बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउपर्याद्याद्गुरोरेवमेकद्वयादिलगक्रिया । लगक्रियांकसंदोहे भवेत्संख्याविमिश्रिते ॥१७॥ उद्दिष्टांकसमाहारः सैको वा जनयेदिमाम् । संख्यैव द्विगुणैकोना सद्भिरध्वा प्रकीर्तितः ॥२०॥ इत्येतत्किंचिदाख्यातं लक्षणं छंदसां मुने । प्रस्तारोक्तप्रभेदानां नामानंत्यं प्रगाहते ॥२१॥ इतिश्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने द्वितीयपादे सङ्क्षिप्तच्छन्दोवर्णनं नाम सप्त- पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥५७॥
अथाष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः नारद उवाच अनूचानप्रसंगेन वेदांगान्यखिलानि च । श्रुतानि त्वन्मुखाम्भोजात्समासव्यासयोगतः ॥१॥ शुकोत्पत्तिं समाचक्ष्व विस्तरेण महामते । सनंदन उवाच मेरुशृङ्गे किल पुरा कर्णिकारवनायते ॥२॥ विजहार महादेवो भौमैर्भूतगणैर्वृतः । शैलराजसुता चैव देवी तत्राभवत्पुरा ॥३॥ तत्र दिव्यं तपस्तेपे कृष्णद्वैपायनः प्रभुः । योगेनात्मानमाविश्य योगधर्मपरायणः ॥४॥
का एक लघु, तीसरा भेद द्विलघु इत्यादि होता है । इस प्रकार एकद्वयादि-लगक्रिया जाननी चाहिए । लगक्रिया के अंकों को जोड़ देने से उस छन्द के प्रस्तार की पूरी संख्या ज्ञात हो जाती है । यही संख्यान प्रत्यय कहलाता है । अथवा उद्दिष्ट पर दिये हुए अंकों को जोड़कर उसमें एक का योग कर दिया जाय तो वह भी प्रस्तार की पूरी संख्या को प्रकट कर देता है । छन्द के प्रस्तार को अंकित करने के लिए जो स्थान का नियमन किया जाता है, उसे अध्वयोग प्रत्यय कहते हैं । प्रस्तार की जो संख्या है, उसे दूना करके एक घटा देने से जो अंक आता है, उतने ही अंगुल का उसके प्रस्तार के लिए अध्वा या स्थान कहा गया है ॥१७-२०॥ मुने ! यह छन्दों का किंचित् लक्षण बताया गया है । प्रस्तार द्वारा प्रतिपादित होने वाले उनके भेद-प्रभेदों की संख्या अनन्त है, ॥२१॥ श्री नारदीय पुराण के पूर्व भाग के द्वितीय पाद में संक्षिप्त छन्दोवर्णन नामक सत्तावनवाँ अध्याय समाप्त ॥५७॥
अध्याय ५८ शुक का इतिहास निरूपण नारद बोले—आपके श्रीमुख से मैंने षडंग वेदों के अध्ययन प्रसङ्ग में सम्पूर्ण वेदांगों को संक्षेप और विस्तार रूप से सुन लिया । अब हे महामते ! कृपा कर शुक-जन्म कथा को विस्तारपूर्वक कहिए ॥१३॥ सनन्दन ने कहा—प्राचीन काल में कर्णिकार (कनेर) वन से आच्छादित विस्तृत मेरु शृंग पर महादेव शंकर अपने भूमि-वासी भूत गणों के साथ वन विहार कर रहे थे । उसी स्थान पर उससे पूर्व समय में देवी हिम- गिरि कन्या भी हुई थीं ॥२-३॥ मुनिसत्तम ! प्रभु कृष्ण द्वैपायन ने योग धर्म की साधना में निरत होकर योग द्वारा आत्मा में मनोनिरोध कर उसी वन में पुत्र की कामना से तपस्या प्रारम्भ की । उनके मन में यही संकल्प था