बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५०४ नारदीयपुराणम् पतितक्लीबजटिलमत्तवांतौषधादिभिः । अभ्यक्तवसास्थिचर्माङ्गारदारुणरोगिभिः ॥७०४॥ गुडकार्पासलवणरिपुप्रश्नतृणोरगैः । वंध्याकुब्जककाषायमुक्तकेशबुभुक्षितैः ॥७०५॥ प्रयाणसमये नग्नैर्दृष्टैः सिद्धिर्न जायते । प्रज्वलाग्निसुतुरगनृपासनपुरांगनाः ॥७०६॥ गंधपुष्पाक्षतच्छत्रचामरांदोलिकं नृपः । भक्ष्येक्षुफलमृत्स्नान्नमध्वाज्यदधिगोमयाः ॥७०७॥ मद्यमांससुधाधौतवस्त्रशंखवृषध्वजाः । पुण्यस्त्रीपुण्यकलशरत्नशृङ्गारगोद्विजाः ॥७०८॥ भेरीमृदंगपटहघंटावीणादिनिःस्वनाः । वेदमंगलघोषाः स्युः यायिनां कार्यसिद्धिदाः ॥७०६॥ आदौ विह्वद्द्शकुनं दृष्ट्वा यायीष्टदेवताम् । स्मृत्वा द्वितीये विप्राणां कृत्वा पूजां निवर्तयेत् ॥७१०॥ सर्वदिक्क्षुतं नेष्टं गोक्षुतं निधनप्रदम् । अफलं यद्बालवृद्धरोगिपैत्तसिकैः कृतम् ॥७११॥ परस्त्री द्विजदेवस्वं तत्स्पृशेद्दिग्गजाश्वकान् । हन्यात्परपुरप्राप्तौ न स्त्रीन्नित्यं निरायुधान् ॥७१२॥ आदौ सौम्यायने कार्य नववास्तुप्रवेशनम् । विधाय पूर्वदिवसे वास्तुपूजाबलिक्रियाम् ॥७१३॥ माघफाल्गुनवैशाखज्येष्ठमासेषु शोभनम् । प्रवेशो मध्यमो ज्ञेयः सौम्यकार्तिकमासयोः ॥७१४॥
अपशकुन—यात्रा के समय पतित, नपुंसक, जटाधारी, पागल, औषध आदि खाकर वमन करने वाला, शरीर में तेल लगाने वाला, वसा, अस्थि, चर्म, अंगार, दीर्घरोगी, गुड़, कपास, नमक, प्रश्न (पूछने या रोकने का शब्द), तृण, गिरगिट, वन्ध्या स्त्री, कुबड़ा, गेरुआ वस्त्रधारी, खुले केश वाला, भूखा तथा नंगा—ये सब सामने उपस्थित हो जायें तो अभीष्ट-सिद्धि नहीं होती है ॥७०४-७०५॥
शुभ शकुन—प्रज्वलित अग्नि, सुन्दर घोड़ा, राजसिंहासन, सुन्दरी स्त्री, चन्दन आदि की सुगंध, फल, अक्षत, छत्र, चामर, डोली या पालकी, राजा, खाद्य पदार्थ, ईख, फल, चिकनी मिट्टी, अन्न, मधु, घृत, दही, गोबर, मद्य, मांस, चूना, धुला हुआ वस्त्र, शंख, श्वेत बैल, ध्वजा, सौभाग्यवती स्त्री, भरा हुआ कलश, रत्न, शृंगार, स्वर्णपात्र या अभिषेकपात्रों गो, ब्राह्मण, नगाड़ा, मृदंग, दुंदुभि, घंटा तथा वीणा आदि वाद्यों के शब्द, वेदमंत्र एवं मंगल गीत आदि के शब्द—ये यात्रा के समय यदि देखने या सुनने में आयें तो यात्रा करने वाले लोगों के सब कार्य सिद्ध करते हैं ॥७०६-७०९॥
अपशकुन-परिहार—यात्रा के समय प्रथम बार अपशकुन हो तो खड़ा होकर इष्टदेव का स्मरण करके फिर चले । दूसरा अपशकुन हो तो ब्राह्मणों की पूजा करके चले । यदि तीसरी बार अपशकुन हो जाय तो यात्रा स्थगित कर देनी चाहिए ॥७१०॥
छींक के फल—यात्रा के समय सभी दिशाओं की छींक निन्दित है। गौ की छींक घातक होती हैं; किन्तु बालक, वृद्ध, रोगी या कफ वाले मनुष्य की छींक निष्फल होती है ॥७११॥
परस्त्रियों का स्पर्श करने वाला तथा ब्राह्मण और देवता के धन का अपहरण करने वाला तथा अपने छोड़े हुए हाथी और घोड़े को बाँध लेने वाला, शत्रु यदि सामने आ जाय तो राजा उसे अवश्य मार डाले; परन्तु स्त्रियों तथा शस्त्रहीन मनुष्यों पर कदापि हाथ न उठाये ॥७१२॥
गृह प्रवेश—नये घर में प्रथम बार प्रवेश करना हो तो उत्तरायण के शुभ मुहूर्त में करे । पहले दिन विधिपूर्वक वास्तु-पूजा और बलि अर्पण करके गृह में प्रवेश करना चाहिए ॥७१३॥ गृह-प्रवेश में विहित मास—माघ,फाल्गुन, वैशाख और ज्येष्ठ—इन चार मासों में गृह प्रवेश श्रेष्ठ होता है । कार्तिक और मार्गशीर्ष मास में मध्यम है ।