बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ५१५ स ते वक्ष्यति मोक्षार्थं निखिलेन नराधिपः । पितुर्नियोगाद्गमज्जनकं मैथिलं नृपम् ॥४६॥ प्रष्टुं धर्मस्य निष्ठां वै मोक्षस्य च परायणम् । उक्तश्च मानुषेण त्वं तथा गच्छेत्यविस्मितः ॥५०॥ न प्रभावेण गन्तव्यमंतरिक्षचरेण वै । आर्जवेनैव गंतव्यं न सुखाय क्षणात्त्वया ॥५१॥ न द्रष्टव्या विशेषा हि विशेषा हि प्रसंगिनः । अहंकारो न कर्तव्यो याज्ये तस्मिन्नराधिपे ॥५२॥ स्थातव्यं वसथे तस्य स ते छेत्स्यति संशयम् । स धर्मकुशलो राजा मोक्षशास्त्रविशारदः ॥५३॥ यथा यथा च ते संयात्तत्कार्यमविशंकया । एवमुक्तः स धर्मात्मा जगाम मिथिलां मुनिः ॥५४॥ पद्भ्यां शक्तोऽंतरिक्षेण क्रांतुं भूमिं ससागराम् । सगिरींश्चाप्यतिक्रम्य भारतं वर्षमासदत् ॥५५॥ स देशान्विविधान्स्फीतानतिक्रम्य महामुनिः । विदेहान्वै समासाद्य जनकेन समागमत् ॥५६॥ राजद्वारं समासाद्य द्वारपालैर्निवारितः । तस्थौ तत्र महायोगी क्षुत्पिपासादिवर्जितः ॥५७॥ आतपे ग्लानिरहितो ध्यानयुक्तश्च नारद । तेषां तु द्वारपालानामेकस्तत्र व्यवस्थितः ॥५८॥ मध्यंगतमिवादित्यं दृष्ट्वा शुकमवस्थितम् । पूजयित्वा यथान्यायमभिवाद्य कृताञ्जलिः ॥५६॥ प्रावेशयत्ततः कक्षं द्वितीयां राजवेश्मनः । तत्रांतः पुरसंबद्धं महच्चैत्ररथोेपमम् ॥६०॥ सुविभक्तजलाक्रीडं रम्यं पुष्पितपादपम् । दर्शयित्वासने स्थाप्य राजानं च व्यजिज्ञपत् ॥६१॥ श्रुत्वा राजा शुकं प्राप्तं वारस्त्रीः स न्ययुंक्त च । सेवार्थं तस्य भावस्य ज्ञानाय मुनिसत्तम ॥६२॥ तं चारुकेश्यः शुभ्रोण्यस्तरुण्यः प्रियदर्शनाः । सूक्ष्मरक्तांबरधरास्तप्तकांचनभूषणाः ॥६३॥
परम तत्त्व को पूछने के लिए वह मैथिल नृप की राजधानी की ओर चल पड़ा । जाते समय व्यास जी ने कहा कि तुम वहाँ साधारण मनुष्य की भाँति इस प्रकार जाना कि तुमको किसी प्रकार का विस्मय न हो, अपने अलौकिक प्रभाव के द्वारा या आकाशचारी बन कर न जाना । अत्यन्त विनीत होकर अपने क्षणिक सुख की भावना का सर्वथा त्याग कर वहाँ जाना ॥४९-५१॥ किन्हीं विशेष बातों की ओर ध्यान न देना क्योंकि प्रसंग या प्रमादवश कुछ विशेष (अरुचिकर) घटनायें हो जाती हैं । उस यज्ञ कराने योग्य नृपति के प्रति किसी प्रकार का अहंकार भाव मत दिखलाना ॥५२॥ उसी राजा के भवन में ठहरना । वह मोक्ष शास्त्र का ज्ञाता, धर्मकुशल राजा तुम्हारे सन्देहों को अवश्य दूर कर देगा ॥५३॥ जो जो आज्ञायें तुमको दे उनका बिना किसी हिचकिचाहट के पालन करना । व्यास जी के उपयुक्त उपदेशों को सुन कर उस मुनि ने मिथिलापुरी की ओर प्रस्थान किया ॥५४॥ यद्यपि इस ससागरा पृथ्वी को वे मुनि आकाश मार्ग से तय कर सकते थे परन्तु वे पैदल ही पर्वतों, नदियों को पार करते हुए भारतवर्ष में आये ॥५५॥ और भारतवर्ष के विविध पवित्र देशों को पार कर विदेहों के देश में आकर जनक से मिले ॥५६॥ पहले तो राज द्वार पर द्वारपालों ने उनको रोका जिससे कि भूख प्यास की कुछ भी चिन्ता न कर वह महायोगी वहीं पर धूप में किसी प्रकार की ग्लानि न कर ध्यानस्थ होकर बैठ गया । उन द्वारपालों में से एक ने दोपहर के सूर्य की भाँति तेजस्वी शुक को वहाँ बैठा देखकर विधिवत् उनकी पूजा की फिर वह हाथ जोड़कर अभिवादन करके उनको राज भवन के द्वितीय कक्ष में ले गया ॥५७-५९½॥ वहाँ अन्तःपुर से सटे हुए चैत्ररथ वन के समान मनोहर, अनेकों खिले हुए फूलों से लदे हुए पोधों से युक्त, गृह वाटिका को, जिसमें अनेक अलग-अलग जल क्रीड़ा करने के लिए जलाशय बने हुए थे, दिखाया और वहीं एक आसन पर बैठा कर राजा से उनके आगमन के विषय में निवेदन किया ॥६०-६१॥ मुनिश्रेष्ठ राजा ने शुक का आगमन सुनकर उनकी आन्तरिक भावनाओं की परीक्षा के लिए वार स्त्रियों को उनकी सेवा के लिये नियुक्त किया ॥६२॥ अनेकों चारु केश और मनोहर नितम्ब वाली सुन्दरौ पचास तरुणियों ने, जो सूक्ष्म रक्ताम्बर और चमकीले सुवर्ण के