भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 525

५०६ नारदीयपुराणम् मघादिपंचधिष्ण्यस्थःपूर्वे स्वातित्रये परे । प्रवर्षणं भृगुः कुर्याद्विपरीते न वर्षणम् ॥७२५॥ पुरतः पृष्ठतो भानोर्ग्रहा यदि समीपगाः । तदावृष्टिं प्रकुर्वन्ति न ते चेत्प्रतिलोमगाः ॥७२६॥ वामभागस्थितः शुक्नो वृष्टिकृच्चेत्तु याम्यगः । उदयास्तेषु वृष्टिः स्याद्भानोरार्द्राप्रवेशने ॥७२७॥ संध्ययोः सस्यवृद्धिः स्यात्सर्वसंपन्नृणान्निशि । स्तोकवृष्टिरनर्घः स्याद्वृष्टिः सस्यसंपदः ॥७२८॥ आर्द्रोदयेग्रभिन्ना चेद्मवेदिति न संशयः । चन्द्रेज्ये ज्ञेय वा शुक्रे केन्द्रेन्वीतिर्विनश्यति ॥७२६॥ पूर्वाषाढां गतो भानुर्जीमूतैः परिवेष्टितः । वर्षत्यार्द्रोदिमूलांतं प्रत्यक्षं प्रत्यहं तथा ॥७३०॥ वृष्टिश्चेत्पौष्णभे तस्माद्दशर्वेषु न वर्षति । सिंहे भिन्ने कुजो वृष्टिरभिन्ने कर्कटे तथा ॥७३१॥ कन्योदये प्रभिन्ने चेत्सर्वदा वृष्टिरुत्तमा । अहिर्बुध्न्यं पूर्वशस्यं परशस्या च रेवती ॥७३२॥ भरणी सर्वसस्या च सर्वनाशाय चाश्विनी । गुरोः सप्तमराशिस्थः प्रत्यग्गो भृगुजो यदा ॥७३३॥ तदातिवर्षणं भूरि प्रावृट्काले बलोज्झिते । आसप्तमक्षं शशिनः परिवेषगतोत्तरा ॥७३४॥ विद्युत्प्रपूर्णमंडूकास्वनावृष्टिर्भवेत्तदा । यदा प्रत्यङ्नता मेघाः खसप्तोपरि संस्थिताः ॥७३५॥ पतंति दक्षिणस्था ये भवेद्‌वृष्टिस्तदाचिरात् । नखैल्लिखन्तोमार्जाराइचावनिं लोहसंयुते ॥७३६॥ यदि मघा आदि पाँच नक्षत्रों में शुक्र पूर्व दिशा में उदित हों और स्वाती तीन नक्षत्रों (स्वाती, विशाखा, अनुराधा) में शुक्र पश्चिम दिशा में उदित हो तो निश्चय ही वर्षा होती है, इससे विपरीत हो तो वर्षा नहीं समझनी चाहिए ॥७२५॥ यदि सूर्य के समीप (एक राशि के भीतर होकर) कोई ग्रह आगे या पीछे पड़ते हों तो वे वर्षा अवश्य करते हैं। यदि उनकी गति वक्र न हुई हो ॥७२६॥ सूर्य के वाम भाग में शुक्र हो तो वृष्टिकारक होता है। आर्द्रा में प्रवेश के समय शुक्र दक्षिण में हो तो उदय और अस्त के समय वर्षा होती है। यदि सूर्य का आर्द्रा-प्रवेश सन्ध्या के समय हो तो सस्य (धान्य) की वृद्धि होती है। यदि रात्रि में हो तो मनुष्यों को सब प्रकार की सम्पत्ति प्राप्त होती है। यदि प्रवेश काल में चन्द्रमा, गुरु, बुध एवं शुक्र से आर्द्रा भेदित हो तो क्रमशः अल्पवृष्टि, धान्यहानि, अनावृष्टि और धान्यवृष्टि होती है; इसमें संशय नहीं है। यदि ये चारों चन्द्र, बुध, गुरु और शुक्र प्रवेश-लग्न से केन्द्र में पड़ते हों तो ईति (खेती के टिड्डी आदि सब उपद्रव) का नाश होता है ॥७२७-७२९॥ यदि सूर्य पूर्वाषाढ़ नक्षत्र में प्रवेश के समय मेघों से आच्छन्न हो तो आर्द्रा से मूल तक प्रतिदिन वर्षा होती हैं। सिंह-प्रवेश में लग्न यदि मंगल से भिन्न (भेदित) हो, कर्क-प्रवेश में अभिन्न हो एव कन्या प्रवेश में भिन्न हो तो उत्तम वृष्टि होती है ॥७३०-७३१३॥ उत्तर भाद्रपद पूर्वधान्य, रेवती परधान्य तथा भरणी सर्वधान्य नक्षत्र है । अश्विनी को सर्वधान्यों का नाशक नक्षत्र कहा गया है। वर्षा काल (चातुर्मास्य) में पश्चिम उदित हुए शुक्र यदि गुरु से सप्तम राशि में निर्बल हो तो आर्द्रा से सात नक्षत्र तक प्रतिदिन अतिवृष्टि होती है। चन्द्रमण्डल में परिवेष (घेरा) हो और उत्तर दिशा में बिजली दीख पड़े या मेढ़कों के शब्द सुनाई पड़े तो निश्चय ही वर्षा होती है। पश्चिम भाग में लटका हुआ मेघ यदि आकाश के बीच में होकर दक्षिण दिशा में जाय तो शीघ्र वर्षा होती है। बिलाव अपने नाखूनों से धरती को खोदे, लोहे (तथा तांबे और काँसे आदि) में मल जमने लगे अथवा बहुत से बालक मिलकर सड़कों पर पुल बाँधे तो ये वर्षा के सूचक चिह्न हैं ॥७३२-७३६३॥