बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 528, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः सनंदन उवाच वैदिकं लौकिकं चापि छन्दो द्विविधमुच्यते । मात्रावर्णविभेदेन तच्चापि द्विविधं पुनः ॥१॥ मयौ रसौ तजौ भनौ गुरुलघुरपि द्विज । कारणं छंदसि प्रोक्ताश्छन्दःशास्त्रविशारदैः ॥२॥ सर्वगो मगणः प्रोक्तोमुखलो यगणः स्मृतः । मध्यलो रगणश्चैव प्रांत्यगः सगणो मतः ॥३॥ तगणोऽतलघुः ख्यातो मध्यगो जो भआदिगः । त्रिलघुनंगरणः प्रोक्तस्त्रिका वर्णगणा मुने ॥४॥ चतुर्लास्तु गणाः पञ्च प्रोक्त आर्यादिसंमताः । संयोगश्च विसर्गश्चानुस्वारो लघृतः परः ॥५॥ लघोर्दीर्घत्वमाख्याति दीर्घो गो लो लघुर्मतः । पादश्चतुर्थभागः स्याद्विच्छेद्यतिरुरुच्यते ॥६॥ सममर्द्धसमं वृत्तं विषमं चापि नारद । तुल्यलक्षणतः पादचतुष्के सममुच्यते ॥७॥ आदित्रिके द्विचतुर्थे सममर्द्धसमं ततम् । लक्ष्म भिन्नं यस्य पादचतुष्के विषमं हि तत् ॥८॥ एकाक्षरात्समारभ्य वर्णैकैकस्य वृद्धितः । षड्विंशत्यक्षरं यावत्पादस्तावत्पृथक् पृथक् ॥६॥
अध्याय ५७ छन्दः शास्त्र का संक्षिप्त परिचय सनन्दन बोले-नारद ! छन्द दो प्रकार के बताये जाते हैं-वैदिक और लौकिक । मात्रा और वर्ण के भेद से वे लौकिक या वैदिक छन्द भी दो-दो प्रकार के हो जाते हैं (मात्रिक छन्द और वर्णिक छन्द) ॥१॥ छन्द शास्त्र के विद्वानों ने मगण, यगण, रगण, तगण, जगण, भगण और नगण तथा गुरु एवं लघु-इन्हीं को छन्दों की सिद्धि में कारण बताया है ॥२॥ जिसमें सभी अर्थात् तीनों अक्षर गुरु हों उसे मगण (ऽऽऽ) कहा गया है, जिसका आदि अक्षर लघु (और शेष दो अक्षर गुरु) हो, वह यगण (।ऽऽ) माना गया है। जिसका मध्यवर्ती अक्षर लघु हो, वह रगण (ऽ।ऽ) और जिसका अन्तिम अक्षर गुरु हो, वह सगण (।।ऽ) है ॥३॥ जिसमें अन्तिम अक्षर लघु हो, वह तगण (ऽऽ।) कहा गया है। जहाँ मध्य गुरु हो, वह जगण (।ऽ।) और जिसमें आदि गुरु हो, वह भगण (ऽ।।) है । मुने ! जिसमें तीनों अक्षर लघु हों, वह नगण (।।।) कहा गया है। तीन अक्षरों के समुदाय का नाम गण है ॥४॥ आर्या आदि छन्दों में चार मात्रा वाले पाँच गण कहे गये हैं, जो चार लघु वाले गण से युक्त हैं। यदि लघु अक्षर से परे संयोग, विसर्ग और अनुस्वार हो तो वह लघु की दीर्घता का बोधक होता है। इस छन्दः शास्त्र में 'ग' का अर्थ गुरु या दीर्घ माना गया है और 'ल' का अर्थ लघु समझा जाता है। पद्य या श्लोक के एक चौथाई भाग को पाद कहते हैं । विच्छेद या विराम का नाम 'यति' है ॥५-६॥ नारद ! वृत्त (छन्द) के तीन भेद माने गये हैं-समवृत्त, अर्ध समवृत्त तथा विषमवृत्त । जिसके चारों चरणों में समान लक्षण लक्षित होता हो, वह समवृत्त कहलाता है ॥७॥ जिसके प्रथम और तीसरे चरणों में एवं दूसरे तथा चौथे चरणों में समान लक्षण हों, वह अर्धसम वृत्त हैं । जिसके चारों चरणों में एक दूसरे से भिन्न लक्षण लक्षित होते हों, वह विषमवृत्त है ॥८॥ एक अक्षर के पाद से आरम्भ करके एक-एक अक्षर बढ़ाते हुए जब तक छब्बीस अक्षर का पाद पूरा हो तब तक पृथक्-पृथक् छन्द