बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५०२ नारदीयपुराणम् मत्स्यान्नं च विवित्तान्नं दध्यन्नं दत्तभाक्रमात् । भुक्त्वा राजेभाश्वरथनरैर्य्याति जयत्यरीन् ॥६८४॥ हुताशनं तिलैर्हुत्वा पूजयेत दिगीश्वरम् । प्रणम्य देवभूदेवानाशीर्वादैर्नृपो व्रजेत् ॥६८५॥ यद्वर्णवस्त्रगंधाद्यैस्तन्मंत्रेण विधानतः । इंद्रमैरावतारूढं शच्या सह विराजितम् ॥६८६॥ वज्रपाणिं स्वर्णवर्णं दिव्याभरणभूषितम् । सप्तहस्तं सप्तजिह्वं षण्मुखं मेषवाहनम् ॥६८७॥ स्वाहाप्रियं रक्तवर्णं स्रुक्स्रुवायुधधारिणम् । दंडाधुधं लोहिताक्षं यमं महिषवाहनम् ॥६८८॥ श्यामलं सहितं रक्तवर्णैरूध्र्वमुखं शुभम् । खङ्गचर्मधरं नीलं निर्र्ऋति नरवाहनम् ॥६८६॥ ऊर्ध्वकेशं विरूपाक्षं दीर्घग्रीवायुतं विभुम् । नागपाशधरं पीतवर्णं मकरवाहनम् ॥६९०॥ वरुणं कालिकानाथं रत्नाभरणभूषितम् । प्राणिनां प्राणरूपं तं द्विबाहुं दंडपाणिकम् ॥६९१॥ वायुं कृष्णमृगारूढं पूजयेदंजनीपतिम् । अश्वारूढं कुंभपाणिं द्विबाहुं स्वर्णसन्निभम् ॥६९२॥ कुबेरं चित्रलेखेशं यक्षगंधर्वनायकम् । पिनाकिनं वृषारूढं गौरीपतिमनुत्तमम् ॥६९३॥
शतभिषा में जौ का आटा, उत्तरभाद्रपद में खिचड़ी तथा रेवती में दही-भात खाकर राजा यदि हाथी, घोड़े, रथ या पालकी पर बैठकर यात्रा करे तो शत्रुओं पर विजय पाता है और उसका अभीष्ट सिद्ध होता है ॥६७९-६८४॥ यात्रा विधि—प्रज्वलित अग्नि में तिलों से हवन करके जिस दिशा में जाना हो, उस दिशा के स्वामी को उन्हीं के समान रंग वाले वस्त्र, गन्ध तथा पुष्प आदि उपचार अर्पण करके उन दिक्पालों के मन्त्रों द्वारा विधिपूर्वक उनका पूजन करे । फिर अपने इष्टदेव और ब्राह्मणों को प्रणाम करके ब्राह्मणों से आशीर्वाद लेकर राजा को यात्रा करनी चाहिए ॥६८५॥ दिक्पालों के स्वरूप का ध्यान—(१ पूर्व दिशा के स्वामी) देवराज इन्द्र शची देवी के साथ ऐरावत पर आरूढ हो सुशोभित हो रहे हैं। उनके हाथ में वज्र है। उनकी कान्ति सुवर्ण सदृश है तथा वे दिव्य आभूषणों से विभूषित हैं। (२ अग्निकोण के अधीश्वर) अग्निदेव के सात हाथ, सात जिह्वायें और छह मुख हैं। वे भेड़ पर सवार हैं, उनकी कान्ति लाल है, वे स्वाहा देवी के प्रियतम हैं तथा स्रुक्-स्रुवा और नाना प्रकार के आयुध धारण करते हैं। (३ दक्षिण दिशा के स्वामी) यमराज का दण्ड ही अस्त्र है। उनकी आंखें लाल हैं और वे भैंसे पर आरूढ़ हैं। उनके शरीर का रंग कुछ लाली लिये हुए सांवला है। वे ऊपर की ओर मुंह किये हुए हैं तथा शुभस्वरूप हैं। (४ नैर्ऋत्यकोण के अधिपति) निर्ऋति का वर्ण नील है। वे अपने हाथों में ढाल और तलवार धारण किये हुए हैं; मनुष्य ही उनका वाहन है। उनकी आंखें भयंकर तथा केश ऊपर की ओर उठे हुए हैं। वे सामर्थ्य- शाली हैं और उनकी गर्दन बहुत बड़ी है। (५ पश्चिम दिशा के स्वामी) कालिका देवी के प्राणनाथ वरुण की अंगकांति पीली है। वे नाग पाश धारण करते हैं। ग्राह उनका वाहन है और रत्नमय आभूषणों से विभूषित हैं। (६ वायव्य कोण के अधिपति) अञ्जनीपति वायुदेव काले रंग के मृग पर आरूढ़ हैं। वे समस्त प्राणियों के प्राण- स्वरूप हैं। उनकी दो भुजाएं हैं। वे हाथ में कलश धारण करते हैं। उनकी अंग कान्ति सुवर्ण के सदृश है। ७ उत्तर दिशा के स्वामी कुबेर चित्रलेखा देवी के प्राणवल्लभ तथा यक्षों और गन्धर्वों के राजा हैं। (८ ईशानकोण के स्वामी) गौरीपति भगवान् शंकर हाथ में पिनाक लिये वृषभ पर आरूढ़ हैं। वे सबसे श्रेष्ठ देवता हैं। उनकी अंग कान्ति श्वेत है। माथे पर चन्द्रमा का मुकुट सुशोभित है और सर्पमय यज्ञोपवीत धारण करते हैं। (इस प्रकार इन सब दिक्पालों का ध्यान और पूजन करना चाहिए) ॥६८६-६९३॥