बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
उपर्याद्याद्गुरोरेवमेकद्वयादिलगक्रिया । लगक्रियांकसंदोहे भवेत्संख्याविमिश्रिते ॥१७॥ उद्दिष्टांकसमाहारः सैको वा जनयेदिमाम् । संख्यैव द्विगुणैकोना सद्भिरध्वा प्रकीर्तितः ॥२०॥ इत्येतत्किंचिदाख्यातं लक्षणं छंदसां मुने । प्रस्तारोक्तप्रभेदानां नामानंत्यं प्रगाहते ॥२१॥ इतिश्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने द्वितीयपादे सङ्क्षिप्तच्छन्दोवर्णनं नाम सप्त- पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥५७॥
अथाष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः नारद उवाच अनूचानप्रसंगेन वेदांगान्यखिलानि च । श्रुतानि त्वन्मुखाम्भोजात्समासव्यासयोगतः ॥१॥ शुकोत्पत्तिं समाचक्ष्व विस्तरेण महामते । सनंदन उवाच मेरुशृङ्गे किल पुरा कर्णिकारवनायते ॥२॥ विजहार महादेवो भौमैर्भूतगणैर्वृतः । शैलराजसुता चैव देवी तत्राभवत्पुरा ॥३॥ तत्र दिव्यं तपस्तेपे कृष्णद्वैपायनः प्रभुः । योगेनात्मानमाविश्य योगधर्मपरायणः ॥४॥
का एक लघु, तीसरा भेद द्विलघु इत्यादि होता है । इस प्रकार एकद्वयादि-लगक्रिया जाननी चाहिए । लगक्रिया के अंकों को जोड़ देने से उस छन्द के प्रस्तार की पूरी संख्या ज्ञात हो जाती है । यही संख्यान प्रत्यय कहलाता है । अथवा उद्दिष्ट पर दिये हुए अंकों को जोड़कर उसमें एक का योग कर दिया जाय तो वह भी प्रस्तार की पूरी संख्या को प्रकट कर देता है । छन्द के प्रस्तार को अंकित करने के लिए जो स्थान का नियमन किया जाता है, उसे अध्वयोग प्रत्यय कहते हैं । प्रस्तार की जो संख्या है, उसे दूना करके एक घटा देने से जो अंक आता है, उतने ही अंगुल का उसके प्रस्तार के लिए अध्वा या स्थान कहा गया है ॥१७-२०॥ मुने ! यह छन्दों का किंचित् लक्षण बताया गया है । प्रस्तार द्वारा प्रतिपादित होने वाले उनके भेद-प्रभेदों की संख्या अनन्त है, ॥२१॥ श्री नारदीय पुराण के पूर्व भाग के द्वितीय पाद में संक्षिप्त छन्दोवर्णन नामक सत्तावनवाँ अध्याय समाप्त ॥५७॥
अध्याय ५८ शुक का इतिहास निरूपण नारद बोले—आपके श्रीमुख से मैंने षडंग वेदों के अध्ययन प्रसङ्ग में सम्पूर्ण वेदांगों को संक्षेप और विस्तार रूप से सुन लिया । अब हे महामते ! कृपा कर शुक-जन्म कथा को विस्तारपूर्वक कहिए ॥१३॥ सनन्दन ने कहा—प्राचीन काल में कर्णिकार (कनेर) वन से आच्छादित विस्तृत मेरु शृंग पर महादेव शंकर अपने भूमि-वासी भूत गणों के साथ वन विहार कर रहे थे । उसी स्थान पर उससे पूर्व समय में देवी हिम- गिरि कन्या भी हुई थीं ॥२-३॥ मुनिसत्तम ! प्रभु कृष्ण द्वैपायन ने योग धर्म की साधना में निरत होकर योग द्वारा आत्मा में मनोनिरोध कर उसी वन में पुत्र की कामना से तपस्या प्रारम्भ की । उनके मन में यही संकल्प था
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५१२ नारदीयपुराणम् धारयन्स तपस्तेपे पुत्रार्थं मुनिसत्तमः । अग्नेर्भूमेस्तथा वायोरंतरिक्षस्य चाभितः ॥५॥ वीर्येण संमतः पुत्रो मम भूयादिति स्म ह । संकल्पेनाथ सोऽनेन दुष्प्रापमकृतात्मभिः ॥६॥ वरयामास देवेशमास्थितस्तप उत्तमम् । अतिष्ठन्मारुताहारः शतं किल समाः प्रभुः ॥७॥ आराधयन्महादेवं बहुरूपमुमापतिम् । तत्र ब्रह्मर्षयश्चैव सर्वे देवर्षयस्तथा ॥८॥ लोकपालाश्च साध्याश्च वसुभिश्चाष्टभिः सह । आदित्याश्चैव रुद्राश्च दिवाकरनिशाकरौ ॥६॥ विश्वावसुश्च गंधर्वः सिद्धाश्चाप्सरसां गणः । तत्र रुद्रो महादेवः कर्णिकारमयीं शुभाम् ॥१०॥ धारयानः स्रजं भाति शरदीव निशाकरः । तस्मिन् दिव्ये वने रम्ये देवदेवर्षिसंकुले ॥११॥ आस्थितः परमं योगं व्यासः पुत्रार्थमुद्यतः । न चास्य हीयते वर्णो न ग्लानिरुपजायते ॥१२॥ त्रयाणामपि लोकानां तदद्भुतमिवाभवत् । जटाश्च तेजसा तस्य वैश्वानरशिखोपमाः ॥१३॥ प्रज्वलंत्यः स्म दृश्यंते युक्तस्यामिततेजसः । एवं विधेन तपसा तस्य भक्त्या च नारद ॥१४॥ महेश्वरः प्रसन्नात्मा चकार मनसा मतिम् । उवाच चैनं भगवांस्त्र्यंबकः प्रहसन्निव ॥१५॥ यथा ह्यग्निर्यथा वायुर्यथा भूमियंथा जलम् । यथा खं च तथा शुद्धो भविष्यति सुतस्तव ॥१६॥ तद्भावभागी तद्बुद्धिस्तदात्मा तदुपाश्रयः । तेजसा तस्य लोकांस्त्रीन्यशः प्राप्स्यति केवलम् ॥१७॥ एवं लब्ध्वा वरं देवो व्यासः सत्यवतीसुतः । अरणिं त्वथ संगृह्य ममंथाग्निचिकीर्षया ॥१८॥ अथ रूपं परं विप्र बिभ्रतीं स्वेन तेजसा । घृताचीं नामाप्सरसं ददर्श भगवानृषिः ॥१९॥ कि उनको अग्नि, वायु, आकाश और वायु के तेज से युक्त एक पुत्र हो ॥४-५½॥ इस दृढ़ संकल्प से उन्होंने देवेश की आराधना प्रारम्भ की और ऐसी उत्तम तपस्या को प्रारम्भ किया जो अजितेन्द्रिय साधकों के लिये सर्वथा दुष्प्राप्य था । पहले उस प्रभु व्यास ने उमापति बहुरूप धारी महादेव की आराधना करते हुए सौ वर्षों तक केवल वायु पान करके जीवन रक्षा की ॥६-७½॥ उस मेरु श्रृंग पर सब ब्रह्मर्षि, देवर्षि, लोकपाल, अष्ट वसुओं के सहित साध्य गण, आदित्य, रुद्र, दिवाकर, चन्द्रमा, विश्वावसु, गन्धर्व, सिद्ध और अप्सरःसमूह रहते थे ॥८-९½॥ वहीं कर्णिकार की बनी शुभ माला को धारण किये हुए शंकर जी शरद् पूर्णिमा के चन्द्रमा की भांति सुशोभित हो रहे थे ॥१०½॥ उस देव और देवर्षियों से संकुल रम्य दिव्य वन में पुत्र प्राप्ति की कामना से व्यास जी दृढ़तापूर्वक परम योग की साधना करने लगे । परन्तु तपस्या करते समय न तो उनकी शरीर कान्ति ही क्षीण हुई और न तो मुख पर कोई ग्लानि की या श्रान्ति की रेखा ही देख पड़ी ॥११-१२॥ यह त्रिलोक के लिए एक आश्चर्यजनक घटना सी हुई; क्योंकि तपस्याकाल में क्लान्ति की अपेक्षा उनकी जटाओं में अग्नि की लपटों के समान एक विशेष प्रकार की आभा आ गई और अमित तेजस्वी उस योगी की वे जटायें अग्नि-ज्वाला के समान जलती हुई सी दिखाई देती थीं । नारद ! उनको इस प्रकार की तपस्या और भक्ति से महेश्वर प्रसन्न हो गये और उनको वरदान देने की इच्छा की । तब हँसते हुए भगवान् त्रिनेत्र ने व्यास से कहा ॥१३-१५॥ जिस प्रकार अग्नि, वायु, भूमि, जल और आकाश शुद्ध हैं उसी प्रकार तुमको शुद्ध और तेजस्वी पुत्र होगा ॥१६॥ उन्हीं के भावों से युक्त, उन्हीं की बुद्धि वाला, उन्हो का स्वरूप और उन्हीं का उपाश्रय होगा । उसके तेज से तीनों लोकों में उसका यश फैलेगा ॥१७॥ इस प्रकार का वर प्राप्त कर सत्यवती-सुत व्यास ने अरणि को इकट्ठा किया और अग्नि उत्पन्न करने की इच्छा से उसका मन्थन किया ॥१८॥ अरणि मन्थन के अनन्तर ही भगवान् ऋषि ने अपने तेज और रूप से अलौकिक सुन्दरी घृताची नामक अप्सरा को देखा ॥१९॥ मुनीश्वर ! उस वन में
अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ५१३ स तामप्सरसं दृष्ट्वा सहसा काममोहितः । अभवद्भगवान्व्यासो वने तस्मिन्मुनीश्वर ॥२०॥ सा तु कृत्वा तदा व्यासं कामसंविग्नमानसम् । शुकीभूया महारम्या घृताची समुपागमत् ॥२१॥ स तामप्सरसं दृष्ट्वा रूपेणान्येन संवृताम् । स्मरराजेनानुगतः सर्वगात्रातिगेन ह ॥२२॥ स तु धैर्येण महता निगृह्णन् हृच्छयं मुनिः । न शशाक नियंतुं तं व्यासः प्रविसृतं मनः ॥२३॥ भावित्वाच्चैव भाव्यस्य घृताच्या वपुषाहृतम् । यत्नान्नियच्छतश्चापि मुने एतच्चिकीर्षया ॥२४॥ अरण्यामेव सहसा तस्य शुक्रमवापतत् । शुक्रं निर्मथ्यमानेऽस्यां शुक्नो जज्ञे महातपाः ॥२५॥ परमर्षिर्महायोमी अरणीगर्भसंभवः । यथैव हि समिद्धोऽग्निर्भाति हव्यमुपात्तवान् ॥२६॥ तथा रूपः शुको जज्ञे प्रज्वलन्निव तेजसा । बिभ्रच्चित्रं च विप्रेंद्र रूपवर्णमनुत्तमम् ॥२७॥ तं गंगां सरितां श्रेष्ठां मेरुपृष्ठे स्वरूषिणीम् । अभ्येत्य स्नापयामास वारिणा स्वेन नारद ॥२८॥ कृष्णाजिनं चांतरिक्षाच्छुकार्थं भुव्यवापतत् । जेगीयंते च गंधर्वा ननृतुश्चाप्सरोगणाः ॥२८॥ देवदुन्दुभयश्चैव प्रावाद्यंत महास्वनाः । विश्वावसुश्च गंधर्वस्तथा तुंबुरुनारदौ ॥३०॥ हाहाहूहूश्च गंधर्वो तुष्टुवुः शुकसंभवम् । तत्र शक्रपुरोगाश्च लोकपालाः समागताः ॥३१॥ देवा देवर्षयश्चैव तथा ब्रह्मर्षयोऽपि च । दिव्यानि सर्वपुष्पाणि प्रववर्ष च मारुतः ॥३२॥ जंगमं स्थावरं चैव प्रहृष्टमभवज्जगत् । तं महात्मा स्वयं प्रीत्या देव्या सह महाद्युतिः ॥३३॥ उस अप्सरा को देखकर भगवान् व्यास काममोहित हो गए ॥२०॥ वह अप्सरा मुनि व्यास को कामातुर बना कर स्वयं अति सुन्दरी शुकी बनकर उनके पास आई ॥२१॥ वे ऋषि शुकी रूप में आई हुई उस अप्सरा को देखकर सब अंगों को व्यथित कर देने वाले कामदेव के वश में हो जाने से मह्यन्त धैर्यपूर्वक काम को वश में करने का प्रयत्न करने पर भी अपने कामातुर मन को वश में न कर सके ॥२२-२३॥ भावी की प्रबलता से घृताची के रूप सौन्दर्य से आकृष्ट उस मुनि ने यत्न पूर्वक मन को वश में करने का प्रयत्न किया परन्तु तो भी काम प्रेरणा से आतुर होने के कारण उस अरणि पर ही उनका वीर्य गिर पड़ा । उस अरणि मन्थन से मुनि का शुक्र भी मथ उठा जिससे उस अरणि में ही अरणि गर्भ से एक महायोगी शुक नामक परम ऋषि उत्पन्न हुआ । जिस प्रकार हविष्य को पाकर अग्नि प्रज्वलित हो उठती है उसी प्रकार अपने तेज से जलता हुआ वह शुक उस अरणि से उत्पन्न हुआ । विप्रन्द्र ! उस समय उस तेजस्वी बालक का रूप अलौकिक और आश्चर्यचकित करने वाला था ॥२४-२७॥ नारद ! उस बालक को मेरुपृष्ठ पर बहने वाली सरित्श्रेष्ठ गंगा नदी के पास जो कि घृताची का ही रूप है—ले गईं और अपने जल से उस तेजस्वी बालक को नहलाया ॥२८॥ उस समय आकाश से शुक के लिए कृष्ण मृगचर्म अनायास पृथ्वी पर गिर पड़ा, गन्धर्व प्रसन्न होकर मंगल गान करने लगे, अप्सरायें नाचने लगीं ॥२९॥ और देव,-दुन्दुभियों के गम्भीर घोष से आकाश गूंज उठा, । गन्धर्व, विश्वावसु तुंबुरु, नारद और गन्धर्व हाहा हूहू ने शुक देव जी की स्तुति की ॥३०-१/२॥ उस समय इन्द्र आदि लोकपाल, देव, देवर्षि और ब्रह्मर्षिगण भी वहां उपस्थित हो गए । वायु देव ने प्रसन्नता व्यक्त करने के लिए सब प्रकार के देव पुष्पों की वर्षा की ॥३१- ३२॥ सारा स्थावर जंगमात्मक संसार शुक जन्म से आनन्द-मग्न हो गया । महातेजस्वी महात्मा शंकर ने देवी पार्वती के साथ स्वयं उस सद्योजात मुनिकुमार का विधिवत् उपनयन किया ॥३३-१/२॥ देवेश्वर इन्द्र ने उस कुमार को दिव्य और अद्भुत कमण्डलु दिया, देवताओं ने प्रेमपूर्वक वस्त्र दिये । नारद ! हंस, शतपत्र, सारस, ६५ ना० पु०
५१४ नारदीयपुराणम् जातमात्रं मुनेः पुत्रं विधिनोपानयत्तदा । तस्य देवेश्वरः शक्रो दिव्यमद्भुतदर्शनम् ॥३४॥ ददौ कमंडलुं प्रीत्या देवा वासांसि चाभितः । हंसाश्च शतपत्राश्च सारसाश्च सहस्रशः ॥३५॥ प्रदक्षिणमवर्तंत शुकाश्र्चाषाश्च नारद । आरणेयस्तदा दिव्यं प्राप्य जन्म महामतिः ॥३६॥ तत्रैवोवास मेधावी व्रतचारी समाहितः । उत्पन्नमात्रं तं वेदाः सरहस्याः ससंग्रहाः ॥३७॥ उपतस्थुर्मु निश्रेष्ठं यथास्य पितरं तथा । बृहस्पति स वव्रे च वेदवेदांगभाष्यवित् ॥३८॥ उपाध्यायं द्विजश्रेष्ठ धर्ममेवानुचिंतयन् । सोऽधीत्य वेदानखिलान्सरहस्यान्ससंग्रहान् ॥३६॥ इतिहासंच कात्स्न्येन वेदशास्त्राणि चाभितः । गुरवे दक्षिणां दत्वा समावृत्तो महामुनिः ॥४०॥ उग्रं तपः समारेभे ब्रह्मचारी समाहितः । देवतानामृषीणां च बाल्येऽपि सुमहातपाः ॥४१॥ संमंत्रणीयो जन्यश्च ज्ञानेन तपसा तथा । न त्वस्य रमते बुद्धिरश्रामेषु मुनीश्वर ॥४२॥ त्रिषु गार्हस्थ्यमूलेषु मोक्षधर्मानुदर्शिनः । स मोक्षममुचिन्तयैव शुकः पितरमभ्यगात् ॥४३॥ प्राहाभिवाद्य च तदा श्रेयोऽर्थी विनयान्वितः । मोक्षधर्मेषु कुशलो भगवान् प्रब्रवीतु मे ॥४४॥ यथैव मनसः शांतिः परमा संभवेन्मुने । श्रुत्वा पुत्रस्य वचनं परमर्षिरुवाच तम् ॥४५॥ अधीष्व मोक्षशास्त्रं वै धर्मांश्च विविधानपि । पितुर्निर्देशाज्जग्राह शुको ब्रह्मविदां वरः ॥४६॥ योगशास्त्रं च निखिलं कापिलं चैव नारद । शतब्राह्मयाम् श्रिया युक्तं ब्रह्मतुल्यपराक्रमम् ॥४७॥ मेने पुत्रं यथा व्यासो मोक्षशास्त्रविशारदम् । उवाच गच्छेति तदा जनकं मिथिलेश्वरम् ॥४८॥
सुग्गे और नीलकण्ठ आदि पक्षियों ने हजारों प्रदक्षिणायें कीं । उस समय अरण से उत्पन्न वह मेधावी महा मुनि इस प्रकार लोकोत्तर जन्म प्राप्त कर उस स्थान पर एकाग्रमन होकर ब्रह्मचर्यपूर्वक रहने लगा ।।३४-३६।। उत्पन्न होते ही उस मुनिकुमार के पास रहस्य और संग्रह के सहित सम्पूर्ण वेद उपस्थित हो गए जैसे कि उसके पिता व्यास मुनि के पास आए थे ।।३७।। द्विजश्रेष्ठ ! वेद, वेदांग और भाष्यों के ज्ञाता उस मुनि-पुत्र ने केवल धर्म पालन के ही विचार से बृहस्पति को अपने उपाध्याय के रूप में वरण किया ।।३८।। थोड़े ही समय में उस महामुनि ने सम्पूर्ण रहस्य और संग्रह ग्रन्थों के सहित वेदों, सम्पूर्ण इतिहास और सांगोपांग वेद शास्त्रों का अध्ययन कर लिया । पश्चात् गुरु को दक्षिणा देकर वह गुरु आश्रम से लौट आया ।।४०।। तदनन्तर उस महातपस्वी ब्रह्मचारी ने बाल्यकाल में ही उग्र तपस्या को प्रारम्भ किया । वह अपनी तपस्या तथा ज्ञान के प्रभाव से देवता और ऋषियों का भी मन्त्रदाता और उपदेशक बन गया ।।४१।। मुनीश्वर ! मोक्ष धर्म के जिज्ञासु उस महातपस्वी शुक का मन आश्रमों के क्रमिक पालन में नहीं लगता था । ।४२।। इसलिए मोक्ष प्राप्ति का विचार कर उन्होंने अपने पिता व्यास से पूछा । पहले श्रेयस्काम उस मुनिपुत्र ने विनम्र भाव से पिता का अभिवादन किया और फिर कहा ।।४३।। आप मोक्ष धर्म के कुशल विद्वान् हैं, अतः कृपा कर आप ऐसे ज्ञान का उपदेश करें जिससे मेरे मन को परम शान्ति प्राप्त हो । पुत्र की बातों को सुनकर परम ऋषि व्यास जी ने कहा--'तुम मोक्ष शास्त्र और विविध धर्मों का अध्ययन करो' ।।४४-४५।। नारद ! पिता की आज्ञा पाकर ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठ शुक ने सम्पूर्ण, योगशास्त्र और सांख्य का अध्ययन किया । जब व्यास ने जान लिया कि अब मेरा पुत्र ब्रह्म के समान पराक्रमी, शत ब्राह्मी श्री से युक्त और मोक्ष शास्त्र का पारंगत विद्वान् हो गया है तब कहा कि पुत्र ! तुम मिथिलापति जनक के पास जाओ, वह मिथिलेश्वर तुमको भलीभांति मोक्ष धर्म का उपदेश देगा । ।।४३-४८।। पिता के आदेशानुसार धर्म की निष्ठा और मोक्ष के
अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ५१५ स ते वक्ष्यति मोक्षार्थं निखिलेन नराधिपः । पितुर्नियोगाद्गमज्जनकं मैथिलं नृपम् ॥४६॥ प्रष्टुं धर्मस्य निष्ठां वै मोक्षस्य च परायणम् । उक्तश्च मानुषेण त्वं तथा गच्छेत्यविस्मितः ॥५०॥ न प्रभावेण गन्तव्यमंतरिक्षचरेण वै । आर्जवेनैव गंतव्यं न सुखाय क्षणात्त्वया ॥५१॥ न द्रष्टव्या विशेषा हि विशेषा हि प्रसंगिनः । अहंकारो न कर्तव्यो याज्ये तस्मिन्नराधिपे ॥५२॥ स्थातव्यं वसथे तस्य स ते छेत्स्यति संशयम् । स धर्मकुशलो राजा मोक्षशास्त्रविशारदः ॥५३॥ यथा यथा च ते संयात्तत्कार्यमविशंकया । एवमुक्तः स धर्मात्मा जगाम मिथिलां मुनिः ॥५४॥ पद्भ्यां शक्तोऽंतरिक्षेण क्रांतुं भूमिं ससागराम् । सगिरींश्चाप्यतिक्रम्य भारतं वर्षमासदत् ॥५५॥ स देशान्विविधान्स्फीतानतिक्रम्य महामुनिः । विदेहान्वै समासाद्य जनकेन समागमत् ॥५६॥ राजद्वारं समासाद्य द्वारपालैर्निवारितः । तस्थौ तत्र महायोगी क्षुत्पिपासादिवर्जितः ॥५७॥ आतपे ग्लानिरहितो ध्यानयुक्तश्च नारद । तेषां तु द्वारपालानामेकस्तत्र व्यवस्थितः ॥५८॥ मध्यंगतमिवादित्यं दृष्ट्वा शुकमवस्थितम् । पूजयित्वा यथान्यायमभिवाद्य कृताञ्जलिः ॥५६॥ प्रावेशयत्ततः कक्षं द्वितीयां राजवेश्मनः । तत्रांतः पुरसंबद्धं महच्चैत्ररथोेपमम् ॥६०॥ सुविभक्तजलाक्रीडं रम्यं पुष्पितपादपम् । दर्शयित्वासने स्थाप्य राजानं च व्यजिज्ञपत् ॥६१॥ श्रुत्वा राजा शुकं प्राप्तं वारस्त्रीः स न्ययुंक्त च । सेवार्थं तस्य भावस्य ज्ञानाय मुनिसत्तम ॥६२॥ तं चारुकेश्यः शुभ्रोण्यस्तरुण्यः प्रियदर्शनाः । सूक्ष्मरक्तांबरधरास्तप्तकांचनभूषणाः ॥६३॥
परम तत्त्व को पूछने के लिए वह मैथिल नृप की राजधानी की ओर चल पड़ा । जाते समय व्यास जी ने कहा कि तुम वहाँ साधारण मनुष्य की भाँति इस प्रकार जाना कि तुमको किसी प्रकार का विस्मय न हो, अपने अलौकिक प्रभाव के द्वारा या आकाशचारी बन कर न जाना । अत्यन्त विनीत होकर अपने क्षणिक सुख की भावना का सर्वथा त्याग कर वहाँ जाना ॥४९-५१॥ किन्हीं विशेष बातों की ओर ध्यान न देना क्योंकि प्रसंग या प्रमादवश कुछ विशेष (अरुचिकर) घटनायें हो जाती हैं । उस यज्ञ कराने योग्य नृपति के प्रति किसी प्रकार का अहंकार भाव मत दिखलाना ॥५२॥ उसी राजा के भवन में ठहरना । वह मोक्ष शास्त्र का ज्ञाता, धर्मकुशल राजा तुम्हारे सन्देहों को अवश्य दूर कर देगा ॥५३॥ जो जो आज्ञायें तुमको दे उनका बिना किसी हिचकिचाहट के पालन करना । व्यास जी के उपयुक्त उपदेशों को सुन कर उस मुनि ने मिथिलापुरी की ओर प्रस्थान किया ॥५४॥ यद्यपि इस ससागरा पृथ्वी को वे मुनि आकाश मार्ग से तय कर सकते थे परन्तु वे पैदल ही पर्वतों, नदियों को पार करते हुए भारतवर्ष में आये ॥५५॥ और भारतवर्ष के विविध पवित्र देशों को पार कर विदेहों के देश में आकर जनक से मिले ॥५६॥ पहले तो राज द्वार पर द्वारपालों ने उनको रोका जिससे कि भूख प्यास की कुछ भी चिन्ता न कर वह महायोगी वहीं पर धूप में किसी प्रकार की ग्लानि न कर ध्यानस्थ होकर बैठ गया । उन द्वारपालों में से एक ने दोपहर के सूर्य की भाँति तेजस्वी शुक को वहाँ बैठा देखकर विधिवत् उनकी पूजा की फिर वह हाथ जोड़कर अभिवादन करके उनको राज भवन के द्वितीय कक्ष में ले गया ॥५७-५९½॥ वहाँ अन्तःपुर से सटे हुए चैत्ररथ वन के समान मनोहर, अनेकों खिले हुए फूलों से लदे हुए पोधों से युक्त, गृह वाटिका को, जिसमें अनेक अलग-अलग जल क्रीड़ा करने के लिए जलाशय बने हुए थे, दिखाया और वहीं एक आसन पर बैठा कर राजा से उनके आगमन के विषय में निवेदन किया ॥६०-६१॥ मुनिश्रेष्ठ राजा ने शुक का आगमन सुनकर उनकी आन्तरिक भावनाओं की परीक्षा के लिए वार स्त्रियों को उनकी सेवा के लिये नियुक्त किया ॥६२॥ अनेकों चारु केश और मनोहर नितम्ब वाली सुन्दरौ पचास तरुणियों ने, जो सूक्ष्म रक्ताम्बर और चमकीले सुवर्ण के
