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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 532, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 532

अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ५१३ स तामप्सरसं दृष्ट्वा सहसा काममोहितः । अभवद्भगवान्व्यासो वने तस्मिन्मुनीश्वर ॥२०॥ सा तु कृत्वा तदा व्यासं कामसंविग्नमानसम् । शुकीभूया महारम्या घृताची समुपागमत् ॥२१॥ स तामप्सरसं दृष्ट्वा रूपेणान्येन संवृताम् । स्मरराजेनानुगतः सर्वगात्रातिगेन ह ॥२२॥ स तु धैर्येण महता निगृह्णन् हृच्छयं मुनिः । न शशाक नियंतुं तं व्यासः प्रविसृतं मनः ॥२३॥ भावित्वाच्चैव भाव्यस्य घृताच्या वपुषाहृतम् । यत्नान्नियच्छतश्चापि मुने एतच्चिकीर्षया ॥२४॥ अरण्यामेव सहसा तस्य शुक्रमवापतत् । शुक्रं निर्मथ्यमानेऽस्यां शुक्नो जज्ञे महातपाः ॥२५॥ परमर्षिर्महायोमी अरणीगर्भसंभवः । यथैव हि समिद्धोऽग्निर्भाति हव्यमुपात्तवान् ॥२६॥ तथा रूपः शुको जज्ञे प्रज्वलन्निव तेजसा । बिभ्रच्चित्रं च विप्रेंद्र रूपवर्णमनुत्तमम् ॥२७॥ तं गंगां सरितां श्रेष्ठां मेरुपृष्ठे स्वरूषिणीम् । अभ्येत्य स्नापयामास वारिणा स्वेन नारद ॥२८॥ कृष्णाजिनं चांतरिक्षाच्छुकार्थं भुव्यवापतत् । जेगीयंते च गंधर्वा ननृतुश्चाप्सरोगणाः ॥२८॥ देवदुन्दुभयश्चैव प्रावाद्यंत महास्वनाः । विश्वावसुश्च गंधर्वस्तथा तुंबुरुनारदौ ॥३०॥ हाहाहूहूश्च गंधर्वो तुष्टुवुः शुकसंभवम् । तत्र शक्रपुरोगाश्च लोकपालाः समागताः ॥३१॥ देवा देवर्षयश्चैव तथा ब्रह्मर्षयोऽपि च । दिव्यानि सर्वपुष्पाणि प्रववर्ष च मारुतः ॥३२॥ जंगमं स्थावरं चैव प्रहृष्टमभवज्जगत् । तं महात्मा स्वयं प्रीत्या देव्या सह महाद्युतिः ॥३३॥ उस अप्सरा को देखकर भगवान् व्यास काममोहित हो गए ॥२०॥ वह अप्सरा मुनि व्यास को कामातुर बना कर स्वयं अति सुन्दरी शुकी बनकर उनके पास आई ॥२१॥ वे ऋषि शुकी रूप में आई हुई उस अप्सरा को देखकर सब अंगों को व्यथित कर देने वाले कामदेव के वश में हो जाने से मह्यन्त धैर्यपूर्वक काम को वश में करने का प्रयत्न करने पर भी अपने कामातुर मन को वश में न कर सके ॥२२-२३॥ भावी की प्रबलता से घृताची के रूप सौन्दर्य से आकृष्ट उस मुनि ने यत्न पूर्वक मन को वश में करने का प्रयत्न किया परन्तु तो भी काम प्रेरणा से आतुर होने के कारण उस अरणि पर ही उनका वीर्य गिर पड़ा । उस अरणि मन्थन से मुनि का शुक्र भी मथ उठा जिससे उस अरणि में ही अरणि गर्भ से एक महायोगी शुक नामक परम ऋषि उत्पन्न हुआ । जिस प्रकार हविष्य को पाकर अग्नि प्रज्वलित हो उठती है उसी प्रकार अपने तेज से जलता हुआ वह शुक उस अरणि से उत्पन्न हुआ । विप्रन्द्र ! उस समय उस तेजस्वी बालक का रूप अलौकिक और आश्चर्यचकित करने वाला था ॥२४-२७॥ नारद ! उस बालक को मेरुपृष्ठ पर बहने वाली सरित्श्रेष्ठ गंगा नदी के पास जो कि घृताची का ही रूप है—ले गईं और अपने जल से उस तेजस्वी बालक को नहलाया ॥२८॥ उस समय आकाश से शुक के लिए कृष्ण मृगचर्म अनायास पृथ्वी पर गिर पड़ा, गन्धर्व प्रसन्न होकर मंगल गान करने लगे, अप्सरायें नाचने लगीं ॥२९॥ और देव,-दुन्दुभियों के गम्भीर घोष से आकाश गूंज उठा, । गन्धर्व, विश्वावसु तुंबुरु, नारद और गन्धर्व हाहा हूहू ने शुक देव जी की स्तुति की ॥३०-१/२॥ उस समय इन्द्र आदि लोकपाल, देव, देवर्षि और ब्रह्मर्षिगण भी वहां उपस्थित हो गए । वायु देव ने प्रसन्नता व्यक्त करने के लिए सब प्रकार के देव पुष्पों की वर्षा की ॥३१- ३२॥ सारा स्थावर जंगमात्मक संसार शुक जन्म से आनन्द-मग्न हो गया । महातेजस्वी महात्मा शंकर ने देवी पार्वती के साथ स्वयं उस सद्योजात मुनिकुमार का विधिवत् उपनयन किया ॥३३-१/२॥ देवेश्वर इन्द्र ने उस कुमार को दिव्य और अद्भुत कमण्डलु दिया, देवताओं ने प्रेमपूर्वक वस्त्र दिये । नारद ! हंस, शतपत्र, सारस, ६५ ना० पु०