बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५०८ नारदीयपुराणम् महोल्कापतनं काष्ठतृणरक्तप्रवर्षणम् । गांधर्वं देहदिग्धूमं भूमिकंपं दिवा निशि ॥७४८॥ अनग्नौ च स्फुलिङ्गाश्चज्वलनं च विनेंधनम् । निशीन्द्रचापमंडकं शिखरे श्वेतवायसः ॥७५०॥ दृश्यंते विस्फुलिङ्गाश्च गोगजाश्वोष्ट्रगात्रतः । जंतवो द्वित्रिशिरसो जायते वापि योनिषु ॥७५१॥ प्रातः सूर्याश्चतसृषु ह्यादितायुगपद्रवेः । जम्बूकग्रामसंवासः केतूनां च प्रदर्शनम् ॥७५२॥ काकानामाकुलं रात्रौ कपोतानां दिवा यदि । अकाले पुष्पिता वृक्षा दृश्यंते फलिता यदि ॥७५३॥ कार्यं तच्छेदनं तत्र ततः शांतिर्मनीषिभिः । एवमाद्या महोत्पाता बहवः स्थाननाशदाः ॥७५४॥ केचिन्मृत्युप्रदाः केचिच्छत्रुभ्यश्च भयप्रदाः । मभ्याद्भयं यशो मृत्युः क्षयः कीर्तिः सुखासुखम् ॥७५५॥ ऐश्वर्यं धनहानि च मधुच्छन्नं च वाल्मिकम् । इत्यादिषु च सर्वेषूत्पातेषु द्विजसत्तम ॥७५६॥ शांतिं कुर्यात्प्रयत्नेन कल्पोक्तविधिना शुभम् । इत्येतत्कथितं विप्र ज्यौतिषं ते समासतः ॥७५७॥ अतः परं प्रवक्ष्यामि च्छंदःशास्त्रमनुत्तमम् ॥७५८॥ इति श्रीबृहन्ना० पूर्व० बृहदुपाख्याने द्वितीयपादे षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥५६॥
रात्रि में भूकम्प होना, बिना आग के स्फुलिंग (अंगार) दीखना, बिना लकड़ी के आग का जलना, रात्रि में इन्द्र- धनुष या परिवेष (घेरा) दीखना, पर्वत या वृक्षादि के ऊपर उजला कौआ दिखाई देना तथा आग को चिनगारियों का प्रकट होना आदि बातें दिखाई देने लगें, गो, हाथी और घोड़ों के दो या तीन मस्तक वाला बच्चा पैदा हो । प्रातःकाल एक साथ ही चारों दिशाओं में अरुणोदय-सा प्रतीत हो, गांवों में गीदड़ों का दिन में वास हो, धूम- केतुओं का दर्शन होने लगे ।।७४८-७५२।। तथा रात्रि में कौओं का और दिन में कबूतरों का क्रन्दन हो तो ये भयंकर उत्पात हैं। वृक्षों में बिना समय के फूल या फल दीख पड़े तो उस वृक्ष को काट देना चाहिए । इस प्रकार और भी वृक्ष से बड़े-बड़े उत्पात दृष्टिगोचर होते हैं, वे स्थान (देश या ग्राम) का नाश करने वाले होते हैं। बहुत से उत्पात घातक होते हैं; बहुत से शत्रुओं से भय उपस्थित करते हैं। बहुत उत्पातों से भय, यश, मृत्यु, हानि, कीर्ति, सुख-दुःख और ऐश्वर्य की भी प्राप्ति होती है। यदि वल्मीक (दीमक की मिट्टी के ढेर) पर शहद दीख पड़े तो धन की हानि होती है। द्विजश्रेष्ठ ! इस तरह के सभी उत्पातों में यत्नपूर्वक कल्पोक्त विधि से शान्ति अवश्य करा लेनी चाहिए। नारद ! इस प्रकार संक्षेप से मैंने ज्योतिष शास्त्र का वर्णन किया है। अब वेद के छहों अंगों में श्रेष्ठ छन्दःशास्त्र का परिचय देता हूँ ।।७५३-७५८।। श्री नारदीयपुराण के पूर्व भाग के द्वितीय पाद में छप्पनवां अध्याय समाप्त ॥५६॥