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५१६ नारदीयपुराणम् संलापालापकुशला भावज्ञाः सर्वकोविदाः । परं पंचाशतस्तस्य पाद्यादीनि व्यकल्पयन् ॥६४॥ देशकालोपपन्नेन साध्वन्नेनाप्यतर्पयन् । तस्य भुक्तवतस्तात तास्ततः पुरकाननम् ॥६५॥ सुरम्यं दर्शयामासुरेकैकत्वेन नारद । क्रीडंत्यश्च हसंत्यश्च गायंत्यश्चैव ताः शुकम् ॥६६॥ उदारसत्त्वं सत्त्वज्ञास्सर्वाः पर्य्यचरंस्तदा । आरणेयस्तु शुद्धात्मा जितक्रोधो जितेंद्रियः ॥६७॥ ध्यानस्थ एव सततं न हृष्यति न कुप्यति । पादशौचं तु कृत्वा वै शुकः संध्यामुपास्य च ॥६८॥ निषसादासने पुण्ये तमेवार्थं व्यचिंतयत् । पूर्वरात्रे तु तत्रासौ भूत्वा ध्यानपरायणः ॥६६॥ मध्यरात्रे यथान्याय्यं निद्रामाहारयत्प्रभुः । ततः प्रातः समुत्थाय कृत्वा शौचमनंतरम् ॥७०॥ स्त्रीभिः परिवृतो धीमान्ध्यानमेवान्वपद्यत । अनेन विधिना तत्र तदहः शेषमप्युत ॥७१॥ तां च रात्रिं नृपकुले वर्तयामास नारद ॥७२॥ इति श्रीबृहन्नारदी०पूर्वभागे बृहदुपाख्याने द्वितीयभागे शुकप्रलोभनं नामाष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥५८॥
आभूषणों से सजी-धजी थीं, जो सब नारी-भावों को कुशल पंडिता, प्रत्येक प्रकार के आलाप में चतुर एवं सब प्रकार की श्रृङ्गार कला में पारंगत थीं, उस मुनि का पाद्य आदि के द्वारा सत्कार किया ॥६३-६४॥ फिर देशकाला- नुकूल मधुर अन्न को भोजन के लिए सामने रखा । जब मुनि कुमार शुक भोजन से तृप्त हो गये तब उन तरुणियों ने क्रमशः नगर के एक-एक रम्य उपवन को दिखाया ॥६५ १/२॥ उन सब सुन्दरियों ने अपनी मधुर हंसी, मनोहर कामक्रीड़ा और मादक गीतों से उस उदारचेता की परिचर्या की परन्तु उस जितेन्द्रिय, क्षमाशील, शुद्धात्मा अरणि- कुमार का ध्यान भंग नहीं हुआ और उसके हृदय में किसी प्रकार का हर्ष या क्रोध नहीं उत्पन्न हुआ ॥६६-६७ १/२॥ सायंकाल शुकदेव ने पादप्रक्षालन आदि नित्य कृत्यों से निवृत्त होकर संध्योपासन किया और पवित्र आसन पर आसीन होकर अपने मोक्षतत्त्व का चिन्तन किया । इस प्रकार रात के पहले पहर में वे ध्यान लगाये बैठे रहे । दूसरे और तीसरे पहर भगवान् शुक ने न्यायपूर्वक निद्रा को स्वीकार किया ॥६८-६९ १/२॥ फिर प्रातःकाल उठकर शौचादि से निवृत्त होकर स्त्रियों से घिरे रहने पर भी वह महात्मा ध्यान-साधना में ही लीन रहा ॥७० १/२॥ उस राजभवन में इस विधि से योगी शुक ने दिन को बिता दिया और रात भी राज परिवार में रहकर ही बिताई ॥७१-७२॥ श्री नारदीय महापुराण के द्वितीय भाग में शुक-प्रलोभन नामक अट्ठावनवां अध्याय समाप्त ॥५८॥
अथैकोनषष्टितमोऽध्यायः सनंदन उवाच ततः स राजा सहितो मन्त्रिभिर्द्विजसत्तम । पुरः पुरोहितं कृत्वा सर्वाण्यंतःपुराणि च ॥१॥ शिरसा चार्घ्यमादाय गुरुपुत्रं समभ्यगात् । महदासनमादाय सर्वरत्नविभूषितम् ॥२॥ प्रददौ गुरुपुत्राय शुकाय परमोचितम् । तत्रोपविष्टं तं कार्ष्णं शास्त्रदृष्टेन कर्मणा ॥३॥ पाद्यं निवेद्य प्रथमं सार्घ्यं तां च न्यवेदयत् । स च तां मंत्रतः पूजां प्रतिगृह्य द्विजोत्तमः ॥४॥ पर्यपृच्छन्महातेजाराज्ञः कुशलमव्ययम् । उदारसत्त्वाभिजानो राजापि गुरुसूनवे ॥५॥ आवेद्य कुशलं भूमौ निषसाद तदाज्ञया । सोऽपि वैयासकिं भूयः पृष्ट्वा कुशलमव्ययम् किमागमनमित्येव पर्यपृच्छद्विधानवित् ॥६॥ शुक उवाच पिताहमुक्तो भद्रं ते मोक्षधर्मार्थकोविदः । विदेहराजोह्याद्यो मे जनको नाम विश्रुतः ॥७॥ तत्र त्वं गच्छ तूर्णं वै स ते हृदयसंशयम् । प्रवृत्तौ च निवृत्तौ सर्वं छेत्स्यत्यसंशयम् ॥८॥ सोऽहं पितुर्नियोगात्वामुपप्रष्टुमिहागतः । तन्मे धर्मभृतां श्रेष्ठ यथावद्वक्तुमर्हसि ॥६॥ किं कार्यं ब्राह्मणेनेह मोक्षार्थश्च किमात्मकः । कथं च मोक्षः कर्तव्यो ज्ञानेन तपसापि वा ॥१०॥ अध्याय ५६ अध्यात्मतत्त्व का निरूपण सनन्दन बोले-द्विजवर्य ! इतनी परीक्षा के बाद राजा मन्त्रियों के सहित पुरोहित और अपनी रानी एवं दासियों को आगे कर विनीत भाव से अर्घ्यपात्र लेकर गुरुपुत्र शुक के समीप आये और उन्होंने सब रत्नों से जड़े हुए उपयुक्त बहुमूल्य आसन गुरु-पुत्र शुक को अर्पित किया ॥१-२१/२॥ जब व्यासपुत्र आसनस्थ हो गए तब मिथिलाधीश ने शास्त्र विधि से उनको पाद्य और अर्घ्य आदि प्रदान कर गो-दान दिया ॥३१/२॥ उस महातेजस्वी द्विजवर ने भी मन्त्रपाठपूर्वक उस सत्कार को स्वीकार किया और राजा से कुशल-मंगल पूछा । उदार हृदय राजा भी गुरु-पुत्र से अपना सारा कुशल समाचार कहकर उनकी आज्ञा से पृथ्वी पर बैठ गया । उस विधिज्ञ राजा ने भी व्यास-पुत्र शुक से कुशल वार्ता पूछने के बाद पूछा कि आपने किस लिए यहाँ तक आने का कष्ट किया है ॥४-६॥ शुक ने कहा-पिताजी ने मुझसे कहा कि तुम्हारा कल्याण इसी में है कि तुम शीघ्र धर्म, अर्थ और मोक्ष के ज्ञाता जनक के समीप जाओ, जो मेरे प्रथम शिष्य हैं । वे ही तुम्हारे सब सन्देहों को दूर कर देगें । निश्चय ही वे तुम्हारे प्रवृत्ति और निवृत्ति विषयक सन्देहों को दूर कर देगें ॥७-८॥ इसी लिए मैं पिता की आज्ञा से आपके समीप अपनी शंकाओं को मिटाने के लिए आया हूँ। इसलिए हे धार्मिकों में श्रेष्ठ ! आप भली भाँति मुझे बतायें कि ब्राह्मणों को क्या करना चाहिए, मोक्ष का अभिप्राय क्या है, मोक्ष की प्राप्ति ज्ञान या तपस्या किससे होगी ? ॥६-१०॥
५१८ नारदीयपुराणम् जनक उवाच यत्कार्यं ब्राह्मणेनेह जन्मप्रभृति तच्छृणु । कृतोपनयनस्तात भवेद्वेदपरायणः ॥११॥ तपसा गुरुवृत्त्या च ब्रह्मचर्येण चान्वितः । देवतानां पितॄणां च ह्यतृष्णश्चानसूयकः ॥१२॥ वेदानधीत्य नियतो दक्षिणामपवर्त्य च । अभ्यनुज्ञामनुप्राप्य समावर्तेत वै द्विजः ॥१३॥ समावृत्तस्तु गार्हस्थ्ये सदारो नियतो वसेत् । अनसूयुर्यथान्यायमाहिताग्निरनादृते ॥१४॥ उत्पाद्य पुत्रपौत्रांश्च वन्याश्रमपदे वसेत् । तानेवाग्नीन्यथान्यायं पूजयन्नतिथिप्रियः ॥१५॥ सर्वानग्नीन्यथान्यायमात्मन्यारोप्य धर्मवित् । निर्द्वन्द्वो वीतरागात्मा ब्रह्मा श्रमपदे वसेत् ॥१६॥ शुक उवाच उत्पन्ने ज्ञानविज्ञाने प्रत्यक्षे हृदि शाश्वते । न विना गुरुसंवासाज्ज्ञानस्याधिगमः स्मृतः ॥१७॥ किमवश्यं तु वस्तव्यमाश्रमेषु न वा नृप । एतद्भवंतं पृच्छामि तद्भवान्वक्तुमर्हति ॥१८॥ जनक उवाच न विना ज्ञानविज्ञाने मोक्षस्याधिगमो भवेत् विना गुरुसंबांधाज्ज्ञानस्याधिगमस्तथा ॥१९॥ आचार्यः प्लाविता तस्य ज्ञानं प्लव इहोच्यते । विज्ञाय कृतकृत्यस्तु तोर्णस्तत्रोभयं त्यजेत् ॥२०॥ अनुच्छेदाय लोकानामनुच्छेदाय कर्मणाम् । कृत्वा शुभाशुभं कर्म मोक्षो नामेह लभ्यते ॥२१॥ जनक बोले- जन्म से ब्राह्मणों को जो कुछ करना चाहिए उसको सुनो । तात ! जब ब्राह्मणपुत्र का उपनयन- संस्कार हो जाय उसी दिन से वेदाध्ययन प्रारम्भ कर दे ॥११॥ अध्ययन के समय वह ब्रह्मचर्य का पालन करे और तपस्या तथा गुरु सेवा में लगा रहे । तृष्णा से विमुख हो, देवता और पितरों की कभी निन्दा न करे ॥१२॥ जब नियमित रूप से वेदों का अध्ययन कर ले तब गुरु को गुरुदक्षिणा देकर उनसे आज्ञा लेकर समावर्तन संस्कार करे ॥१३॥ समावर्तन संस्कार के बाद नियम पूर्वक विवाह करके स्त्री सहित गृहस्थाश्रम का पालन करे । इस आश्रम में रहकर वह किसी की निन्दा न करे और विधिपूर्वक अग्नि की स्थापना करके प्रतिदिन आदरपूर्वक अग्नि होम करे । पुत्र और पौत्रों को उत्पन्न करने के अनन्तर अरण्य-आश्रम (वानप्रस्थ) को अपनाये । उस आश्रम में वह भी प्रेमपूर्वक अतिथियों की पूजा करे ॥१४-१५॥ और यथाशास्त्र अग्न्याधान करे अथवा धर्मज्ञ वह वानप्रस्थाश्रमी आत्मा में ही शास्त्रानुसार अग्नि लीन करके द्वन्द्वातीतः और वीतराग होकर ब्रह्मा श्रम में प्रवेश करे ॥१६॥ शुक बोले--राजन् ! बिना गुरु के ज्ञान का होना नहीं कहा गया है । तो यदि किसी को बिना गुरु के ही हृदय में नित्य ज्ञानविज्ञान की प्रत्यक्षानुभूति हो जाय तो भी उसके लिए क्या शेष तीन आश्रमों में रहना आवश्यक है ? इस शंका को पूछ रहा हूँ, इसका समाधान आप कर दें ॥१७-१८॥ जनक ने कहा--बिना ज्ञान-विज्ञान के मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती और गुरु के बिना ज्ञान-प्राप्ति भी दुर्लभ ही है ॥१९॥ आचार्य ही इस संसार-सागर से पार लगाने वाला है और ज्ञान ही नौका है । ज्ञान की प्राप्ति हो जाने पर मनुष्य कृतकृत्य एवं पवित्र हो जाता है तब वह शुभ-अशुभ दोनों प्रकार के कर्मों का त्याग कर दे ॥२०॥ लोक और कर्म का उच्छेद न हो जाय, इसलिए पहले शुभाशुभ कर्म करके तब मोक्ष को प्राप्त करना चाहिए ।
