बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५१४ नारदीयपुराणम् जातमात्रं मुनेः पुत्रं विधिनोपानयत्तदा । तस्य देवेश्वरः शक्रो दिव्यमद्भुतदर्शनम् ॥३४॥ ददौ कमंडलुं प्रीत्या देवा वासांसि चाभितः । हंसाश्च शतपत्राश्च सारसाश्च सहस्रशः ॥३५॥ प्रदक्षिणमवर्तंत शुकाश्र्चाषाश्च नारद । आरणेयस्तदा दिव्यं प्राप्य जन्म महामतिः ॥३६॥ तत्रैवोवास मेधावी व्रतचारी समाहितः । उत्पन्नमात्रं तं वेदाः सरहस्याः ससंग्रहाः ॥३७॥ उपतस्थुर्मु निश्रेष्ठं यथास्य पितरं तथा । बृहस्पति स वव्रे च वेदवेदांगभाष्यवित् ॥३८॥ उपाध्यायं द्विजश्रेष्ठ धर्ममेवानुचिंतयन् । सोऽधीत्य वेदानखिलान्सरहस्यान्ससंग्रहान् ॥३६॥ इतिहासंच कात्स्न्येन वेदशास्त्राणि चाभितः । गुरवे दक्षिणां दत्वा समावृत्तो महामुनिः ॥४०॥ उग्रं तपः समारेभे ब्रह्मचारी समाहितः । देवतानामृषीणां च बाल्येऽपि सुमहातपाः ॥४१॥ संमंत्रणीयो जन्यश्च ज्ञानेन तपसा तथा । न त्वस्य रमते बुद्धिरश्रामेषु मुनीश्वर ॥४२॥ त्रिषु गार्हस्थ्यमूलेषु मोक्षधर्मानुदर्शिनः । स मोक्षममुचिन्तयैव शुकः पितरमभ्यगात् ॥४३॥ प्राहाभिवाद्य च तदा श्रेयोऽर्थी विनयान्वितः । मोक्षधर्मेषु कुशलो भगवान् प्रब्रवीतु मे ॥४४॥ यथैव मनसः शांतिः परमा संभवेन्मुने । श्रुत्वा पुत्रस्य वचनं परमर्षिरुवाच तम् ॥४५॥ अधीष्व मोक्षशास्त्रं वै धर्मांश्च विविधानपि । पितुर्निर्देशाज्जग्राह शुको ब्रह्मविदां वरः ॥४६॥ योगशास्त्रं च निखिलं कापिलं चैव नारद । शतब्राह्मयाम् श्रिया युक्तं ब्रह्मतुल्यपराक्रमम् ॥४७॥ मेने पुत्रं यथा व्यासो मोक्षशास्त्रविशारदम् । उवाच गच्छेति तदा जनकं मिथिलेश्वरम् ॥४८॥
सुग्गे और नीलकण्ठ आदि पक्षियों ने हजारों प्रदक्षिणायें कीं । उस समय अरण से उत्पन्न वह मेधावी महा मुनि इस प्रकार लोकोत्तर जन्म प्राप्त कर उस स्थान पर एकाग्रमन होकर ब्रह्मचर्यपूर्वक रहने लगा ।।३४-३६।। उत्पन्न होते ही उस मुनिकुमार के पास रहस्य और संग्रह के सहित सम्पूर्ण वेद उपस्थित हो गए जैसे कि उसके पिता व्यास मुनि के पास आए थे ।।३७।। द्विजश्रेष्ठ ! वेद, वेदांग और भाष्यों के ज्ञाता उस मुनि-पुत्र ने केवल धर्म पालन के ही विचार से बृहस्पति को अपने उपाध्याय के रूप में वरण किया ।।३८।। थोड़े ही समय में उस महामुनि ने सम्पूर्ण रहस्य और संग्रह ग्रन्थों के सहित वेदों, सम्पूर्ण इतिहास और सांगोपांग वेद शास्त्रों का अध्ययन कर लिया । पश्चात् गुरु को दक्षिणा देकर वह गुरु आश्रम से लौट आया ।।४०।। तदनन्तर उस महातपस्वी ब्रह्मचारी ने बाल्यकाल में ही उग्र तपस्या को प्रारम्भ किया । वह अपनी तपस्या तथा ज्ञान के प्रभाव से देवता और ऋषियों का भी मन्त्रदाता और उपदेशक बन गया ।।४१।। मुनीश्वर ! मोक्ष धर्म के जिज्ञासु उस महातपस्वी शुक का मन आश्रमों के क्रमिक पालन में नहीं लगता था । ।४२।। इसलिए मोक्ष प्राप्ति का विचार कर उन्होंने अपने पिता व्यास से पूछा । पहले श्रेयस्काम उस मुनिपुत्र ने विनम्र भाव से पिता का अभिवादन किया और फिर कहा ।।४३।। आप मोक्ष धर्म के कुशल विद्वान् हैं, अतः कृपा कर आप ऐसे ज्ञान का उपदेश करें जिससे मेरे मन को परम शान्ति प्राप्त हो । पुत्र की बातों को सुनकर परम ऋषि व्यास जी ने कहा--'तुम मोक्ष शास्त्र और विविध धर्मों का अध्ययन करो' ।।४४-४५।। नारद ! पिता की आज्ञा पाकर ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठ शुक ने सम्पूर्ण, योगशास्त्र और सांख्य का अध्ययन किया । जब व्यास ने जान लिया कि अब मेरा पुत्र ब्रह्म के समान पराक्रमी, शत ब्राह्मी श्री से युक्त और मोक्ष शास्त्र का पारंगत विद्वान् हो गया है तब कहा कि पुत्र ! तुम मिथिलापति जनक के पास जाओ, वह मिथिलेश्वर तुमको भलीभांति मोक्ष धर्म का उपदेश देगा । ।।४३-४८।। पिता के आदेशानुसार धर्म की निष्ठा और मोक्ष के