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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 548, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 548

५२६ एकषष्टितमोऽध्यायः अनिष्टसंप्रयोगाच्च विप्रयोगात्प्रियस्य च । मनुष्या मान सैर्दुःखैर्युज्यन्ते येऽल्पबुद्धयः ॥३॥ द्रव्येषु समतीतेषु ये गुणास्तान्न चिंतयेत् । ताननाद्रियमाणश्च स्नेहबन्धाद्विमुच्यते ॥४॥ दोषदर्शी भवेत्तत्र यत्र रागः प्रवर्त्तते । अनिष्टबुद्धितां यच्छेत्ततः क्षिप्रं विरज्यते ॥५॥ नार्थो न धर्मो न यशो योऽतीतमनुशोचति । अस्याभावेन युज्येत तच्चास्य तु निवर्तते ॥६॥ गुणैर्भूतानि युज्यंते तथैव च न युज्यते । सर्वाणि नैतदेकस्य शोकस्थानं हि विद्यते ॥७॥ मृतं वा यदि वा नष्टं योऽतीतमनुशोचति । दुःखेन लभते दुःखं महानर्थे प्रपद्यते ॥८॥ दुःखोपघाते शारीरे मानसे चाप्युपस्थिते । यस्मिन्न शक्यते कर्तुं यत्नस्तन्नानुचिंतयेत् ॥६॥ भेषज्यमेतद्दुःखस्य यदेतन्नानुचिंतयेत् । चिंत्यमानं हि न व्येति भूयश्चाभिव्रवर्द्धते ॥१०॥ प्रज्ञया मानसं दुःखं हन्याच्छारीरमौषधैः । एतद्विज्ञाय सामर्थ्यं न वान्यैः समतामियात् ॥११॥ अनित्यं जीवितं रूपं यौवनं द्रव्यसञ्चयः । आरोग्यं प्रियसंवासं न गृध्येत्पंडितः क्वचित् ॥१२॥ नाज्ञानप्रभवं दुःखमेकं शोचितुमर्हति । अशोचन्प्रतिकुर्वीत यदि पश्येदुपक्रमम् ॥१३॥ सुखात्प्रियतरं दुःखं जीविते नात्र संशयः । जरामरणदुःखैभ्यः प्रियमात्मानमुद्धरेत् ॥१४॥ मजंति हि शरीराणि रोगाः शारीरमानसाः । सायका इव तीक्ष्णाग्राः प्रयुक्ता दृढधन्विभिः ॥१५॥ व्याधितस्य चिकित्साभिस्त्रस्यतो जीवितेषिणः । आमयस्य विनाशाय शरीरमनुकृष्यते ॥१६॥ में फंसता है परन्तु पंडित नहीं ॥२॥ अवांछित वस्तु के संयोग और प्रिय वस्तु के वियोग से अल्प बुद्धि मनुष्यों को मानसिक कष्ट प्राप्त होता है ॥३॥ अतीत वस्तुओं के गुणों का चिन्तन नहीं करना चाहिए । ऐसी वस्तुओं और उनके गुणों की चिन्ता न करने वाला व्यक्ति स्नेह-बन्धन (आसक्ति) से मुक्त हो जाता है ॥४॥ जिस विषय की ओर अनुरक्ति हो उस विषय के दोषों को ही देखना चाहिए । इस प्रकार उसको अपना अनिष्टकारक समझने से मनुष्यों को उस विषय से विराग हो जाता है ॥५॥ जो अतीत विषयों का चिन्तन करता है उससे न तो उसका कुछ प्रयोजन ही सिद्ध होता है और न धर्म या यश ही मिलता है। जो इस भाव से विचार करता है, वह कष्टों से निवृत्त हो जाता है ॥६॥ प्राणी कभी विषय-गुणों में आसक्त होते हैं और कभी उससे विरक्त क्योंकि सब पदार्थ एक ही व्यक्ति के लिये शोक के कारण नहीं होते हैं। ॥७॥ जो मृत, नष्ट अथवा बीती हुई घटनाओं के लिए शोक करता है, वह अपनी इस दुःखजनक प्रवृत्ति के कारण दुःख पाता है और महान् अनर्थों के जाल में फंस जाता है ॥८॥ यदि शारीरिक या मानसिक दुःख में पड़ जाने पर उस दुःख को दूर नहीं किया जा सकता तो फिर उसके विषय में कुछ शोक करना ही व्यर्थ है ॥९॥ दुःख दूर करने की सबसे बड़ी ओषधि यह है कि उसकी चिन्ता ही न करे, क्योंकि चिन्ता करने से दुःख बढ़ते ही हैं, घटते नहीं ॥१०॥ प्रज्ञा से मानस रोगों को और ओषधि से शरीर के रोगों को नष्ट करना चाहिए, इस सिद्धान्त को समझकर अपनी शक्ति से दुःखों को नष्ट करना चाहिए, इसके अतिरिक्त अन्य साधनों को अपनाने से समभाव को प्राप्ति नहीं होती ॥११॥ कभी और कहीं पर भी पंडित जीवन, रूप, यौवन, धन-संग्रह, आरोग्य, प्रिय साहचर्य आदि अनित्य वस्तुओं की इच्छा न करे ॥१२॥ अज्ञान के कारण उत्पन्न होने वाले एक दुःख की भी चिन्ता करना उचित नहीं, क्योंकि यदि मनुष्य किसी प्रकार की चिन्ता न कर उसके मूल कारणों पर विचार करे तो वह अवश्य उन दुःखों को दूर कर सकता है ॥१३॥ इस जीवन में निस्सन्देह सुख की अपेक्षा दुःख ही अधिक होता है। इसलिये बुढ़ापा, मृत्यु और दुःखों से अपने प्रिय आत्मा का उद्धार करना चाहिए ॥१४॥ वीर धनुर्धारी के फेंके हुए नुकीले बाणों की भाँति शारीरिक और मानसिक रोग मनुष्य के शरीर और मन में प्रवेश कर जाते हैं ॥१५॥ चिकित्साओं से भयभीत तथा जीने के इच्छुक रोगी के रोग को दूर करने में उसके शरीर का ही नाश होता है ॥१६॥ परन्तु वस्तुतः नदी की धारा ६७ ना० पु०