एकोनषष्टितमोऽध्यायः ५१६ भावितैः कारणैश्चाथ बहुसंसारयोनिषु । आसादयति शुद्धात्मा मोक्षं हि प्रथमाश्रमे ॥२२॥ तमासाद्य तु मुक्तस्य दृष्टार्थस्य विपश्चितः । त्रिष्वाश्रमेषु कोन्वर्थो भवेत्परमभीप्सतः ॥२३॥ राजसांस्तामसांश्चैव नित्यं दोषान्विसर्जयेत् । सात्त्विकं मार्गमास्थाय पश्येदात्मानमात्मना ॥२४॥ सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । संपश्यन्नेव लिप्येत जले वारिचरो यथा ॥२५॥ पक्षीवत्पवनादूर्ध्वममुत्रानन्त्यमश्नुते । विहाय देहं निर्मुक्तो निर्द्वंद्वः शुभसंगतः ॥२६॥ अत्र गाथाः पुरा गीताः शृणु राज्ञा ययातिना । धार्यंते या द्विजैस्तात मोक्षशास्त्रविशारदैः ॥२७॥ ज्योतिश्चात्मनि नान्यत्र रत्नं तत्रैव चैव तत् । स्वयं च शक्यं तद्रष्टुं सुसमाहितचेतसा ॥२८॥ न बिभेति परो यस्मान्न बिभेति पराच्च यः । यश्च नेच्छति न द्वेष्टि ब्रह्म संपद्यते स तु ॥२६॥ यदा भावं न कुरुते सर्वभूतेषु पापकम् । पूर्वैराचरितो धर्मश्चतुराश्रमसंज्ञकः ॥३०॥ अनेन क्रमयोगेन बहुजातिसुकर्मणाम् । कर्मणा मनसा वाचा ब्रह्म संपद्यते तदा ॥३१॥ संयोज्य तपसात्मानमीर्ष्यामुत्सृज्य मोहिनीम् । त्यक्त्वा कामं च लोभं च ततो ब्रह्मत्वमश्नुते ॥३२॥ यदा श्राव्ये च दृश्ये च सर्वभूतेषु चाव्ययम् । समो भवति निर्द्वंद्वो ब्रह्म संपद्यते तदा ॥३३॥ यदा स्तुतिं च निंदां च समत्वेन च पश्यति । कांचनं चाऽयसं चैव सुखदुःखे तथैव च ॥३४॥ शीतमुष्णं तथैवार्थमनर्थं प्रियमप्रियम् । जीवितं मरणं चैव ब्रह्म संपद्यते तदा ॥३५॥ अनेक जन्मों से सत्कर्म करते-करते जब सम्पूर्ण इन्द्रियां पवित्र हो जाती हैं, तब शुद्ध अन्तःकरण वाला पुरुष प्रथम आश्रम में ही उत्तम मोक्ष रूप ज्ञान प्राप्त कर लेता है ॥२१-२२॥ उसे पाकर जब ब्रह्मचर्य आश्रम में तत्त्व का साक्षात्कार एवं मुक्ति सुलभ हो जाय तब परमात्मा को चाहने वाले जीवन्मुक्त विद्वान् के लिए शेष तीनों आश्रमों में जाने की क्या आवश्यकता है ? ॥२३॥ वह मुक्त पुरुष नित्य प्रति राजस और तामस दोषों का सर्वथा त्याग कर दें । और सात्विक मार्ग का अवलम्बन कर अन्तःकरण में ही आत्मा का दर्शन करे । सब प्राणियों- में आत्मभाव और अपने में ही सब प्राणियों को देखने वाला व्यक्ति इसी संसार में उसी प्रकार लिप्त नहीं होता जिस प्रकार जल में रहने वाला जलचर ॥२४-२५॥ वह व्यक्ति पक्षी के समान पवन मण्डल से ऊपर उठकर अत्यन्त सुख का अनुभव करता है । इस प्रकार वह मुक्त इस शरीर का त्याग कर द्वन्द्वातीव होकर शुभलोक में स्थान पाता है ॥२६॥ इस विषय में राजा ययाति ने प्राचीन काल में जिस गाथा को कहा है उसको कहता हूँ । सुनो ! इस गाथा को मोक्षशास्त्र के ज्ञाता द्विज अवश्य हृदय में धारण करते हैं ॥२७॥ आत्मा में ही ज्योति रहती है । क्योंकि जहाँ रत्न रहता है, वहीं ज्योति रहती है । उस आत्म-ज्योति का दर्शन एकाग्रचित्त होने पर स्वयं हो जाता है ॥२८॥ जिससे दूसरे नहीं डरते और जो दूसरों से स्वयं नहीं डरता, जो स्वयं कुछ इच्छा नहीं करता और न तो द्वेष ही करता है, और जो सब प्राणियों के प्रति पाप भावना नहीं रखता वही ब्रह्म पद प्राप्त करता है । पूर्व के आचार्यों ने भी चतुराश्रम धर्म का पालन किया है ॥२९-३०॥ इस प्रकार क्रमशः जो मन, वचन और कर्म से किसी भी प्राणी की बुराई नहीं करता, वही ब्रह्म पद प्राप्त करता है ॥३१॥ तपस्या में लीन होकर जब ज्ञानी भ्रम में डाल देने वाली ईर्ष्या, काम और लोभ को छोड़ देता है, तब वह ब्रह्म पद का भागी होता है ॥३२॥ जब दृष्टि में या श्रवण पथ में आने वाले पदार्थों और अखिल भूतों में स्थित अव्यय परमात्मा का दर्शन करने लगता है, और जब उस द्वन्द्वातीत की सर्वत्र सम बुद्धि हो जाती है तब वह ब्रह्म पद प्राप्त करता है ॥३३॥ जब स्तुति और निन्दा को साधक समभाव से देखता है, उसको सोना, और लोहा में भिन्नता नहीं दिखाई देती, सुख-दुख शीत-उष्ण; अर्थ-अनर्थ प्रिय-अप्रिय; जीवन और मरण में उसकी समान भावना हो जाती है, तब वह
५२० नारदीयपुराणम् प्रसार्येह यथांगानि कूर्मः संहरते पुनः । तथेंद्रियाणि मनसा संयंतव्यानि भिक्षुणा ॥३६॥ तमः परिगतं वेश्म यथा दीपेन दृश्यते । यथा बुद्धिप्रदीपेन शक्य आत्मा निरीक्षितुम् ॥३७॥ एतत्सर्वं प्रपश्यामि त्वयि बुद्धिमतांवर । यच्चान्यदपि वेत्तव्यं तत्त्वतो वेत्ति तद्भवान् ॥३८॥ ब्रह्मर्षे विदितश्चासि विषयांस्तमुपागतः । गुरोश्चैव प्रसादेन तव चैवोपशिक्षया ॥३६॥ तस्य चैव प्रसादेन प्रादुर्भूतं महामुनेः । ज्ञानं दिव्यं समादीप्तं तेनासि विदितो मम ॥४०॥ अधिकं तव विज्ञानमधिक्रावगतिस्तव । अधिकं च तवैश्वयं तच्च त्वं नावबुध्यसे ॥४१॥ बाल्याद्वा संशयाद्वापि भयाद्वापि विमोहजात् । उत्पन्ने चापि विज्ञाने नाविगच्छंति तां गतिम् ॥४२॥ व्यवसायेन शुद्धेन मद्धिधैश्छिन्नसंशयाः । विमुच्य हृदयग्रंथीनातिमासादयंति ताम् ॥४३॥ भवांश्चोत्पन्नविज्ञानः स्थिरबुद्धिरलोलुपः । व्यवसायादृते ब्रह्मान्नासादयति तत्पदम् ॥४४॥ नास्ति ते सुखदुःखेषु विशेषो नास्ति वस्तुषु । नौत्सुक्यं नृत्यगीतेषु न राग उपजायते ॥४५॥ न बंधुषु निबंधस्ते न भयेष्वस्ति ते भयम् । पश्यामि त्वां महाभाग तुल्यनिंदात्मसंस्तुतिम् ॥४६॥ अहं च त्वानुपश्यामि ये चान्येऽपि मनीषिणः । आस्थितं परमं मार्गं अक्षयं चाप्यनामयम् ॥४७॥ यत्फलं ब्राह्मणस्येह मोक्षार्थश्चापदात्मकः । तस्मिन्वै वर्तसे विप्र किमन्यत्परिपृच्छसि ॥४८॥ सनंदन उवाच एतच्छूत्वा तु वचनं कृतात्मा कृतनिश्चयः । आत्मनात्मानमास्थाय दृष्ट्वा चात्मानमात्मना ॥४६॥ ब्रह्मरूप हो जाता है ॥३४-३५॥ जिस प्रकार कछुआ अपने अंगों को फैला कर पुनः उनको समेट लेता है उसी प्रकार भिक्षु को भी अपनी इन्द्रियों को मन के द्वारा अपने वश में करना चाहिए ॥३६॥ जिस प्रकार अंधेरे से ढका हुआ घर दीपक से दिखाई देने लगता है उसी प्रकार बुद्धि के दीपक से आत्मा को देखा जा सकता है ॥३७॥ बुद्धिमानों में श्रेष्ठ ! मैं इन सब विशेषताओं को तुममें देख रहा हूँ । इसके अतिरिक्त जो अन्य ज्ञातव्य बातें हैं; उनको तुम भली भांति जानते हो ॥३८॥ ब्रह्मर्षि ! तुमको सारी बातें ज्ञात हैं। गुरु की कृपा और शिक्षा के कारण तुमने विषय-वासनाओं को भी जीत लिया है। महामुनि व्यास के अनुग्रह से मुझे जो उत्कृष्ट दिव्य ज्ञान प्राप्त है उसके द्वारा मुझे ज्ञात है कि तुम अधिक ज्ञानी हो। तुम्हारी पहुँच दूर तक है और तुम्हारा ज्ञान वैभव उत्कृष्ट है जिसका अनुभव स्वयं तुमको नहीं है ॥३९-४१॥ चाहे इसका कारण तुम्हारी शिशुता हो, संशय हो या विमोहजन्य भय हो । विज्ञान प्राप्त हो जाने पर भी मोक्ष गति प्राप्त नहीं होती है। शुद्ध व्यवसाय के द्वारा अपने आन्तरिक संशयों तथा पीड़ा को नष्ट कर मेरे समान व्यक्ति उस गति को प्राप्त करते हैं। आप तो स्थिरबुद्धि, संतोषी, विज्ञानो हैं। ब्रह्मन् ! आप ने तो अनायास ब्रह्म पद को प्राप्त कर लिया है ॥४२-४४॥ आपके लिए सुख-दुःख दोनों बराबर हैं। सब पदार्थों को समबुद्धि से देखते हैं। किसी वस्तु की इच्छा नहीं है। नृत्य-गीतों के प्रति आपकी कोई आसक्ति नहीं है ॥४५॥ बन्धुओं के प्रति आप की ममता नहीं है, और न तो आपको किसी से भय ही है। महाभाग, मैं आपको निन्दा और स्तुति के प्रति समान दृष्टि रखने वाला देखता हूँ, ॥४६॥ मैं उन मनीषियों को भी देखता हूँ, जो अक्षय अनामय और परम मुक्ति पथ के पथिक हैं; परन्तु सब में आप श्रेष्ठ हैं। इस लोक में ब्राह्मण कुल में जन्म लेने का जो फल होता है, और मुक्ति का जो स्वरूप है, उसी में आपकी स्थिति है। अब दूसरी कौन सी वस्तु है, जिसके विषय में पूछते हैं ॥४७-४८॥ सनन्दन ने कहा- राजा जनक की उपर्युक्त बातों को सुनकर कृतात्मा शुक को आत्म निश्चय हो गया। उन्होंने अपने अन्तःकरण में आत्म-भाव की प्रतिष्ठा की और उसमें ही परमतत्त्व का दर्शन किया ॥४९॥
षष्टितमोऽध्यायः ५२१ कृतकार्यः सुखी शांतस्तूष्णीं प्रायादुदङ्मुखः । शैशिरं गिरिमासाद्य पाराशर्यं ददर्श च ॥५०॥ शिष्यानध्यापयंतं च पैलादीन्वेदसंहिताः । आरणयो विशुद्धात्मा दिवाकरसमप्रभः ॥५१॥ पितुर्जग्राह पादौ च सादरं हृष्टमानसः । ततो निवेदयामास पितुः सर्वमुदारधीः ॥५२॥ शुको जनकराजेन संवादं मोक्षसाधनम् । तच्छ्रुत्वा वेदकर्तासो प्रहृष्टेनांतरात्मना ॥५३॥ समालिंग्य सुतं व्यासः स्वपार्श्वस्थं चकार च ॥५४॥ ततः पैलादयो विप्रा वेदान् व्यासादधीत्य च । शैलशृंगाद्भुवं प्राप्ता याजनाध्यापने रताः ॥५५॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने एकोनषष्टितमोऽध्यायः ॥५९॥
