भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

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पृष्ठ 529

५१० नारदीयपुराणम् तत्परं चंडवृष्ट्यादिदंडकाः परिकल्पिताः । त्रिभिः षड्भिः पदैर्गाथाः शृणु संज्ञा यथोत्तरम् ॥१०॥ उक्तात्युक्ता तथा मध्या प्रतिष्ठाऽन्या सुपूर्विका । गायत्र्युष्णिगनुष्टुप् च बृहती पंक्तिरेव च ॥११॥ त्रिष्टुप् च जगती चैव तथातिजगती मता । शक्वरो सातिपूर्वा च अष्ट्यत्यष्टी ततः स्मृते ॥१२॥ धृतिश्च विधृतिश्चैव कृतिः प्रकृतिराकृतिः । विकृतिः संकृतिश्चैव तथातिकृतिरुत्कृतिः ॥१३॥ इत्येताश्छन्दसां संज्ञा प्रस्ताराद्भेदभागिकाः । पादे सर्वगुरौ पूर्वल्लघुं स्थाप्य गुरोरधः ॥१४॥ यथोपरि तथा शेषमग्रे प्राग्वन्न्यसेदपि । एष प्रस्तार उदितो यावत्सर्वलघुर्भवेत् ॥१५॥ नष्टांकाद्धे समेलः स्याद्विषमे सैव सोर्द्धगः । उद्दिष्टे द्विगुणानाद्यादंगान्संमील्य लस्थितान् ॥१६॥ कृत्वा सैकान्वदेत्संख्यामिति प्राहुः पुराविदः । वर्णान्सैकान्वृत्तमवानुत्तराधरतः स्थितान् ॥१७॥ एकादिक्रमतश्चैकानुपर्युपरि विन्यसेत् । उपांत्यतो निवर्तेत त्यजन्नेकैकसूर्ध्वतः ॥१८॥ बनते हैं। छब्बीस अक्षर से अधिक का चरण होने पर चण्डवृष्टिप्रपात दण्डक बनते हैं । तीन या छह पादों से गाथा होती है । अब क्रमशः एक से छब्बीस अक्षर तक के पाद वाले छन्दों की संज्ञा सुनो ॥९-१०॥ उक्ता, अत्युक्ता, मध्या, प्रतिष्ठा, सुप्रतिष्ठा, गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप्, बृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप्, जगती, अतिजगती, शक्वरी, अतिशक्करी, अष्टि, अत्यष्टि, धृति, विधृति, (या अतिधृति) कृति, प्रकृति, आकृति, विकृति, संकृति, अतिकृति या अभिकृति तथा उत्कृति ॥११-१३॥ ये छन्दों की संज्ञाये हैं, प्रस्तार से इनके अनेक भेद होते हैं। सम्पूर्ण गुरु अक्षर वाले पाद में प्रथम गुरु के नीचे लघु लिखना, चाहिए, फिर दाहिनी ओर की पंक्ति को ऊपर की पंक्ति के समान भर दे । तात्पर्य यह है कि शेष स्थानों में ऊपर के अनुसार गुरु-लघु आदि भरे। इस क्रिया को बराबर करता जाय । इसे करते हुए ऊन स्थान अर्थात् बायीं ओर शेष स्थान में गुरु ही लिखे। यह क्रिया तब तक करता रहे, जब तक कि सभी लघु अक्षरों की प्राप्ति न हो जाय। इसे प्रस्तार कहा गया है ॥१४-१५॥ (प्रस्तार नष्ट हो जाने पर यदि उसके किसी भेद का स्वरूप जानना हो तो उस जानने की विधि को 'नष्ट प्रत्यय' कहते हैं ।) यदि नष्ट अंक सम है तो उसके लिए एक लघु लिखे ओर उसका आधा भी यदि सम हो तो उसके लिए पुनः एक लघु लिखे। यदि नष्ट अंक विषम हो तो उसके लिए एक गुरु लिखे और उसमें एक जोड़ कर आधा करे। वह आधा भी यदि विषम हो तो उसके लिए भी गुरु ही लिखे। यह क्रिया तब तक करता रहे जब तक अभीष्ट अक्षरों का पाद प्राप्त न हो जाय (प्रस्तार के किसी भेद का स्वरूप तो ज्ञात हो; किन्तु संख्या ज्ञात न हो तो उसके जानने की विधि को 'उद्दिष्ट' कहते हैं ।) उद्दिष्ट में गुरु-लघु-बोधक जो चिह्न हों, उनमें पहले अक्षर पर एक लिखे और क्रमशः दूसरे अक्षरों पर दूने अंक लिखता जाय; फिर लघु के ऊपर जो अंक हों, उन्हें जोड़कर उसमें एक और मिला दे तथा वही उद्दिष्ट स्वरूप की संख्या बताये, ऐसा पौराणिक विद्वानों का कथन है ॥१६३॥ (अमुक छन्द के प्रस्तार में एक गुरु वाले या एक लघु वाले या तीन गुरु वाले भेद कितने हो सकते हैं; यह पृथक्-पृथक् जानने की जो प्रक्रिया है, उसे 'एकद्वयादिलगक्रिया' कहते हैं ।) छन्द के अक्षरों की जो संख्या है, उसमें एक अधिक जोड़कर उतने ही एकांक ऊपर-नीचे के क्रम से लिखे । उन एकांकों को ऊपर की अन्य पंक्ति में जोड़ दे; किन्तु अन्त्य के समीपवर्ती अंक को न जोड़े और ऊपर के एक-एक अंक को त्याग दे । ऊपर के सर्वगुरु वाले पहले भेद से नीचे तक गिने । इस रीति से प्रथम भेद सर्वगुरु, दूसरा भेद एक गुरु और तीसरा भेद द्विगुरु होता है । इसी तरह नीचे से ऊपर की ओर ध्यान देने से सबसे नीचे का सर्वलघु, उसके ऊपर