बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंषट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ५०३ श्वेतवर्णं चन्द्रमौलिं नागयज्ञोपवीतिनम् । अप्रयाणे स्वयं कार्या प्रेष्या भूभुजस्तथा ॥६६४॥ कार्यं निर्गमनं छत्रं ध्वजशस्त्रास्त्रवाहनैः । स्वस्थानान्निर्गमस्थानं दंडानां च शतद्वयम् ॥६६५॥ चत्वारिंशद्द्वादशैव प्रस्थितः स स्वयं गतः । दिनान्येकत्र न वसेत्सप्तषड् वा परो जनः ॥६६६॥ पंचरात्रं च पुरतः पुनर्लग्नांतरे व्रजेत् । अकालजेषु नृपतिविद्युद्गर्जितवृष्टिषु ॥६६७॥ उत्पातेषु त्रिविधेषु सप्तरात्रं तु न व्रजेत् । रत्नाकुडचशिवाकाककपोतानां गिरस्तथा ॥६६८॥ झल्लेभूकूहेमवक्षोरस्वराणां वामतो गतिः । पीतकारभरद्वाजपक्षिणां दक्षिणा गतिः ॥६६९॥ चापं त्यक्त्वा चतुष्पात्तु शुभदा वामतो मताः । कृष्णं त्यक्त्वा प्रयाणे तु कृकलासेन वीक्षितः ॥७००॥ वाराहशशगोधास्तु सर्पाणां कीर्तनं शुभम् । हृतेक्षणं नेष्टमेवव्यत्ययं कपिऋक्षयोः ॥७०१॥ मयूरच्छागनकुलचाषपारावताः शुभाः । दृष्टमात्रेण यात्रायां व्यस्तं सर्वं प्रवेशने ॥७०२॥ यात्रासिद्धिर्भवेद्दृष्टे शवेरोदनवर्जिते । प्रवेशे रोदनयुतः शवः शवप्रदस्तथा ॥७०३॥
प्रस्थानविधि—यदि किसी आवश्यक कार्यवश निश्चित यात्रालग्न में राजा स्वयं न जा सके तो छत्र, ध्वजा, शस्त्र, अस्त्र या वाहन में से किसी एक वस्तु को यात्रा के निर्धारित समय में घर से निकालकर जिस दिशा में जाना हो उसी दिशा की ओर दूर रखा दे । अपने स्थान से निर्गमस्थान (प्रस्थान रखने की जगह) २०० दण्ड (चार हाथ की लग्गी) से दूर होना उचित है । अथवा चालीस या कम से कम बारह दण्ड की दूरी होनी आवश्यक है । राजा स्वयं प्रस्तुत होकर जाय तो किसी एक स्थान में सात दिन न ठहरे । अन्य (राजमन्त्री तथा साधारण) जन भी प्रस्थान करके एक स्थान में छह या पाँच दिन न ठहरे । यदि इससे अधिक ठहरना पड़े तो उसके बाद दूसरा शुभ मुहूर्त और उत्तम लग्न विचार कर यात्रा करनी चाहिए । ॥६६४-६९६॥ असमय में (पौष से चैत्र पर्यन्त) बिजली चमके मेघ की गर्जना हो या वर्षा होने लगे तथा त्रिविध (दिव्य, आन्तरिक्ष और भौम) उत्पात होने लग जाय तो राजा को सात रात तक अन्य स्थानों की यात्रा नहीं करनी चाहिए ॥६६७॥ शकुन—यात्राकाल में रत्ना नामक पक्षी, चूहा, सियारिन, कौवा तथा कबूतर—इनके शब्द वामभाग में सुनायी दें तो शुभ होता है। छछूँदर, पिंगला (उल्लू), पल्ली और गदहा—ये यात्रा के समय वाम भाग में हों तो श्रेष्ठ हैं। कोयल, तोता और भरदूल आदि पक्षी यदि दाहिने भाग में आ जायं तो श्रेष्ठ हैं। काले रंग को छोड़कर अन्य सब रंगों के चौपाये यदि वाम भाग में दीख पड़ें तो श्रेष्ठ हैं तथा यात्रासमय में कृकलास (गिरगिट) का दर्शन शुभ नहीं है ॥६६८-७००॥ यात्राकाल में सूअर, खरगोश, गोधा (गोह) और सर्पों की चर्चा शुभ होती है, किसी भूली हुई वस्तु को खोजने के लिए जाना हो तो इनकी चर्चा अशुभ होती है। वानर और भालुओं की चर्चा का विपरीत फल होता है ॥७०१॥ यात्रा में मोर, बकरा, नेवला, नीलकंठ और कबूतर दीख जायं तो, इनके दर्शनमात्र से शुभ होता है; परन्तु लौटकर अपने नगर में आने या घर में प्रवेश करने के समय ये दर्शन दें तो सब अशुभ होता है। यात्राकाल में रोदन-शब्दरहित कोई शव सामने दीख पड़े तो यात्रा के उद्देश्य की सिद्धि होती है। परन्तु लौटकर घर आने तथा नवीन गृह में प्रवेश करने के समय यदि रोदन-शब्द के साथ शव दिखाई पड़े तो वह घातक होता है ॥७०२-७०३॥