अथ षष्टितमोऽध्यायः सनंदन उवाच अवतीर्णेषु विप्रेषु व्यासः पुत्रसहायवान् । तूष्णीं ध्यानपरो धीमानेकांते समुपविशत् ॥१॥ तमुवाचाशरीरी वाक् व्यासं पुत्रसमन्वितम् । भो भो महर्षे वासिष्ठ ब्रह्मघोषो न वर्तते ॥२॥ एको ध्यानपरस्तूष्णीं किमास्ते चिंतयन्निव । ब्रह्मघोषैर्विरहितः पर्वतोऽयं न शोभते ॥३॥ तस्मादधीष्व भगवन्सार्द्धं पुत्रेण धीमता । वेदान्वेदविदा चैव सुप्रसन्नमनाः सदा ॥४॥
अपना मनोरथ सफल जान कर शान्त और सुखी शुक देव चुपचाप उत्तर दिशा की ओर चले गए । हिमालय पर्वत पर जाकर उन्होंने देखा कि व्यास जी पैल आदि शिष्यों को वेद संहिता पढ़ा रहे हैं ॥५०॥ शुद्धात्मा, सूर्य के समान तेजस्वी अरणिकुमार ने प्रसन्न मन से आदर के साथ पिता के चरणों का स्पर्श किया । चरण-वन्दन के अनन्तर उदारबुद्धि शुक ने राजा जनक से मोक्ष-साधन के विषय में जो कुछ वार्ता हुई थी, सब कह सुनाया ॥५१-५२॥ वेदकर्त्ता व्यास का अन्तःकरण पुत्र के मुख से सारी कथा को सुनकर खिल उठा । उन्होंने अपने शुक को गले से लगा लिया और अपने बगल में बैठाया ॥५४॥ इसके बाद पैल आदि वेदपाठी ब्राह्मण व्यास मुनि से सम्पूर्ण वेदों का अध्ययन कर उस पर्वत के शिखर पर से उतर कर पृथ्वी पर आये और वेद पढ़ाने तथा यज्ञ कराने के कार्य में संलग्न हो गए ॥५५॥ श्री नारदीय पुराण के पूर्वभाग में उनसठवां अध्याय समाप्त ॥५९॥
अध्याय ६० सनत्कुमार का शुक को ज्ञानोपदेश सनन्दन ने कहा—पैल आदि विप्रों के चले जाने पर पुत्र के साथ व्यास जी चुपचाप एकान्त में ध्यान मग्न हो गए ॥१॥ उसी समय पुत्र के सहित ध्यान मग्न व्यास के प्रति आकाशवाणी हुई कि हे वासिष्ठ ! महर्षि ! इस समय ब्रह्मघोष (वेद ध्वनि) नहीं हो रही है, तुम क्यों एकान्त में ध्यानमग्न हो कर विचार करते हुए से बैठे हो । वेद-ध्वनि के बिना इस पर्वत की शोभा नहीं हो रही है ॥२-३॥ इसलिये भगवन् ! सदा प्रसन्नमन से इस वेदवेत्ता धीमान् पुत्र के साथ वेदों का अध्ययन करो ॥४॥ व्यास जी इस प्रकार की आकाशवाणी को सुन कर ६६ ना० पु०
५२२ नारदीयपुराणम् तच्छ्रुत्वा वचनं व्यासो नभोवाणीसमीरितम् । शुकेन सह पुत्रेण वेदाभ्यासमथाकरोत् ॥५॥ तयोरभ्यसतोरेवं बहुकालं द्विजोत्तम । वातोऽतिमात्रं प्रववौ समुद्रानिलवोजितः ॥६॥ ततोऽनध्याय इति तं व्यासः पुत्रमवारयत् । शुको वारितमात्रस्तु कौतूहलसमन्वितः ॥७॥ अपृच्छत्पितरं तत्र कुतो वायुरभूदयम् । आख्यातुमर्हति भवान्सवं वायोर्विचेष्टितम् ॥८॥ शुकस्यैतद्वचः श्रुत्वा व्यासः परमविस्मितः । अनध्यायनिमित्तेऽस्मिन्निदं वचनमब्रवीत् ॥६॥ दिव्यं ते चक्षुरुत्पन्नं स्वस्थं ते निश्चलं मनः । तमसा रजसा चापि त्यक्तः सत्ये व्यवस्थितः ॥१०॥ तस्यात्मनि स्वयं वेदान्बुद्ध्वा समनुचिंतय । देवयानचरो विष्णोः पितृयानश्च तामसः ॥११॥ द्वावेतौ प्रत्ययं यातौ दिवं चाधश्च गच्छतः । पृथिव्यामंतरिक्षे च यतः संयांति वायवः ॥१२॥ सप्त ते वायुमार्गा वै तान्निबोधानुपूर्वशः । तत्र देवगणाः साध्याः समभूवन्महाबलाः ॥१३॥ तेषामप्यभवत्पुत्रः समानो नाम दुर्जयः । उदानस्तस्य पुत्रोऽभूद्व्यानस्तस्याभवत्सुतः ॥१४॥ अपानश्च ततो जज्ञे प्राणश्चापि ततः परम् । अनपत्योऽभवत्प्राणो दुर्धर्षः शत्रुमर्दिनः ॥१५॥ पृथक्कमीणि तेषां तु प्रवक्ष्यामि यथा तथा । प्राणिनां सर्वतो वायुश्चेष्टा वर्तयते पृथक् ॥१६॥ प्रीणनाच्चैव सर्वेषां प्राण इत्यभिधीयते । प्रेषयत्यभ्रसंघातान्धूमजांश्चोष्मजांस्तथा ॥१७॥ प्रथमः प्रथमे मार्गे प्रवह्यो नाम सोऽनिलः । अंबरे स्नेहमात्रेभ्यस्तडिद्भ्यश्चोत्तमद्युतिः ॥१८॥ आवहो नाम सोऽभ्येति द्वितीयः श्वसनो नदन् । उदयं ज्योतिषां शश्वत्सोमादीनां करोति यः ॥१९॥
पुत्र शुकदेव के साथ वेदाभ्यास करने लगे ॥५॥ द्विजोत्तम ! बहुत समय तक इन दोनों के इस प्रकार वेदाभ्यास करने के बाद एकाएक समुद्री वायु प्रेरित होकर जोरों से आंधी बहने लगी ॥६॥ यह देखकर 'अब अनध्याय का समय हो गया, यह कहकर व्यास ने पुत्र को पढ़ने से रोक दिया । इस प्रकार अध्ययन से रोके जाने पर शुकदेव को अत्यन्त आश्चर्य हुआ ॥७॥ उन्होंने पिता से पूछा कि यह प्रचण्ड वायु कहाँ से उत्पन्न हुआ ? आप वायु के प्रत्येक व्यापारों का वर्णन कीजिए ॥८॥ शुक के इस प्रश्न को सुनकर व्यास जी को परम विस्मय हुआ । उन्होंने अनध्याय के कारणभूत वायु के विषय में आगे की बातें बताईं ॥९॥ कि-तुम्हें दिव्य चक्षु प्राप्त हो गया है, तुम्हारा स्वस्थ और निश्चल मन तम और रज को छोड़ कर सत्य पर अटल हो गया है ॥१०॥ इसलिए अपने मन में वेदों का अनुचिन्तन कर विचार करो । विष्णु लोक का पथ देवयान चर है और पितृ यान तमसाच्छन्न या तामस है ॥११॥ स्वर्ग और पितर लोक को जाने वालों के लिये ये दो मार्ग हैं। पृथ्वी और अन्तरिक्ष में सात मार्ग से वायु बहता है, अतः उन सात वायुमार्गों को तुम यथार्थ रूप से समझ लो ॥१२॥ सब से पहले साध्य नाम के अत्यन्त बलवान् देवगण हुए। उनका समान नामक एक अजेय पुत्र हुआ, समान का पुत्र उदान और उदान के व्यान नामक पुत्र हुआ। व्यान के अपान और अपान के प्राण नामक पुत्र हुआ। दुर्धर्ष और शत्रु को पराजित करने वाले प्राण को कोई पुत्र नहीं हुआ ॥१३-१५॥ उनके जो पृथक् पृथक् कर्म हैं उनको कह रहा हूँ। वायु ही सब प्राणियों को गति और स्फूर्ति प्रदान करता है ॥१६॥ सब प्राणियों को तृप्त करने के कारण वायु को प्राण कहते हैं। मेघों को चाहे वे धुयें से उत्पन्न हुए हों या ताप से जो प्रथम मार्ग में ले जाता है वह प्रवह नामक वायु है ॥१७॥ आकाश में सम्पूर्ण स्नेहभय पदार्थों और विद्युत् से भी उत्कृष्ट प्रकाश वाला जो दूसरा अनिल है उसका नाम आवह है, जो ध्वनि करता हुआ बहता है ॥१८॥ जो सर्वदा चन्द्रमा आदि ज्योतिष्क पिण्डों को उदित करता है और शरीर के भीतर संचरणशील जिस वायु को मनीषी उदान कहते हैं, जो चारों
षष्टितमोऽध्यायः ५२३ अंतर्देहेषु चोदानं यं वदंति मनीषिणः । यश्चतुर्भ्यः समुद्रेभ्यो वायुर्द्धारयते जलम् ॥२०॥ उद्धृत्य ददते चापो जीमूतेभ्यो वनेऽनिलः । योऽद्भिः संयोज्य जीमूतान्पर्जन्याय प्रयच्छति ॥२१॥ उद्वहो नाम बर्हिष्ठस्तृतोयः स सदागतिः । संनीयमाना बहुधा येन नीला महाधनाः ॥२२॥ वर्षमोक्षकृतारंभास्ते भवंति घनाघनाः । योऽसौ वहति देवानां विमानानि विहायसा ॥२३॥ चतुर्थः संवहो नाम वायुः स गिरिमर्दनः । येन वेगवता रुग्णाः क्रियन्ते तरुजा रसाः ॥२४॥ पंचमः स महावेगो विवहो नाम मारुतः । यस्मिन्परिप्लवे दिव्या वहंत्यापो विहायसा ॥२५॥ पुण्यं चाकाशयंमायास्तोयं तिष्ठति तिष्ठति । दूरात्प्रतिहतो यस्मिन्नेकरश्मिर्दिवाकरः ॥२६॥ योनिरंशुसहस्रस्य येन याति वसुंधराम् । यस्मादाप्यायते सोमो निधिर्दिव्योऽमृतस्य च ॥२७॥ षष्ठः परिवहो नाम स वायुर्जीवतांवरः । सर्वप्राणभृतां प्राणान्योऽन्तकाले निरस्यति ॥२८॥ यस्य धर्मेऽनुवर्तते मृत्युर्वैवस्वतावुभौ । सम्यगन्वीक्षता बुद्ध्या शांतयाऽध्यात्मनित्यया ॥२६॥ ध्यानाभ्यासाभिरामाणां योऽमृतत्वाय कल्पते । यं समासाद्य वेगेन दिशामंतं प्रपेदिरे ॥३०॥ दक्षस्य दश पुत्राणां सहस्राणि प्रजापतेः । येन वृष्ट्या पराभूतस्तोयान्येन निवर्तते ॥३१॥ परीवहो नाम वरो वायुः स दुरतिक्रमः । एवमेते दितेः पुत्रा मरुतः परमाद्भुताः ॥३२॥ अनारमंतः सर्वांतः सर्वगाः सर्वचारिणः । एतत्तु महदाश्चर्यं यदयं पर्वतोत्तमः ॥३३॥ कंपितः सहसा तेन पवमानेन वायुना । विष्णोर्निःश्वासवातोऽयं यदा वेगसमीरितः ॥३४॥ समुद्रों से जल खींचता है, जो जीमूत नामक मेघों से जल लेकर वनों में वर्षा करता है, जो पुनः जीमूतों को जल से भर देता और पर्जन्य को जल से युक्त कर देता है, वह तीसरा सदा गतिशील रहने वाला और प्रशंसनीय उद्वह कहलाता है ॥१९-२१॥ जो नील महामेघों को प्रायः इधर-उधर पहुँचाता है, जिसके कारण वे घने मेघ वर्षा बरसाते और रोकते हैं और जो देव विमानों को आकाश में इधर-उधर उड़ाता है वह चौथा पर्वतों का मान मर्दन करने वाला मारुत संवह है ॥२२-२३॥ जिस वेगवान् वायु से वृक्षों से उत्पन्न रस में रोग के कीटाणु घुस जाते हैं वह पाँचवां महा वेग वाला मारुत विवह है ॥२४॥ जिसके आधार पर आकाश में दिव्य जल प्रवाहित होते हैं, जो आकाश गंगा के पवित्र जल को धारण कर के स्थित है और जिसके द्वारा दूर से ही प्रतिहत होकर सहस्रों किरणों के उत्पत्तिस्थान सूर्य देव एक ही किरण से युक्त प्रतीत होते हैं, जिनसे यह पृथ्वी प्रकाशित होती है तथा अमृत की दिव्यनिधि चन्द्रमा का भी जिससे पोषण होता है, उस छठे वायु का नाम 'परिवह' है। वह सम्पूर्ण जीवनधारियों में श्रेष्ठ है ॥२४-२७॥ जो सब प्राणियों के प्राण को मृत्यु के समय खींच लेता है, मृत्यु और वैवस्वत जिसके वशवर्ती हैं, ध्यान और योगाभ्यास में लीन रहने वाले योगी जिसको नित्य अध्यात्म और शान्त बुद्धि से भली भाँति देखकर अमृतत्व प्राप्त करते हैं, जिस वायु के वेग में पड़कर प्रजापति दक्ष के दश हजार पुत्र बड़े वेग से सम्पूर्ण दिशाओं के अन्त में पहुँच गए तथा जिससे वृष्टि का जल तिरोहित होकर वर्षा बन्द होजाती है, वह परीवह नामक श्रेष्ठ वायु है जिसको कोई किसी प्रकार अपने वश में नहीं कर सकता ॥२८-३१॥ इस प्रकार इतने दिते के परम आश्चर्यजनक पुत्र वायु हैं। ये मरुत् सबके अन्तःकरण में प्रवेश करने वाले, सर्वत्र गतिशील, सर्वव्यापक और सब स्थानों पर पहुँचने वाले हैं ॥३२॥ यह एक आश्चर्यजनक बात है, कि उस वायु के चलने से यह गिरि- राज हिमालय भी सहसा हिल उठा । जब विष्णु के निःश्वास से निकला हुआ यह वायु बड़े वेग से सहसा उठता है तो उस समय यह संसार इस वायु से अत्यंत व्यथित हो जाता है ॥३३-३४॥ ब्रह्मन् ! इसलिए
