भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ५०७

रथ्यायां सेतुबंधाः स्युर्बालानां वृष्टिहेतवः । पिपीलिकाश्रेणयश्छिन्नाः खद्योता बहवस्तदा ॥७३७॥ द्रुमादिरोहःसर्पाणां प्रीतिर्दुर्विष्टिसूचकाः । उदयास्तमये काले विवर्णोऽर्कोथ वा शशी ॥७३८॥ मधुवर्णोऽतिवायुश्चेदतिवृष्टिर्भवेत्तदा । प्राङ्मुखस्य तु कूर्मस्य नवांगेषु धरामिमाम् ॥७३८½॥ विमज्य नवधा खण्डे मंडलानि प्रदक्षिणम् । अन्तर्वेदाश्च पांचालस्तस्येदं नाभिमण्डलम् ॥७४०॥ प्राच्यामागधलाटोत्था देशास्तन्मुखमंडलम् । स्त्रीकौलिंगकिराताख्या देशास्तद्द्बाहुमंडलम् ॥७४१॥ अवंती द्रविडा भिल्ला देशास्तत्पार्श्वमण्डलम् । गौडकौंकणशाल्वांध्रपौंड्रस्तत्पादमण्डलम् ॥७४२॥ सिंधुकाशिमहाराह्रूसौराष्ट्राः पुच्छमण्डलम् । पुलिंदचीनयवनगुर्जराः पादमंडलम् ॥७४३॥ कुरुकाश्मीरमाद्रेयमत्स्यास्तत्पार्श्वमण्डलम् । खसांगवंगवाहीकं कांबोजाः पाणिमंडलम् ॥७४४॥ कृत्तिकादीनि धिष्ण्यानि त्रीणि त्रीणि क्रमान्न्यसेत् । नाभ्यादिषु नवांगेषु पापैर्दुष्टं शुभैः शुभम् ॥७४५॥ देवता यत्र नृत्यंति पतंति प्रज्वलंति च । मुहु रुदंति गायंति प्रस्विद्यंति हसंति च ॥७४६॥ वमंत्यग्नि तथा धूमं स्नेहं रक्तं पयो जलम् । अधोमुखाधितिष्ठंति स्थानात्स्थानं व्रजंति च ॥७४७॥ एवमाद्या हि दृश्यंते विकाराः प्रतिमासु च । गंधर्वनगरं चैव दिवा नक्षत्रदर्शनम् ॥७४८॥

चींटी की पंक्ति छिन्न-भिन्न हो जाय, आकाश में बहुतेरे जुगुनू दीख पड़ें तथा सर्पों का वृक्ष पर चढ़ना और प्रसन्न होना देखा जाय तो ये सब दुवृष्टिसूचक हैं । उदय या अस्त समय में यदि सूर्य या चन्द्रमा का रंग बदला हुआ जान पड़े या उनकी कान्ति मधु के समान दीख पड़े तथा बड़े जोर की हवा चलने लगे तो अतिवृष्टि होती है ॥ ७३७-७३८½ ॥ पृथ्वी के आधार कूर्म के अंग-विभाग--कूर्म देवता पूर्व की ओर मुख करके स्थित हैं, उनके नव अंगों में इस भारत भूमि के नौ विभाग करके प्रत्येक खंड में प्रदक्षिण-क्रम से विभिन्न मंडलों (देशों) को समझे। अन्त- र्वेदी (मध्य विभाग) में पाञ्चालदेश स्थित है, वहाँ कूर्म भगवान् का नाभिमण्डल है। मगध और लाटदेश पूर्व दिशा में विद्यमान हैं, वे ही उनका मुखमण्डल हैं। स्त्री, कलिंग और किरात देश भुजा हैं। अवन्ती, द्राविड़ और भिल्ल देश उनका दाहिना पार्श्व हैं। गौड, कोंकण, शाल्व, आन्ध्र और पौण्ड्र ये सब देश दोनों अगले पैर हैं। सिन्ध, काशी, महाराष्ट्र तथा सौराष्ट्रदेश पुच्छभाग हैं। पुलिन्द, चीन, यवन और गुर्जर ये सब देश दोनों पिछले पैर हैं। कुरु, काश्मीर, मद्र तथा मत्स्यदेश वाम पार्श्व हैं। खस (नेपाल), अंग, वंग, बाह्लीक और काम्बोज-ये दोनों हाथ हैं ॥७३९-७४४॥ इन नवों अंगों में क्रमशः कृत्तिका आदि तीन-तीन नक्षत्रों का न्यास करे । जिस अंग के नक्षत्र में पापग्रह रहते हैं, उस अंग के देशों में तब तक अशुभ फल होता है और जिस अंग के नक्षत्रों में शुभग्रह रहते हैं; उस अंग के देशों में शुभ फल होते हैं ॥७४५॥ मूर्ति-प्रतिमा-विकार--देवताओं की प्रतिमा यदि नीचे गिर पड़े, जले, बार-बार रोये, गाये, पसीने से तर हो जाय, हँसे, अग्नि, धुआँ, तेल, शोणित, दूध या जल का वमन करे, अधोमुख हो जाय, एक स्थान से दूसरे स्थान में चली जाय तथा इसी तरह की अनेक अद्भुत बातें दीख पड़ें तो ये प्रतिमा-विकार कहलाते हैं। ये विकार अशुभ फल के सूचक होते हैं ॥७४६-७४७½॥ विविध विकार--यदि आकाश में गन्धर्व-नगर (ग्राम के समान आकार), दिन में ताराओं का दर्शन, उल्कापतन, काष्ठ, तृण और शोणित की वर्षा, गन्धर्वो का दर्शन, दिग्दाह, दिशाओं में धूम्न छा जाना, दिन या