बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंषट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ५०५
शशौज्यौतेषु वरुणत्वाष्ट्रमित्रस्थिरोडुषु । शुभः प्रवेशो देवेज्यशुक्रयोर्दृश्यमानयोः ॥७१५॥ व्यर्करारवारे तिथिषु रिक्तामावर्जितेषु च । दिवा वा यदि वा रात्रौ प्रवेशो मंगलप्रदः ॥७१६॥ चन्द्रताराबलोपेते पूर्वाह्ने शोभने दिने । स्थिरलग्ने स्थिरांशे च नैधने शुद्धिसंयुते ॥७१७॥ त्रिकोणकेन्द्रसंस्थैश्च सौम्यैस्तृपायारिगैः परैः । लग्नांत्याष्टमषष्ठस्थवर्जितेन हिमांशुना ॥७१८॥ कर्तुर्वा जन्मभे लग्ने ताभ्यामुपचयेऽपि वा । प्रवेशलग्ने स्याद्वृद्धिरन्यथे शोकनिःस्वता ॥७१९॥ दर्शनीयं गृहं रम्यं विविधैर्मंगलस्वनैः । कृत्वाकं वामतो विद्वान्भृंगारं चाग्रतो विशेत् ॥७२०॥ वर्षप्रवेशे शशिनि जलराशिगतेऽपि वा । केंद्रगे वा शुक्लपक्षे चातिवृष्टिः शुभेक्षिते ॥७२१॥ अल्पवृष्टिः पापखण्डे प्रावृट्कालेऽचिराद्भवेत् । चंद्रश्चेद्भार्गवे सर्वमेवं विधुगुणान्विते ॥७२२॥ प्रावृषींदुः सितात्सप्तराशिगः शुभवीक्षितः । मंदात्त्रिकोणसप्तस्थो यदि वा वृद्धिकृद्भवेत् ॥७२३॥ सद्यो वृष्टिकरः शुक्नो यदा बुद्धसमीपगः । तयोर्मध्यगते भानौ भवेद्वृष्टिविनाशनम् ॥७२४॥
विहित नक्षत्र- मृगशिरा, पुष्य, रेवती, शतभिषा, चित्रा, अनुराधा और स्थिर-संज्ञक (तीनों उत्तरा) और रोहिणी नक्षत्रों में बृहस्पति और शुक्र दोनों उदित हों तब रवि और मंगल को छोड़कर अन्य वारों में रिक्ता (४, ९, १४) तथा अमावास्या को छोड़कर अन्य तिथियों में दिन या रात्रिके समय गृहप्रवेश शुभप्रद होता है। चन्द्रबल और ताराबल सहित उपद्रवरहित दिन के पूर्वाह्न भाग में स्थिर राशि के नवमांशयुक्त स्थिर लग्न में जब लग्न से अष्टम स्थान शुद्ध (ग्रहरहित) हों, शुभग्रह त्रिकोण या केन्द्र में हों, पापग्रह ३, ६, ११ भावों में हों और चन्द्रमा लग्न, १२, ८, ६ से भिन्न स्थानों में हो, तब गृहप्रवेश करने वाले यजमान की जन्मराशि, जन्मलग्न या इन दोनों से उपचय (३, ६, १०, ११वीं) राशि के गृहप्रवेश लग्न में विद्यमान होने पर सब प्रकार के सुख और सम्पत्ति की वृद्धि होती है। अन्यथा इससे विपरीत समय में गृहप्रवेश किया जाय तो शोक और निर्धनता प्राप्त होती है ॥७१४-७१९॥
प्रवेश-विधि- जिस नूतन गृह में प्रवेश करना हो उसको चित्र आदि से सजाकर तथा पुष्प, तोरण आदि से अलंकृत करके वेदध्वनि, शान्तिपाठ, सौभाग्यवती स्त्रियों के मांगलिक गीत तथा वाद्य आदि के शब्दों के साथ सूर्य को वाम भाग में रखकर जल से भरे हुए कलश को आगे करके उसमें प्रवेश करना चाहिए ॥७२०॥
वृष्टि-विचार- वर्षा-प्रवेश (आर्द्रा नक्षत्र में सूर्य के प्रवेश) के समय यदि शुक्लपक्ष हो, चन्द्रमा जलचर राशि में या लग्न से केन्द्र (१, ४, ७, १०) में स्थित होकर शुभग्रह से देखे जाते हों तो अधिक वृष्टि होती है। यदि उस समय चन्द्रमा पर पापग्रह की दृष्टि हो तो दीर्घकाल में अल्पवृष्टि समझनी चाहिए। (यदि चन्द्रमा पर पाप और शुभ दोनों ग्रहों की दृष्टि हो तो मध्यम वृष्टि होती है, जिस प्रकार चन्द्रमा से फल कहा गया है, उसी प्रकार उस समय शुक्र से भी समझना चाहिए। (अर्थात् सूर्य के आर्द्रा-प्रवेश के समय चन्द्रमा और शुक्र दोनों की स्थिति देखकर तारतम्य से फल समझना चाहिए ॥७२१-७२२॥
वर्षाकाल में आर्द्रा से स्वाती तक सूर्य के रहने पर चन्द्रमा यदि शुक्र से सप्तम स्थान में अथवा शनि से पञ्चम, नवम तथा सप्तम स्थान में हो, उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि पड़े तो उस समय अवश्य वर्षा होती है ॥७२३॥
यदि बुध और शुक्र समीपवर्ती (एक राशि में स्थित) हों तो तत्काल वर्षा होती है। किन्तु उन दोनों (बुध और शुक्र) के बीच में सूर्य हो तो वृष्टि का अभाव होता है ॥७२४॥ ६४ ना० पृ०