बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंषट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ५०१ शत्रून्हंति गतो राजा भुजंगान् गरुडो यथा । शुभकेन्द्रत्रिकोणस्थे वर्गोत्तमगते गतः ॥६७३॥ विनाशयत्यरीन्द्राजा पापान्भागीरथी यथा । ये नृपा यान्त्यरीञ्जेतुं तेषां योगैर्नृपाह्वयैः ॥६७४॥ उपैति शांतिं कोपाग्निः शत्रुयोषाश्रुबिंदुभिः । बलक्षपक्षदशमीमासीषे विजयाभिधा ॥६७५॥ विजयस्तत्र यांतॄणां संधिर्वा न पराजयः । निमित्तशकुनादिभ्यः प्रधानं हि मनोजयः ॥६७६॥ तस्मान्मनस्विनां यत्नात्फलहेतुर्मनोदयः । उत्सवोपनयोद्वाहप्रतिष्ठाशौचसूतके ॥६७७॥ असमाप्त न कुर्वीत यात्रां मर्त्यो जिजीविषुः । महिषौंदुरयोर्युद्धे कलत्रकलहातवे ॥६७८॥ वस्त्रादेः स्खलिते क्रोधे दुरुक्ते न व्रजेन्नृपः । घृतान्नं तिलपिष्टान्नं मत्स्यान्नं घृतपायसम् ॥६७९॥ प्रागादिक्रमशो भुक्त्वा याति राजा जयत्यरीन् । सज्जिका परमान्नं च कांजिकं च पयो दधि ॥६८०॥ क्षीरं तिलोदनं भुक्त्वा भानुवारादिषु क्रमात् । कुल्माषांश्च तिलान्नं च दधि क्षौद्रं घृतं पयः ॥६८१॥ मृगमांसं च तत्सारं पायसं च खगं मृगम् । शशमांसं च षाष्टिक्यं प्रियंगुकमपूपकम् ॥६८२॥ चित्रांडजफलं कूर्मशवाविद्गोधांश्र्च शास्तकम् । हविष्यं कृशरान्नं च मुद्गान्नं यवपिष्टकम् ॥६८३॥ यात्रा करने वाला नरेश पाप समूह को गंगाजी के समान अपने शत्रुओं को क्षणभर में नष्ट कर देता है ॥६७३१/२॥ जो राजा शत्रुओं को जीतने के लिए उपर्युक्त राजयोगों में यात्रा करता है, उसका कोपानल शत्रुओं की स्त्रियों के अश्रुजल से शान्त होता है ॥६७४१/२॥ आश्विन मास के शुक्लपक्ष की दशमी तिथि विजया कहलाती है। उसमें जो यात्रा करता है, उसे अपने शत्रुओं पर विजय होती है। अथवा शत्रुओं से सन्धि हो जाती है। किसी भी दशा में उसकी पराजय नहीं होती है ॥६७५१/२॥ मनोजय प्रशंसा—यात्रा आदि सभी कार्यों में निमित्त और शकुन आदि (लग्न एवं योग) की अपेक्षा भी मनोजय प्रबल है। इसलिए मनस्वी पुरुषों के लिए यत्नपूर्वक फलसिद्धि में मनोजय ही प्रधान कारण होता है ॥६७६ १/२॥ यात्रा में प्रतिबन्ध—यदि घर में उत्सव, उपनयन, विवाह, प्रतिष्ठा या सूतक उपस्थित हो तो जीवन की इच्छा रखने वालों को बिना उत्सव को समाप्त किये यात्रा नहीं करनी चाहिए ॥६७७१/२॥ यात्रा में अपशकुन—यात्रा के समय यदि परस्पर दो भैंसों या चूहों में लड़ाई हो, स्त्री से कलह हो या स्त्री को मासिक धर्म हुआ हो, वस्त्र आदि शरीर से खिसककर गिर पड़े, किसी पर क्रोध हो जाय या मुख से दुर्वचन कहा गया हो तो उस दशा में राजा को यात्रा नहीं करनी चाहिए ॥६७८१/२॥ दिशा, वार तथा नक्षत्र-दोहद—यदि राजा घृतमिश्रित अन्न खाकर पूर्व दिशा की यात्रा करे, तिलचूर्ण मिलाया हुआ अन्न खाकर दक्षिण दिशा को जाय और घृतमिश्रित खीर खाकर उत्तर दिशा की यात्रा करे तो निश्चय ही शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है। रविवार को सज्जिका (मिसरी और मसाला मिला हुआ दही), सोमवार को खीर मंगलवार को कांजी, बुधवार को दूध, गुरुवार को दही, शुक्रवार को दूध तथा शनिवार को तिल और भात खाकर यात्रा करे तो शत्रुओं को जीत लेता है। अश्विनी में कुल्माष (कुलथी) भरणी में तिल, कृत्तिका में उड़द, रोहिणी में गाय का दही, मृगशिरा में गाय का घी, आर्द्रा में गाय का दूध, अश्लेषा में खीर, मघा में नीलकण्ठ का दर्शन, हस्त में षाष्टिक्य (साठी धान्य) के चावल का भात, चित्रा में प्रियंगु (कंगनी), स्वाती में अपूप (मालपूआ), अनुराधा में फल, उत्तराषाढ में चावल, अभिजित् में हविष्य, श्रवण में कृशरान्न (खिचड़ी), धनिष्ठा में मूंग,