बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 546, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंषष्टितमोऽध्यायः ५२७ तुल्यजातिवयोरूपान् हृतान्पश्यसि मृत्युना । न च नामास्ति निर्वेदो लोहं हि हृदयं तव ॥७३॥ रूपकूलां मनःस्रोतां स्पर्शद्वीपां रसावहाम् । गंधपंकां शब्दजलां स्वर्गमार्गदुराग्रहाम् ॥७४॥ क्षमारित्रां सत्यमयीं धर्मस्थैर्यकराकराम । त्यागवाताध्वगां शीघ्रां बुद्धिनावं नदीं तरेत् ॥७५॥ त्यक्त्वा धर्ममधर्मं च ह्युभे सत्यानृते त्यज । त्यज धर्ममसंकल्पादधर्मं चाप्यहिंसया ॥७६॥ उभे सत्यानृते बुद्ध्वा बुद्धिं परमनिश्चयात् । अस्थिस्थूणं स्नायुयुतं मांसशोणितलेपनम् ॥७७॥ धर्मावनद्धं दुर्गन्धि पूर्णं मूत्रपुरीषयोः । जराशोकसमाविष्टं रोगायतनमस्थिरम् ॥७८॥ रजस्वलमनित्यं च भूतावासं समुत्सृज । इदं विश्वं जगत्सर्वमजगच्चापि यद्भवेत् ॥७६॥ महाभूतात्मकं सर्वमस्माद्यत्परमाणुमत् । इंद्रियाणि च पंचैव तमः सत्त्वं रजस्तथा ॥८०॥ इत्येष सप्तदशको राशिरव्यक्तसंज्ञकः । सर्वैरिरिन्द्रियार्थैश्च व्यक्ताव्यक्तैर्हि बृंहितम् ॥८१॥ पंचविंशक इत्येष व्यक्ताव्यक्तमयो गणः । एतैः सर्वैः समायुक्तमनित्यमभिधीयते ॥८२॥ त्रिवर्गोऽथ सुखं दुःखं जीवितं मरणं तथा । य इदं वेद तत्त्वेन स वेद प्रभवाप्ययौ ॥८३॥ इन्द्रियैर्गृह्यते यद्यत्तद्वयक्तमभिधीयते । अव्यक्तमथ तज्ज्ञेयं लिंगग्राह्यमतीन्द्रियम् ॥८४॥ इन्द्रियैर्नियतैर्देही धाराभिरिव तर्प्यते । लोके विहितमात्मानं लोकं चात्मनि पश्यति ॥८५॥ परावरदृशः शक्तिर्ज्ञानवेलां न पश्यति । पश्यतः सर्वभूतानि सर्वावस्थासु सर्वदा ॥८६॥
और वायु वाले साथियों को मृत्य मुख में जाते हुए देखते हैं । परन्तु शोक है कि तुम्हारे सदृश जीवों की आंखें यह देखकर भी नहीं खुलतीं और कुछ भी निर्वेद नहीं होता । सचमुच तुम्हारा हृदय लोहे का है, ॥७३॥ रूप रूपी तट, मन रूपी स्रोत, स्पर्श रूपी द्वीप, रस रूपी वेग, गंधरूपी पंक, शब्द रूपी जल और स्वर्ग मार्ग की ओर कभी भी न ले जाने वाली संसार रूपी नदी को क्षमा रूपी पतवार वाली, सत्यमयी, धर्म रूपी लंगर वाली और त्याग रूपी वायु के सहारे लेई जाने वाली शीघ्रगामिनी बुद्धि रूपी नाव से पार करना चाहिए ॥७४-७५॥ धर्म और अधर्म की भावना को छोड़कर सत्य और असत्यद्वन्द्व का त्याग करो । धर्म को असंकल्प द्वारा और अहिंसा से अधर्म का नाश करो ॥७६॥ और सत्य तथा अनृत को भली भाँति समझकर अपनी निश्चयात्मिका बुद्धि द्वारा हड्डियों के ढाँचे और नसों से युक्त मांस और रक्त के लेप से लिप्त, धर्म से बँधी, दुर्गन्धपूर्ण, मलमूत्र से भरी, जरा और शोक से घिरी, रोग का घर, अस्थिर, धूलि से भरी इस अनित्य देह में आसक्ति न रखो ॥७७-७८१/२॥ यह सारा जगत् (चर) और अजगत् (अचर) रूपात्मक विश्व तथा महाभूतात्मक पदार्थ इसके अतिरिक्त परमाणु वाले पदार्थ पाँचों इन्द्रियाँ, तम, सत्त्व, और रज ये सत्रह प्रकार के पदार्थ अव्यक्त कहलाते हैं। ॥७६-८०१/२॥ इस संसार में सब इन्द्रिय-विषय व्यक्त और अव्यक्त का समूह, पचीस प्रकार के पदार्थ व्यक्ताव्यक्त हैं। इन सबसे युक्त पदार्थ अनित्य कहे जाते हैं ॥८१-८२॥ त्रिवर्ग, सुखदुःख, जीवन और मरण इन सबको जो यथार्थरूप से समझता है वह उत्पत्ति और विनाश दोनों को जानता है ॥८३॥ इन्द्रियों से जिसको ग्रहण किया जाता है, उसको व्यक्त और जो इन्द्रियों से ग्रहण करने योग्य नहीं है और जिसका अनुमान आदि से ग्रहण होता है, उसको अव्यक्त कहते हैं ॥८४॥ नियत इन्द्रियों से जल धारा के समान आत्मा की तृप्ति होती है । संसार में अपने को और अपने में संसार को देखता है, जो आत्म दर्शन की शक्ति से सम्पन्न है, वह ज्ञान वेला को नहीं देखता है ॥८५१/२॥ जो सर्वदा सब अवस्थाओं में सब प्राणियों को देखता है । और जो ब्रह्म स्वरूप है उसका अशुभ कभी नहीं होता है ॥८६१/२॥ ज्ञान के द्वारा ही कायिक विविध क्लेशों से छुट-