५२४ नारदीयपुराणम् सहसोदीर्यते तात जगत्प्रव्यथते तदा । तस्माद्ब्रह्मविदो ब्रह्म न पठन्त्यतिवायुतः ॥३५॥ वायोर्वायुभयं ह्युक्तं ब्रह्म तत्पीडितं भवेत् । एतावदुक्त्वा वचनं पराशरसुतः प्रभुः ॥३६॥ उक्त्वा पुत्रमधीष्वेति व्योमगंगामगात्तदा । ततो व्यासे गते स्नातु शुको ब्रह्मविदां वरः ॥३७॥ स्वाध्यायमकरोद्ब्रह्मन्वेदवेदांगपारगः । तत्र स्वाध्यायसंसक्तं शुकं व्याससुतं मुने ॥३८॥ सनत्कुमारो भगवानेकांते समुपायतः । उत्थाय सत्कृतस्तेन ब्रह्मपुत्रो हि काष्णना ॥३९॥ ततः प्रोवाच विप्रेंद्र शुकं वेदविदां वरः । किं करोषि महाभाग व्यासपुत्रमहाद्युते ॥४०॥ शुक उवाच स्वाध्याये संप्रवृत्तोऽहं ब्रह्मपुत्राधुना स्थितः । त्वद्दर्शनमनुप्राप्तः केनापि सुकृतेन च ॥४१॥ किंचित्त्वां प्रष्टुमिच्छामि तत्त्वं मोक्षार्थसाधनम् । तद्वदस्व महाभाग यथा तज्ज्ञानमाप्नुयाम् ॥४२॥ सनत्कुमार उवाच नास्ति विद्यासमं चक्षुर्नास्ति विद्यासमं तपः । नास्ति रागसमं दुःखं नास्ति त्यागसमं सुखम् ॥४३॥ निवृत्तिः कर्मणः पापात्सततं पुण्यशीलता । सद्वृत्तिः समुदाचारः श्रेय एतदनुत्तमम् ॥४४॥ मानुष्यमसुखं प्राप्य यः संज्जित स मुह्यति । नालं स दुःखमोक्षाय संगो वै दुःखलक्षणः ॥४५॥ सक्तस्य बुद्धिर्भवति मोहजालविवर्द्धिनी । मोहजालावृतो दुःखमिहामुत्र तथाश्नुते ॥४६॥
इस प्रकार के अद्भुत वायु के चलने के कारण ब्रह्मज्ञानी अपने वेदाध्ययन को बन्द कर देते हैं ॥३५॥ वायु के द्वारा जो भय होता है उसको कह दिया गया, इस वायु से ब्रह्म भी पीड़ित होता है । पराशर पुत्र प्रभु व्यास इस प्रकार पुत्र से कहकर ओर हे पुत्र ! अब स्वाध्याय करो, ऐसा कहकर व्योमगंगा में नहाने के लिए चले गये । नारद ! स्नान करने के लिए जब व्यास जी चले गये तब ज्ञानियों में श्रेष्ठ वेद-वेदांगों के पारगामी विद्वान् शुकदेव जी ने अपना स्वाध्याय प्रारम्भ किया ॥३६-३७॥ मुने ! उस समय जब कि व्यासपुत्र शुकदेव जी एकान्त में स्वाध्याय में मग्न थे भगवान् सनत्कुमार उनके समीप आये । व्यासपुत्र ने उठकरं ब्रह्मपुत्र का स्वागत किया । विप्रेंद्र ! शुकदेव से सत्कृत होने के बाद वेदज्ञों में श्रेष्ठ ऋषि ने पूछा- व्यासपुत्र ! महाभाग ! महाद्युति ! क्या कर रहे हो ? ॥३८-४०॥ शुक ने कहा- ब्रह्मपुत्र ! इस समय यहाँ बैठा बैठा स्वाध्याय कर रहा हूँ, आज आपका यह दर्शन मेरे किसी पूर्वजन्म के सुकृत से हुआ है ॥४१॥ महाभाग ! आज मैं आप से मोक्ष प्राप्ति के साधन के विषय में कुछ पूछना चाहता हूँ, कृपा कर आप मुझे इस विषय में कुछ बतावें जिससे कि मोक्ष विषयक ज्ञान पा जाऊँ ॥४२॥ सनत्कुमार बोले- विद्या के समान नेत्र नहीं, न तो विद्या के समान कोई तपस्या ही है । राग के समान कोई दुःख नहीं, न तो त्याग के समान सुख है ॥४३॥ समस्त पाप कर्मों से सर्वदा दूर रहना, सदा पुण्य का संचय करते रहना, साधु पुरुषों के व्यवहार को अपनाना और उत्तम सदाचार का पालन करना, ये सर्वोत्तम श्रेय हैं ॥४४॥ जो अश्रेयस्कर इन्द्रिय-सुखों में आसक्त होता है, अज्ञान के अन्धकार में पतित होता है, वह कभी भी दुखों से मुक्त नहीं हो सकता क्योंकि संग (आसक्ति) ही दुःख का प्रधान लक्षण है ॥४५॥ आसक्त व्यक्ति को मोह बढ़ाने वाली बुद्धि होती है और मोह-जाल में फँसा व्यक्ति दोनों लोकों में दुःख पाता है,
षष्टितमोऽध्यायः ५२५ सर्वोपायेन कामस्य क्रोधस्य च विनिग्रहः । कार्यः श्रेयोथिना तौ हि श्रेयोघातार्थमुद्यतौ ॥४७॥ नित्यं क्रोधात्तपो रक्षेच्छ्रियं रक्षेच्च मत्सरात् । विद्यां मानापमानाभ्यामात्मानं तु प्रमादतः ॥४८॥ आनृशंस्यं परा धर्मः क्षमा च परमं बलम् । आत्मज्ञानं परं ज्ञानं सत्यं हि परमं हितम् ॥४९॥ येन सर्वं परित्यक्तं स विद्वान्स च पंडितः । इंद्रियैरिन्द्रियार्थेभ्यश्चरत्यात्मवशैर्रिह ॥५०॥ असज्जमानः शांतात्मा निर्विकारः समाहितः । आत्मभूतैरतद्भूतः सह चैव विनैव च ॥५१॥ स विमुक्तः परं श्रेयो न चिरेणाधिगच्छति । अदर्शनमसंसर्पस्तथैवाभाषणं सदा ॥५२॥ यस्य भूतैः सह मुने स श्रेयो विन्दते महत् । न हिंस्यात्सर्वभूतानि भूतैर्मैत्रायणश्चरेत् ॥५३॥ नेदं जन्म समासाद्य वैरं कुर्वीत केनचित् । आकिंचन्यं सुसंतोषो निराशिष्टवमचापलम् ॥५४॥ एतदाहुः परं श्रेय आत्मज्ञस्य जितात्मनः । परिग्रहं परित्यज्य भव तात जितेन्द्रियः ॥५५॥ अशोकं स्थानमातिष्ठेह चामुत्र चाभयम् । निराशिनो न शोचंति त्यजेदाशिषमात्मनः ॥५६॥ परित्यज्याशिखं सौम्य दुःखग्रामाद्विमोक्ष्यसे । तपोनित्येन दांतेन मुनिना संयतात्मना ॥५७॥ अजितं जेतुकामेन भाव्यं संगेष्वसंगिना । गुणसंगेष्वनासक्त एकचर्यारतः सदा ॥५८॥ ब्राह्मणो न चिरादेव सुखमायात्यनुत्तमम् । द्वंद्वारामेषु भूतेषु वराको रमते मुनिः ॥५९॥
॥४६॥ श्रेयार्थी को सब प्रकार से काम और क्रोध को अपने वश में करना चाहिए क्योंकि ये दोनों श्रेय के विघात में सर्वदा तत्पर रहते हैं ॥४७॥ नित्य प्रति क्रोध से तप की और मात्सर्य से श्री की रक्षा करनी चाहिए। मान और अपमान से विद्या की और प्रमाद से आत्मा (ज्ञान) की रक्षा श्रेयस्कर है ॥४८॥ दया परम धर्म और क्षमा परम बल है। आत्मज्ञान परम ज्ञान और सत्य परम हित है ॥४९॥ जिसने सर्वस्व का त्याग कर दिया है वह पंडित और विद्वान् है। इस संसार में जितेन्द्रिय व्यक्ति विषयों का सेवन केवल इन्द्रियों से ही करते हैं, उनमें आसक्त नहीं होते ॥५०॥ अनासक्त, शांतचित्त, निर्विकार, एकाग्रचित्त और आत्मीय जनों के भाव अथवा अभाव दोनों अवस्थाओं में आसक्त न होने वाला व्यक्ति मुक्त है और उसको श्रेय शीघ्र प्राप्त हो जाता है ॥५१॥ मुने ! जो प्राणी को नहीं देखता, न उससे बोलता और न तो उनका स्पर्श करता है अर्थात् आत्माराम है, उसको परम श्रेय प्राप्त होता है, ॥५२॥ किसी प्राणी की हिंसा न करे, सबसे मित्र भाव रखे और यह मानव जन्म पाकर किसी से वैर न करे, ॥५३॥ आत्मज्ञ और जितात्मा के लिए दरिद्रता, संतोष, निराशा और धीरता हो परम श्रेय माना गया है। आपने तो परिग्रह का त्याग कर जितेन्द्रियता प्राप्त कर ली है। अब इस लोक और परलोक में अभय हो अशोक (निश्चिन्त) स्थान ग्रहण करें ॥५४-५५॥ किसी से कुछ आशा न रखने वाले व्यक्ति किसी प्रकार की चिन्ता में नहीं पड़ते हैं। इसलिये अपने स्वार्थ को आशा का त्याग कर देना चाहिए। सौम्य ! तुम आत्मसुख की भावना का परित्याग कर दुःखों और श्रम से मुक्त हो जाओगे ॥५६॥ नित्य तपस्या में लीन रहने वाले संयमी उदार मुनि को चाहिए कि वह सम्पूर्ण संगों अर्थात् आसक्ति उत्पन्न करने वाले विषयों को जीतने का प्रयत्न करे। सांसारिक विषयों में लिप्त न रहने वाला, सदा एकान्तवास करने वाला ब्राह्मण अतिशीघ्र अनुत्तम सुख को प्राप्त करता है। पराक व्रतशील मुनि सुख-दुःखों के देने वाले विषयों में कभी लिप्त नहीं होते हैं । स्वल्प ज्ञान वाले उस स्थित को प्राप्त नहीं करते हैं । परन्तु ज्ञानतृप्त व्यक्ति किसी प्रकार का शोक नहीं करते हैं। ॥५७-५९॥
