बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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५१२ नारदीयपुराणम् धारयन्स तपस्तेपे पुत्रार्थं मुनिसत्तमः । अग्नेर्भूमेस्तथा वायोरंतरिक्षस्य चाभितः ॥५॥ वीर्येण संमतः पुत्रो मम भूयादिति स्म ह । संकल्पेनाथ सोऽनेन दुष्प्रापमकृतात्मभिः ॥६॥ वरयामास देवेशमास्थितस्तप उत्तमम् । अतिष्ठन्मारुताहारः शतं किल समाः प्रभुः ॥७॥ आराधयन्महादेवं बहुरूपमुमापतिम् । तत्र ब्रह्मर्षयश्चैव सर्वे देवर्षयस्तथा ॥८॥ लोकपालाश्च साध्याश्च वसुभिश्चाष्टभिः सह । आदित्याश्चैव रुद्राश्च दिवाकरनिशाकरौ ॥६॥ विश्वावसुश्च गंधर्वः सिद्धाश्चाप्सरसां गणः । तत्र रुद्रो महादेवः कर्णिकारमयीं शुभाम् ॥१०॥ धारयानः स्रजं भाति शरदीव निशाकरः । तस्मिन् दिव्ये वने रम्ये देवदेवर्षिसंकुले ॥११॥ आस्थितः परमं योगं व्यासः पुत्रार्थमुद्यतः । न चास्य हीयते वर्णो न ग्लानिरुपजायते ॥१२॥ त्रयाणामपि लोकानां तदद्भुतमिवाभवत् । जटाश्च तेजसा तस्य वैश्वानरशिखोपमाः ॥१३॥ प्रज्वलंत्यः स्म दृश्यंते युक्तस्यामिततेजसः । एवं विधेन तपसा तस्य भक्त्या च नारद ॥१४॥ महेश्वरः प्रसन्नात्मा चकार मनसा मतिम् । उवाच चैनं भगवांस्त्र्यंबकः प्रहसन्निव ॥१५॥ यथा ह्यग्निर्यथा वायुर्यथा भूमियंथा जलम् । यथा खं च तथा शुद्धो भविष्यति सुतस्तव ॥१६॥ तद्भावभागी तद्बुद्धिस्तदात्मा तदुपाश्रयः । तेजसा तस्य लोकांस्त्रीन्यशः प्राप्स्यति केवलम् ॥१७॥ एवं लब्ध्वा वरं देवो व्यासः सत्यवतीसुतः । अरणिं त्वथ संगृह्य ममंथाग्निचिकीर्षया ॥१८॥ अथ रूपं परं विप्र बिभ्रतीं स्वेन तेजसा । घृताचीं नामाप्सरसं ददर्श भगवानृषिः ॥१९॥ कि उनको अग्नि, वायु, आकाश और वायु के तेज से युक्त एक पुत्र हो ॥४-५½॥ इस दृढ़ संकल्प से उन्होंने देवेश की आराधना प्रारम्भ की और ऐसी उत्तम तपस्या को प्रारम्भ किया जो अजितेन्द्रिय साधकों के लिये सर्वथा दुष्प्राप्य था । पहले उस प्रभु व्यास ने उमापति बहुरूप धारी महादेव की आराधना करते हुए सौ वर्षों तक केवल वायु पान करके जीवन रक्षा की ॥६-७½॥ उस मेरु श्रृंग पर सब ब्रह्मर्षि, देवर्षि, लोकपाल, अष्ट वसुओं के सहित साध्य गण, आदित्य, रुद्र, दिवाकर, चन्द्रमा, विश्वावसु, गन्धर्व, सिद्ध और अप्सरःसमूह रहते थे ॥८-९½॥ वहीं कर्णिकार की बनी शुभ माला को धारण किये हुए शंकर जी शरद् पूर्णिमा के चन्द्रमा की भांति सुशोभित हो रहे थे ॥१०½॥ उस देव और देवर्षियों से संकुल रम्य दिव्य वन में पुत्र प्राप्ति की कामना से व्यास जी दृढ़तापूर्वक परम योग की साधना करने लगे । परन्तु तपस्या करते समय न तो उनकी शरीर कान्ति ही क्षीण हुई और न तो मुख पर कोई ग्लानि की या श्रान्ति की रेखा ही देख पड़ी ॥११-१२॥ यह त्रिलोक के लिए एक आश्चर्यजनक घटना सी हुई; क्योंकि तपस्याकाल में क्लान्ति की अपेक्षा उनकी जटाओं में अग्नि की लपटों के समान एक विशेष प्रकार की आभा आ गई और अमित तेजस्वी उस योगी की वे जटायें अग्नि-ज्वाला के समान जलती हुई सी दिखाई देती थीं । नारद ! उनको इस प्रकार की तपस्या और भक्ति से महेश्वर प्रसन्न हो गये और उनको वरदान देने की इच्छा की । तब हँसते हुए भगवान् त्रिनेत्र ने व्यास से कहा ॥१३-१५॥ जिस प्रकार अग्नि, वायु, भूमि, जल और आकाश शुद्ध हैं उसी प्रकार तुमको शुद्ध और तेजस्वी पुत्र होगा ॥१६॥ उन्हीं के भावों से युक्त, उन्हीं की बुद्धि वाला, उन्हो का स्वरूप और उन्हीं का उपाश्रय होगा । उसके तेज से तीनों लोकों में उसका यश फैलेगा ॥१७॥ इस प्रकार का वर प्राप्त कर सत्यवती-सुत व्यास ने अरणि को इकट्ठा किया और अग्नि उत्पन्न करने की इच्छा से उसका मन्थन किया ॥१८॥ अरणि मन्थन के अनन्तर ही भगवान् ऋषि ने अपने तेज और रूप से अलौकिक सुन्दरी घृताची नामक अप्सरा को देखा ॥१९॥ मुनीश्वर ! उस वन में