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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 547, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 547

५२८ नारदीयपुराणम् ब्रह्मभूतस्य संयोगो नाशुभेनोपपद्यते । ज्ञानेन विविधांक्लेशान् निवृत्तिश्च देहजात् ॥८७॥ लोकबुद्धिप्रकाशेन लोकमार्गो न रिष्यति । अनादिनिधनं जंतुमात्मनि स्थितमव्ययम् ॥८८॥ अकर्तारममूढं च भगवानाह तीर्थवित् । यो जन्तुः स्वकृतैस्तैस्तैः कर्मभिर्नित्यदुःखितः ॥८९॥ स्वदुःखप्रतिघातार्थं हंति जंतुरनेकधा । ततः कर्म समादत्ते पुनरन्यन्नवं बहु ॥९०॥ तप्यतेऽथ पुनस्तेन भुक्त्वाऽपथ्यमिवातुरः । अजस्रमेव मोहांतो दुःखेषु सुखसंज्ञितः ॥९१॥ बध्यते तप्यते चैव भयोत्पतकर्मभिः सदा । ततो निवृत्तो बंधात्स्वात्कर्मणामुदयादिह ॥९२॥ परिभ्रमति संसारे चक्रवद्द्बाहुवर्जितः । संयमेन च संबंधान्निवृत्त्या तपसो बलात् ॥९३॥ सम्प्राप्ता बहवः सिद्धि अव्याबाधां सुखोदयाम् । ॥९४॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे द्वितीयपादे बृहदुपाख्याने षष्टितमोऽध्यायः ॥६०॥

अथैकषष्टितमोऽध्यायः

सनत्कुमार उवाच अशोकं शोकनाशार्थं शास्त्रं शांतिकरं शिवम् । निशम्य लभ्यते बुद्धिलंब्धायां सुखमेधते ॥१॥ हर्षस्थानसहस्राणि शोकस्थानशतानि च । दिवसे दिवसे मूढमाविशंति न पंडितम् ॥२॥

कारा नहीं होता है। केवल लौकिक ज्ञान के प्रकाश से लोक मार्ग पर नहीं चला जाता है अर्थात् लोक यात्रा सफल नहीं होती है। इसके लिए अध्यात्म ज्ञान की भी आवश्यकता है ॥८७॥ आत्म-सन्तुष्ट, अव्यय, जन्म-मरण से रहित, अकर्ता और अविवेकी जीव को भगवान् और तीर्थज्ञ कहा जाता है ॥८८॥ जो जीव अपने किये हुए कर्मों के कारण नित्य दुःखी रहता है और अपने दुःखों के विनाश के लिए अनेक प्रकार के जीवों की हत्या करता है, फिर अनेक कर्मों में अपने को फंसाता है, वह उन कर्मों से उसी प्रकार संतप्त होता है, जिस प्रकार अपथ्य भोजन से रोगी ॥८९-९०॥ वह सर्वदा सुख के भ्रम से दुःखों में फंसकर कष्ट पाता और उन भयोत्पादक कर्मों के कारण मृत्यु-कष्ट में पड़ता है ॥९१॥ पुनः अपने शुभ कर्मों के उदय से दुष्कर्मों के बन्धन से छूटकर इस संसार में चक्र की भाँति परवश होकर भ्रमण करता है। इसके विपरीत संयम, निवृत्ति, भक्ति और तपस्या के बल से सुखप्रद, शुभ सिद्धियों को मनुष्य प्राप्त करते हैं ॥९२-९४॥ श्रीनारदीयपुराण के पूर्वभाग के द्वितीयपाद में साठवां अध्याय समाप्त ॥६०॥

अध्याय ६१

सनत्कुमार बोले - शोक नाश के लिये शान्तिप्रद, शुभ, शोक-विनाशक शास्त्र का अध्ययन या श्रवण करने से ज्ञान और ज्ञान से सुख की प्राप्ति होती है ॥१॥ प्रति दिन मूढ़ मानव सैकड़ों प्रकार के दुःख और सुखों