५२६ नारदीयपुराणम् किंचित्प्रज्ञानतृप्तोऽसौ ज्ञानतृप्तो न शोचति । शुभैर्लभेत देवत्वं व्यामिश्रैर्जन्म मानुषम् ॥६०॥ अशुभैश्चाप्यधो जन्म कर्माभिलं भतेऽवशः । तत्र मृत्युजरादुःखैः सततं समभिद्रुतम् ॥६१॥ संसारं पश्यते जंतुस्तत्कथं नावबुध्यसे । अहिते हितसंज्ञस्त्वमध्रुवे ध्रुवसंज्ञकः ॥६२॥ अनर्थे चार्थसंज्ञस्त्वं किमर्थं नावबुध्यसे । संवेष्ट्यमानं बहुभिर्मोहतंतुभिरात्मजैः ॥६३॥ कोशकारवदात्मानं वेष्टितो नावबुध्यसे । अलं परिग्रहेणेह दोषवान् हि परिग्रहः ॥६४॥ कृमिर्हि कोशकारस्तु बध्यते स्वपरिग्रहात् । पुत्रदारकुटुंबेषु सक्ताः सीदंति जंतवः ॥६५॥ सरःपंकार्णवे मग्ना जीर्णा वनगजा इव । मोहजालसमाकृष्टान्पश्य जंतून्सुदुःखितान् ॥६६॥ कुटुंबं पुत्रदारं च शरीरं द्रव्यसंचयम् । पारक्यमध्रुवं सर्वं किं स्वं सुकृतदुष्कृते ॥६७॥ यदा सर्वं परित्यज्य गंतव्यमवशेन वै । अनर्थे किं प्रसक्तस्त्वं स्वमर्थं नानुतिष्ठसि ॥६८॥ अविश्रांतमनालंबमपाथेयमदैशिकम् । तमःकर्त्तारमध्वानं कथमेको गमिष्यसि ॥६९॥ नहि त्वां प्रस्थितं कश्चित्पृष्ठतोऽनुगमिष्यति । सुकृतं दुष्कृतं च त्वां गच्छंतमनुयास्यतः ॥७०॥ विद्या कर्म च शौर्यं च ज्ञानं च बहुविस्तरम् । अर्थार्थमनुशोयंते सिद्धार्थस्तु विमुच्यते ॥७१॥ निबंधिनी रज्जुरेषा या ग्रामे वसतो रतिः । छित्त्वैनां सुकृतो यांति नैनां छिंदंति दुष्कृतः ॥७२॥ शुभ कर्मों के करने से मनुष्य देवत्व प्राप्त करता है, शुभ-अशुभ दोनों कर्मों के कारण मानव-जन्म और अशुभ कर्मों के कारण अवश प्राणी अधम योनियों में जन्म ग्रहण करता है ॥६०-६१॥ इस प्रकार जीव अपने कर्मों के कारण भिन्न-भिन्न योनियों में जन्म लेकर मृत्यु, बुढ़ापा और दुःखों से सर्वदा पीड़ित होकर संसार में भ्रमण करता रहता है। इसको देखकर क्यों नहीं इसका रहस्य समझ लेते हो ? ॥६१-६२॥ तुम तो इस अहितकर संसार में हितकर विषयों के ज्ञाता हो, अनित्य जगत् में नित्य के ज्ञाता और अनर्थ का त्याग कर अर्थवान् (सार्थक) विषयों के ज्ञाता हो, तो क्यों नहीं इस रहस्य को समझ लेते हो ? ॥६२-६३॥ स्वयम् आत्म-अज्ञान के कारण उत्पन्न मोह की रस्सियों में अपने को बाँध लेने वाले तुम अपने को रेशम के कीड़े की भाँति नहीं पहचान पाते हो (अर्थात्) जीव अपने को अपने ही अज्ञान के जाल में फँसाकर अपने दुःख का कारण बनता है ॥६३-६४॥ इस लिये परिग्रह (संग्रह) का त्याग करो । इससे कुछ भी लाभ नहीं है, क्योंकि संग्रह सर्वथा सदोष होता है । रेशम का कीड़ा अपने ही तन्तुओं में बँध जाता है । उसी प्रकार जीव भी स्त्री, पुत्र और परिवार के चक्कर में पड़कर सर्वदा कष्ट पाते रहते हैं ॥६४-६५॥ तालाब के कीचड़ में फँसे जंगल के बूढ़े हाथी के समान मोह-जाल में फँसे इन अत्यन्त दुःखी जीवों को देखो ॥६६॥ जब कि कुटुम्ब पुत्र, स्त्री, शरीर, संचित द्रव्य राशि, सुकृत, पाप आदि अनित्य और परकीय पदार्थों को छोड़कर अवश प्राणी को अवश्य ही इस लोक से चला जाना है तब तुम इस रहस्य को जानते हुए भी क्यों नहीं आत्म कल्याणार्थ प्रयत्न करते हो ॥६७-६८॥ तुम इस निरालंब, कभी भी विश्राम के लिए अवसर न पाने योग्य, पाथेय रहित, देश आदि से शून्य और अन्धकाराच्छन्न परलोक मार्ग पर कैसे अकेले चल सकते हो ? ॥६९॥ जब तुम इस लोक को छोड़कर परलोक चलोगे तब तुम्हारे पीछे-पीछे सहायता के लिए कौन जायेगा ? केवल तुम्हारे पाप-पुण्य ही तुम्हारा अनुसरण करेंगे ॥७०॥ केवल स्वार्थसिद्धि के लिए पढ़ी हुई विद्या, किये हुए कर्म, शौर्य अथवा विस्तृत ज्ञान उस समय काम नहीं देते हैं। केवल शुभ कार्य करने वाला सिद्धार्थ योगी ही मोक्ष का अधिकारी होता है ॥७१॥ विषय समूह अथवा लोक में आसक्ति उत्पन्न करने वाली ममता जीव को बन्धन में डालने वाली रस्सी है । सुकृती जन इस रस्सी को तोड़- कर मुक्त हो जाते हैं, परन्तु पापी इसको तोड़ नहीं पाते हैं ॥७२॥ जीव अपने ही समान जाति, रूप
षष्टितमोऽध्यायः ५२७ तुल्यजातिवयोरूपान् हृतान्पश्यसि मृत्युना । न च नामास्ति निर्वेदो लोहं हि हृदयं तव ॥७३॥ रूपकूलां मनःस्रोतां स्पर्शद्वीपां रसावहाम् । गंधपंकां शब्दजलां स्वर्गमार्गदुराग्रहाम् ॥७४॥ क्षमारित्रां सत्यमयीं धर्मस्थैर्यकराकराम । त्यागवाताध्वगां शीघ्रां बुद्धिनावं नदीं तरेत् ॥७५॥ त्यक्त्वा धर्ममधर्मं च ह्युभे सत्यानृते त्यज । त्यज धर्ममसंकल्पादधर्मं चाप्यहिंसया ॥७६॥ उभे सत्यानृते बुद्ध्वा बुद्धिं परमनिश्चयात् । अस्थिस्थूणं स्नायुयुतं मांसशोणितलेपनम् ॥७७॥ धर्मावनद्धं दुर्गन्धि पूर्णं मूत्रपुरीषयोः । जराशोकसमाविष्टं रोगायतनमस्थिरम् ॥७८॥ रजस्वलमनित्यं च भूतावासं समुत्सृज । इदं विश्वं जगत्सर्वमजगच्चापि यद्भवेत् ॥७६॥ महाभूतात्मकं सर्वमस्माद्यत्परमाणुमत् । इंद्रियाणि च पंचैव तमः सत्त्वं रजस्तथा ॥८०॥ इत्येष सप्तदशको राशिरव्यक्तसंज्ञकः । सर्वैरिरिन्द्रियार्थैश्च व्यक्ताव्यक्तैर्हि बृंहितम् ॥८१॥ पंचविंशक इत्येष व्यक्ताव्यक्तमयो गणः । एतैः सर्वैः समायुक्तमनित्यमभिधीयते ॥८२॥ त्रिवर्गोऽथ सुखं दुःखं जीवितं मरणं तथा । य इदं वेद तत्त्वेन स वेद प्रभवाप्ययौ ॥८३॥ इन्द्रियैर्गृह्यते यद्यत्तद्वयक्तमभिधीयते । अव्यक्तमथ तज्ज्ञेयं लिंगग्राह्यमतीन्द्रियम् ॥८४॥ इन्द्रियैर्नियतैर्देही धाराभिरिव तर्प्यते । लोके विहितमात्मानं लोकं चात्मनि पश्यति ॥८५॥ परावरदृशः शक्तिर्ज्ञानवेलां न पश्यति । पश्यतः सर्वभूतानि सर्वावस्थासु सर्वदा ॥८६॥
और वायु वाले साथियों को मृत्य मुख में जाते हुए देखते हैं । परन्तु शोक है कि तुम्हारे सदृश जीवों की आंखें यह देखकर भी नहीं खुलतीं और कुछ भी निर्वेद नहीं होता । सचमुच तुम्हारा हृदय लोहे का है, ॥७३॥ रूप रूपी तट, मन रूपी स्रोत, स्पर्श रूपी द्वीप, रस रूपी वेग, गंधरूपी पंक, शब्द रूपी जल और स्वर्ग मार्ग की ओर कभी भी न ले जाने वाली संसार रूपी नदी को क्षमा रूपी पतवार वाली, सत्यमयी, धर्म रूपी लंगर वाली और त्याग रूपी वायु के सहारे लेई जाने वाली शीघ्रगामिनी बुद्धि रूपी नाव से पार करना चाहिए ॥७४-७५॥ धर्म और अधर्म की भावना को छोड़कर सत्य और असत्यद्वन्द्व का त्याग करो । धर्म को असंकल्प द्वारा और अहिंसा से अधर्म का नाश करो ॥७६॥ और सत्य तथा अनृत को भली भाँति समझकर अपनी निश्चयात्मिका बुद्धि द्वारा हड्डियों के ढाँचे और नसों से युक्त मांस और रक्त के लेप से लिप्त, धर्म से बँधी, दुर्गन्धपूर्ण, मलमूत्र से भरी, जरा और शोक से घिरी, रोग का घर, अस्थिर, धूलि से भरी इस अनित्य देह में आसक्ति न रखो ॥७७-७८१/२॥ यह सारा जगत् (चर) और अजगत् (अचर) रूपात्मक विश्व तथा महाभूतात्मक पदार्थ इसके अतिरिक्त परमाणु वाले पदार्थ पाँचों इन्द्रियाँ, तम, सत्त्व, और रज ये सत्रह प्रकार के पदार्थ अव्यक्त कहलाते हैं। ॥७६-८०१/२॥ इस संसार में सब इन्द्रिय-विषय व्यक्त और अव्यक्त का समूह, पचीस प्रकार के पदार्थ व्यक्ताव्यक्त हैं। इन सबसे युक्त पदार्थ अनित्य कहे जाते हैं ॥८१-८२॥ त्रिवर्ग, सुखदुःख, जीवन और मरण इन सबको जो यथार्थरूप से समझता है वह उत्पत्ति और विनाश दोनों को जानता है ॥८३॥ इन्द्रियों से जिसको ग्रहण किया जाता है, उसको व्यक्त और जो इन्द्रियों से ग्रहण करने योग्य नहीं है और जिसका अनुमान आदि से ग्रहण होता है, उसको अव्यक्त कहते हैं ॥८४॥ नियत इन्द्रियों से जल धारा के समान आत्मा की तृप्ति होती है । संसार में अपने को और अपने में संसार को देखता है, जो आत्म दर्शन की शक्ति से सम्पन्न है, वह ज्ञान वेला को नहीं देखता है ॥८५१/२॥ जो सर्वदा सब अवस्थाओं में सब प्राणियों को देखता है । और जो ब्रह्म स्वरूप है उसका अशुभ कभी नहीं होता है ॥८६१/२॥ ज्ञान के द्वारा ही कायिक विविध क्लेशों से छुट-
५२८ नारदीयपुराणम् ब्रह्मभूतस्य संयोगो नाशुभेनोपपद्यते । ज्ञानेन विविधांक्लेशान् निवृत्तिश्च देहजात् ॥८७॥ लोकबुद्धिप्रकाशेन लोकमार्गो न रिष्यति । अनादिनिधनं जंतुमात्मनि स्थितमव्ययम् ॥८८॥ अकर्तारममूढं च भगवानाह तीर्थवित् । यो जन्तुः स्वकृतैस्तैस्तैः कर्मभिर्नित्यदुःखितः ॥८९॥ स्वदुःखप्रतिघातार्थं हंति जंतुरनेकधा । ततः कर्म समादत्ते पुनरन्यन्नवं बहु ॥९०॥ तप्यतेऽथ पुनस्तेन भुक्त्वाऽपथ्यमिवातुरः । अजस्रमेव मोहांतो दुःखेषु सुखसंज्ञितः ॥९१॥ बध्यते तप्यते चैव भयोत्पतकर्मभिः सदा । ततो निवृत्तो बंधात्स्वात्कर्मणामुदयादिह ॥९२॥ परिभ्रमति संसारे चक्रवद्द्बाहुवर्जितः । संयमेन च संबंधान्निवृत्त्या तपसो बलात् ॥९३॥ सम्प्राप्ता बहवः सिद्धि अव्याबाधां सुखोदयाम् । ॥९४॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे द्वितीयपादे बृहदुपाख्याने षष्टितमोऽध्यायः ॥६०॥
अथैकषष्टितमोऽध्यायः
सनत्कुमार उवाच अशोकं शोकनाशार्थं शास्त्रं शांतिकरं शिवम् । निशम्य लभ्यते बुद्धिलंब्धायां सुखमेधते ॥१॥ हर्षस्थानसहस्राणि शोकस्थानशतानि च । दिवसे दिवसे मूढमाविशंति न पंडितम् ॥२॥
