बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 545, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ें५२६ नारदीयपुराणम् किंचित्प्रज्ञानतृप्तोऽसौ ज्ञानतृप्तो न शोचति । शुभैर्लभेत देवत्वं व्यामिश्रैर्जन्म मानुषम् ॥६०॥ अशुभैश्चाप्यधो जन्म कर्माभिलं भतेऽवशः । तत्र मृत्युजरादुःखैः सततं समभिद्रुतम् ॥६१॥ संसारं पश्यते जंतुस्तत्कथं नावबुध्यसे । अहिते हितसंज्ञस्त्वमध्रुवे ध्रुवसंज्ञकः ॥६२॥ अनर्थे चार्थसंज्ञस्त्वं किमर्थं नावबुध्यसे । संवेष्ट्यमानं बहुभिर्मोहतंतुभिरात्मजैः ॥६३॥ कोशकारवदात्मानं वेष्टितो नावबुध्यसे । अलं परिग्रहेणेह दोषवान् हि परिग्रहः ॥६४॥ कृमिर्हि कोशकारस्तु बध्यते स्वपरिग्रहात् । पुत्रदारकुटुंबेषु सक्ताः सीदंति जंतवः ॥६५॥ सरःपंकार्णवे मग्ना जीर्णा वनगजा इव । मोहजालसमाकृष्टान्पश्य जंतून्सुदुःखितान् ॥६६॥ कुटुंबं पुत्रदारं च शरीरं द्रव्यसंचयम् । पारक्यमध्रुवं सर्वं किं स्वं सुकृतदुष्कृते ॥६७॥ यदा सर्वं परित्यज्य गंतव्यमवशेन वै । अनर्थे किं प्रसक्तस्त्वं स्वमर्थं नानुतिष्ठसि ॥६८॥ अविश्रांतमनालंबमपाथेयमदैशिकम् । तमःकर्त्तारमध्वानं कथमेको गमिष्यसि ॥६९॥ नहि त्वां प्रस्थितं कश्चित्पृष्ठतोऽनुगमिष्यति । सुकृतं दुष्कृतं च त्वां गच्छंतमनुयास्यतः ॥७०॥ विद्या कर्म च शौर्यं च ज्ञानं च बहुविस्तरम् । अर्थार्थमनुशोयंते सिद्धार्थस्तु विमुच्यते ॥७१॥ निबंधिनी रज्जुरेषा या ग्रामे वसतो रतिः । छित्त्वैनां सुकृतो यांति नैनां छिंदंति दुष्कृतः ॥७२॥ शुभ कर्मों के करने से मनुष्य देवत्व प्राप्त करता है, शुभ-अशुभ दोनों कर्मों के कारण मानव-जन्म और अशुभ कर्मों के कारण अवश प्राणी अधम योनियों में जन्म ग्रहण करता है ॥६०-६१॥ इस प्रकार जीव अपने कर्मों के कारण भिन्न-भिन्न योनियों में जन्म लेकर मृत्यु, बुढ़ापा और दुःखों से सर्वदा पीड़ित होकर संसार में भ्रमण करता रहता है। इसको देखकर क्यों नहीं इसका रहस्य समझ लेते हो ? ॥६१-६२॥ तुम तो इस अहितकर संसार में हितकर विषयों के ज्ञाता हो, अनित्य जगत् में नित्य के ज्ञाता और अनर्थ का त्याग कर अर्थवान् (सार्थक) विषयों के ज्ञाता हो, तो क्यों नहीं इस रहस्य को समझ लेते हो ? ॥६२-६३॥ स्वयम् आत्म-अज्ञान के कारण उत्पन्न मोह की रस्सियों में अपने को बाँध लेने वाले तुम अपने को रेशम के कीड़े की भाँति नहीं पहचान पाते हो (अर्थात्) जीव अपने को अपने ही अज्ञान के जाल में फँसाकर अपने दुःख का कारण बनता है ॥६३-६४॥ इस लिये परिग्रह (संग्रह) का त्याग करो । इससे कुछ भी लाभ नहीं है, क्योंकि संग्रह सर्वथा सदोष होता है । रेशम का कीड़ा अपने ही तन्तुओं में बँध जाता है । उसी प्रकार जीव भी स्त्री, पुत्र और परिवार के चक्कर में पड़कर सर्वदा कष्ट पाते रहते हैं ॥६४-६५॥ तालाब के कीचड़ में फँसे जंगल के बूढ़े हाथी के समान मोह-जाल में फँसे इन अत्यन्त दुःखी जीवों को देखो ॥६६॥ जब कि कुटुम्ब पुत्र, स्त्री, शरीर, संचित द्रव्य राशि, सुकृत, पाप आदि अनित्य और परकीय पदार्थों को छोड़कर अवश प्राणी को अवश्य ही इस लोक से चला जाना है तब तुम इस रहस्य को जानते हुए भी क्यों नहीं आत्म कल्याणार्थ प्रयत्न करते हो ॥६७-६८॥ तुम इस निरालंब, कभी भी विश्राम के लिए अवसर न पाने योग्य, पाथेय रहित, देश आदि से शून्य और अन्धकाराच्छन्न परलोक मार्ग पर कैसे अकेले चल सकते हो ? ॥६९॥ जब तुम इस लोक को छोड़कर परलोक चलोगे तब तुम्हारे पीछे-पीछे सहायता के लिए कौन जायेगा ? केवल तुम्हारे पाप-पुण्य ही तुम्हारा अनुसरण करेंगे ॥७०॥ केवल स्वार्थसिद्धि के लिए पढ़ी हुई विद्या, किये हुए कर्म, शौर्य अथवा विस्तृत ज्ञान उस समय काम नहीं देते हैं। केवल शुभ कार्य करने वाला सिद्धार्थ योगी ही मोक्ष का अधिकारी होता है ॥७१॥ विषय समूह अथवा लोक में आसक्ति उत्पन्न करने वाली ममता जीव को बन्धन में डालने वाली रस्सी है । सुकृती जन इस रस्सी को तोड़- कर मुक्त हो जाते हैं, परन्तु पापी इसको तोड़ नहीं पाते हैं ॥७२॥ जीव अपने ही समान जाति, रूप