जीवे चंद्रे लाभगते यदि ॥६६३॥ गतो राजा रिपूहंति पिनाकी त्रिपुरं यथा । मस्तकोदयगे शुक्रे लग्नस्थे लाभगे गुरौ ॥६६४॥ गतो राजा रिपूहंति कुमारस्तारकं यथा । जीवे लग्नगते शुक्रे केंद्रे वापि त्रिकोणगे ॥६६५॥ गतो दहत्यरीन्द्राजा कृष्णवर्मा यथा वनम् । लग्नगे ज्ञे शुभे केंद्रे धिष्ण्ये चोबकुले गतः ॥६६६॥ नृपाः शुष्यंत्यरीन् ग्रीष्मे ह्रदिनीं वार्करश्मयः । शुभे त्रिकोणे केंद्रस्थे लाभे चंद्रेऽथवा रवौ ॥६६७॥ शत्रून्हन्ति गतो राजा ह्यंधकारं यथा रविः । स्वक्षेत्रगे शुभे केंद्रे त्रिकोणावगते गतः ॥६६८॥ विनाशयत्यरीन्द्राजा तूलराशिमिवानलः । इंदौ स्वस्थे गुरौ केंद्रे मंत्रः सप्रणवो गतः ॥६६६॥ नृपो हंति रिपून्सर्वान्पापान्पंचाक्षरो यथा । वर्गोत्तमगते शुक्रेऽप्येकस्मिन्नेव लग्नेगे ॥६७०॥ हरिस्मृतिर्यथाघौघान्हंति शत्रून् गतो नृपः । शुभे केंद्रे त्रिकोणस्थे चंद्रे वर्गोत्तमे गतः ॥६७१॥ सगोत्रारोन्नृपान् हंति यथा गोत्रांश्च गोत्रभित् । मित्रभेऽथ गुरौ केंद्रे त्रिकोणस्थेऽथ वा सिते ॥६७२॥ हों और शुभ ग्रह बलवान् होकर अपने उच्चादि स्थान में (स्थित) हों तो शत्रु की भूमि यात्रा करने वाले राजा के हाथ में आ जाती है ॥६६२३॥ अपने उच्च (कर्क) में स्थित बृहस्पति यदि लग्न में हों और चन्द्रमा ११ भाव में स्थित हों तो यात्रा करने वाला नरेश अपने शत्रु को उसी प्रकार नष्ट कर देता है, जैसे त्रिपुरासुर को शंकर ने नष्ट किया था ॥६६३३॥ शीर्षोदय (मिथुन, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, कुम्भ) राशि में स्थित शुक्र यदि लग्न में हों और गुरु ग्यारहवें स्थान में हों तो यात्रा करने वाला पुरुष तारकासुर को कार्तिकेय के समान अपने शत्रु को नष्ट कर देता है ॥६६४३॥ गुरु लग्न में और शुक्र किसी केन्द्र या त्रिकोण में हों तो यात्री नरेश अपने शत्रुओं को वैसे ही भस्म कर देता है जैसे वन को दावानल ॥६६५३॥ यदि बुध लग्न में और अन्य शुभग्रह किसी केन्द्र में हों तथा नक्षत्र भी अनुकूल हो तो उसमें यात्रा करने वाला राजा अपने शत्रुओं को वैसे ही सोख लेता है, जैसे सूर्य की किरणें ग्रीष्मऋतु में क्षुद्र नदियों को सोख लेती हैं ॥६६६३॥ सम्पूर्ण शुभ ग्रह केन्द्र या त्रिकोण में हों तथा सूर्य या चन्द्रमा ग्यारहवें भाव में स्थित हों तो यात्रा करने वाला नरेश अन्धकार को सूर्य की भांति अपने शत्रु को नष्ट कर देता है ॥६६७३॥ शुभग्रह यदि अपनी राशि में स्थित होकर केन्द्र (१,४,७,१०) त्रिकोण (५,९) तथा आय (११) भाव में हो तो यात्रा करने वाला राजा रूई को अग्नि के समान अपने शत्रुओं को जलाकर भस्म कर देता है ॥६६८३॥ चन्द्रमा दसवें भाव में और वृहस्पति केन्द्र में हों तो उसमें यात्रा करने वाला राजा अपने सम्पूर्ण शत्रुओं को उसी प्रकार नष्ट कर देता है जैसे प्रणव सहित पञ्चाक्षरमंत्र (ओं नमः शिवाय) पाप-समूह का नाश कर देता है ॥६६६३॥ अकेला शुक्र भी यदि वर्गोत्तम नवमांशगत लग्न में स्थित हो तो उसमें भी यात्रा करने से राजा अपने शत्रुओं को उसी प्रकार नष्ट कर देता है, जैसे पापों को श्रीभगवान् का स्मरण ॥६७०३॥ शुभग्रह केन्द्र या त्रिकोण में हों तथा चन्द्रमा यदि वर्गोत्तम नवमांश में हो तो ऐसे समय में यात्रा करने से राजा अपने शत्रुओं को उसी प्रकार सपरिवार नष्ट करता है, जैसे इन्द्र पर्वतों को ॥६७१३॥ बृहस्पति अथवा शुक्र अपने मित्र की राशि में होकर केन्द्र या त्रिकोण में हों तो ऐसे समय में यात्रा करने वाला भूपाल सर्पों को गरुड़ के समान अपने शत्रुओं को अवश्य नष्ट करता है ॥६७२॥ यदि एक भी ग्रह वर्गोत्तम नवमांश में स्थित होकर केन्द्र में हो तो