कारा नहीं होता है। केवल लौकिक ज्ञान के प्रकाश से लोक मार्ग पर नहीं चला जाता है अर्थात् लोक यात्रा सफल नहीं होती है। इसके लिए अध्यात्म ज्ञान की भी आवश्यकता है ॥८७॥ आत्म-सन्तुष्ट, अव्यय, जन्म-मरण से रहित, अकर्ता और अविवेकी जीव को भगवान् और तीर्थज्ञ कहा जाता है ॥८८॥ जो जीव अपने किये हुए कर्मों के कारण नित्य दुःखी रहता है और अपने दुःखों के विनाश के लिए अनेक प्रकार के जीवों की हत्या करता है, फिर अनेक कर्मों में अपने को फंसाता है, वह उन कर्मों से उसी प्रकार संतप्त होता है, जिस प्रकार अपथ्य भोजन से रोगी ॥८९-९०॥ वह सर्वदा सुख के भ्रम से दुःखों में फंसकर कष्ट पाता और उन भयोत्पादक कर्मों के कारण मृत्यु-कष्ट में पड़ता है ॥९१॥ पुनः अपने शुभ कर्मों के उदय से दुष्कर्मों के बन्धन से छूटकर इस संसार में चक्र की भाँति परवश होकर भ्रमण करता है। इसके विपरीत संयम, निवृत्ति, भक्ति और तपस्या के बल से सुखप्रद, शुभ सिद्धियों को मनुष्य प्राप्त करते हैं ॥९२-९४॥ श्रीनारदीयपुराण के पूर्वभाग के द्वितीयपाद में साठवां अध्याय समाप्त ॥६०॥
अध्याय ६१
सनत्कुमार बोले - शोक नाश के लिये शान्तिप्रद, शुभ, शोक-विनाशक शास्त्र का अध्ययन या श्रवण करने से ज्ञान और ज्ञान से सुख की प्राप्ति होती है ॥१॥ प्रति दिन मूढ़ मानव सैकड़ों प्रकार के दुःख और सुखों
५२६ एकषष्टितमोऽध्यायः अनिष्टसंप्रयोगाच्च विप्रयोगात्प्रियस्य च । मनुष्या मान सैर्दुःखैर्युज्यन्ते येऽल्पबुद्धयः ॥३॥ द्रव्येषु समतीतेषु ये गुणास्तान्न चिंतयेत् । ताननाद्रियमाणश्च स्नेहबन्धाद्विमुच्यते ॥४॥ दोषदर्शी भवेत्तत्र यत्र रागः प्रवर्त्तते । अनिष्टबुद्धितां यच्छेत्ततः क्षिप्रं विरज्यते ॥५॥ नार्थो न धर्मो न यशो योऽतीतमनुशोचति । अस्याभावेन युज्येत तच्चास्य तु निवर्तते ॥६॥ गुणैर्भूतानि युज्यंते तथैव च न युज्यते । सर्वाणि नैतदेकस्य शोकस्थानं हि विद्यते ॥७॥ मृतं वा यदि वा नष्टं योऽतीतमनुशोचति । दुःखेन लभते दुःखं महानर्थे प्रपद्यते ॥८॥ दुःखोपघाते शारीरे मानसे चाप्युपस्थिते । यस्मिन्न शक्यते कर्तुं यत्नस्तन्नानुचिंतयेत् ॥६॥ भेषज्यमेतद्दुःखस्य यदेतन्नानुचिंतयेत् । चिंत्यमानं हि न व्येति भूयश्चाभिव्रवर्द्धते ॥१०॥ प्रज्ञया मानसं दुःखं हन्याच्छारीरमौषधैः । एतद्विज्ञाय सामर्थ्यं न वान्यैः समतामियात् ॥११॥ अनित्यं जीवितं रूपं यौवनं द्रव्यसञ्चयः । आरोग्यं प्रियसंवासं न गृध्येत्पंडितः क्वचित् ॥१२॥ नाज्ञानप्रभवं दुःखमेकं शोचितुमर्हति । अशोचन्प्रतिकुर्वीत यदि पश्येदुपक्रमम् ॥१३॥ सुखात्प्रियतरं दुःखं जीविते नात्र संशयः । जरामरणदुःखैभ्यः प्रियमात्मानमुद्धरेत् ॥१४॥ मजंति हि शरीराणि रोगाः शारीरमानसाः । सायका इव तीक्ष्णाग्राः प्रयुक्ता दृढधन्विभिः ॥१५॥ व्याधितस्य चिकित्साभिस्त्रस्यतो जीवितेषिणः । आमयस्य विनाशाय शरीरमनुकृष्यते ॥१६॥ में फंसता है परन्तु पंडित नहीं ॥२॥ अवांछित वस्तु के संयोग और प्रिय वस्तु के वियोग से अल्प बुद्धि मनुष्यों को मानसिक कष्ट प्राप्त होता है ॥३॥ अतीत वस्तुओं के गुणों का चिन्तन नहीं करना चाहिए । ऐसी वस्तुओं और उनके गुणों की चिन्ता न करने वाला व्यक्ति स्नेह-बन्धन (आसक्ति) से मुक्त हो जाता है ॥४॥ जिस विषय की ओर अनुरक्ति हो उस विषय के दोषों को ही देखना चाहिए । इस प्रकार उसको अपना अनिष्टकारक समझने से मनुष्यों को उस विषय से विराग हो जाता है ॥५॥ जो अतीत विषयों का चिन्तन करता है उससे न तो उसका कुछ प्रयोजन ही सिद्ध होता है और न धर्म या यश ही मिलता है। जो इस भाव से विचार करता है, वह कष्टों से निवृत्त हो जाता है ॥६॥ प्राणी कभी विषय-गुणों में आसक्त होते हैं और कभी उससे विरक्त क्योंकि सब पदार्थ एक ही व्यक्ति के लिये शोक के कारण नहीं होते हैं। ॥७॥ जो मृत, नष्ट अथवा बीती हुई घटनाओं के लिए शोक करता है, वह अपनी इस दुःखजनक प्रवृत्ति के कारण दुःख पाता है और महान् अनर्थों के जाल में फंस जाता है ॥८॥ यदि शारीरिक या मानसिक दुःख में पड़ जाने पर उस दुःख को दूर नहीं किया जा सकता तो फिर उसके विषय में कुछ शोक करना ही व्यर्थ है ॥९॥ दुःख दूर करने की सबसे बड़ी ओषधि यह है कि उसकी चिन्ता ही न करे, क्योंकि चिन्ता करने से दुःख बढ़ते ही हैं, घटते नहीं ॥१०॥ प्रज्ञा से मानस रोगों को और ओषधि से शरीर के रोगों को नष्ट करना चाहिए, इस सिद्धान्त को समझकर अपनी शक्ति से दुःखों को नष्ट करना चाहिए, इसके अतिरिक्त अन्य साधनों को अपनाने से समभाव को प्राप्ति नहीं होती ॥११॥ कभी और कहीं पर भी पंडित जीवन, रूप, यौवन, धन-संग्रह, आरोग्य, प्रिय साहचर्य आदि अनित्य वस्तुओं की इच्छा न करे ॥१२॥ अज्ञान के कारण उत्पन्न होने वाले एक दुःख की भी चिन्ता करना उचित नहीं, क्योंकि यदि मनुष्य किसी प्रकार की चिन्ता न कर उसके मूल कारणों पर विचार करे तो वह अवश्य उन दुःखों को दूर कर सकता है ॥१३॥ इस जीवन में निस्सन्देह सुख की अपेक्षा दुःख ही अधिक होता है। इसलिये बुढ़ापा, मृत्यु और दुःखों से अपने प्रिय आत्मा का उद्धार करना चाहिए ॥१४॥ वीर धनुर्धारी के फेंके हुए नुकीले बाणों की भाँति शारीरिक और मानसिक रोग मनुष्य के शरीर और मन में प्रवेश कर जाते हैं ॥१५॥ चिकित्साओं से भयभीत तथा जीने के इच्छुक रोगी के रोग को दूर करने में उसके शरीर का ही नाश होता है ॥१६॥ परन्तु वस्तुतः नदी की धारा ६७ ना० पु०
५३० नारदीयपुराणम् त्रंसंति न निवर्तंते स्रोतांसि सरितामिव । आयुरादाय मर्त्यानां राज्यहानिः पुनःपुनः ॥१७॥ अपयंत्ययमप्यंतं पक्षयोः शुक्लकृष्णयोः । जातं मत्यं जरयति निमिषं नावतिष्ठते ॥१८॥ सुखदुःखामिभूतानामजरो जरयत्यसून् । आदित्यो ह्यस्तमभ्येति पुनःपुनरुदेति च ॥१९॥ अदृष्टपूर्वानादाय भावा नपरिशंकितान् । इष्टानिष्टा मनुष्याणां मतं गच्छन्ति रात्रयः ॥२०॥ यो यदिच्छेद्यथाकामं कामानां तत्तदाप्नुयात् । यदि स्यान्न पराधीनं पुरुषस्य क्रियाफलम् ॥२१॥ संयताश्चैव दक्षाश्च मतिमंतश्च मानवाः । दृश्यंते निष्फलाः संतः प्रहीनाश्च स्वकर्मभिः ॥२२॥ अपरे निष्फलाः संतो निर्गुणाः पुरुषाधमाः । आशाभिरप्यसंयुक्ता दृश्यन्ते सर्वकामिनः ॥२३॥ भूतानामपरः कश्चिद्धिंसाया सततोत्थितः । वंचनायां च लोकेषु ससुखेष्वेव जीर्यते ॥२४॥ अचेष्टमानमासीनं श्रीः कंचिदुपतिष्ठति । कश्चित्कर्माणि कुरुते न प्राप्यमधिगच्छति ॥२५॥ प्रारब्धानि समाचक्षु पुरुष्य प्रधानतः । शुक्रमन्यत्र संभूतं पुनरन्यत्र गच्छति ॥२६॥ तस्य योनौ प्रसक्तस्य गर्भो भवति मानवः । आम्रपुष्पोपमा यस्य निवृत्तिरुपलभ्यते ॥२७॥ केषांचित्पुत्रकामानामनुसन्तानमिच्छताम् । सिद्धौ प्रयतमानानां नैवांडमुपजायते ॥२८॥ गर्भादुद्विजमानानां क्रुद्धादाशीविषादिव । आयुष्मान् जायते पुत्रः कथं प्रेतः पितेव सः ॥२९॥ देवानिष्ट्वा तपस्तप्त्वा कृपणेः पुत्रहेतुभिः । दशमासान्परिवृता जायन्ते कुलपांसनाः ॥३०॥
की भाँति रात और दिन मनुष्य की आयु को लेकर भागते ही जाते हैं और पीछे नहीं लौटते ॥१७॥ समय शुक्ल और कृष्ण पक्ष के रूप में दूर होता जाता है और जन्मे हुए मनुष्य को बूढ़ा बना देता है । वह एक क्षण भी रुकता नहीं ॥१८॥ अमर सूर्य प्रति दिन बारबार उदित होता और अस्त होता है, और सुख-दुःख से घिरे प्राणियों को बूढ़ा बना देता है ॥१९॥ अनुकूल या प्रतिकूल रात्रियां मनुष्यों के समीप आशा के विपरीत अभूत-पूर्व भाव (घटना) प्रस्तुत कर देती हैं ॥२०॥ मनुष्य अपनी इच्छा के अनुसार अवश्य अपने मनोरथों को प्राप्त कर लेता यदि इसके कार्यों का फल दूसरे के अधीन न होता ॥२१॥ प्रायः संयमी-मतिमान् और कर्मकुशल मानव किसी अपने कार्य का फल न पाने पर उस कार्य को छोड़ देते हैं । परन्तु दूसरे अधम और अज्ञानी मानव कर्मफल न पाने पर भी और अपनी आशाओं की असफलता होने पर भी सब प्रकार की कामनाओं के पीछे मरते हुए देखे जाते हैं ॥२२-२३॥ इस संसार में प्राणियों में तीसरे प्रकार के लोग हैं जो सर्वदा हिंसा, वंचना आदि में ही लगे रहते हैं परन्तु वे सुखपूर्वक अपने में बुढ़ापा को देखते हैं ॥२४॥ कोई किसी प्रकार की चेष्टा नहीं करता, यों ही बैठा रहता है, परन्तु लक्ष्मी स्वयं उसके पास चली आती है। फिर कोई कर्म करता हुआ भी अपने प्राप्य फल को नहीं पाता है ॥२५॥ इसमें पुरुष का प्रारब्ध ही प्रधान है। देखो, वीर्य अन्यत्र पैदा होता है और अन्यत्र जाकर संतान उत्पन्न करता है। आम्रपुष्प के समान जिसको निवृत्ति प्राप्त होती है वह कभी तो योनि में पहुँचकर गर्भ धारण करने में समर्थ होता है और कभी नहीं होता । कितने ही लोग पुत्र-पौत्र की इच्छा रखकर उसकी सिद्धि के लिए यत्न करते रहते हैं, तो भी उनके संतान नहीं होती ॥२६-२८॥ और कितने ही मनुष्य संतान को क्रोध में भरा हुआ सांप समझकर सदा उससे डरते हैं, तो भी उनके यहाँ दीर्घजीवी पुत्र उत्पन्न हो जाता है; मानो वह स्वयं किसी प्रकार परलोक से आकर प्रकट हो गया हो ॥२९॥ कितने ही गर्भ ऐसे हैं, जो पुत्र की अभिलाषा रखने वाले दीन स्त्री-पुरुषों द्वारा देवताओं की पूजा और तपस्या करके प्राप्त किये जाने हैं और दस मास तक माता के उदर में धारण किये जाने के बाद जन्म लेने पर कुलांगार निकल जाते हैं ॥३०॥