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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 544, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 544

षष्टितमोऽध्यायः ५२५ सर्वोपायेन कामस्य क्रोधस्य च विनिग्रहः । कार्यः श्रेयोथिना तौ हि श्रेयोघातार्थमुद्यतौ ॥४७॥ नित्यं क्रोधात्तपो रक्षेच्छ्रियं रक्षेच्च मत्सरात् । विद्यां मानापमानाभ्यामात्मानं तु प्रमादतः ॥४८॥ आनृशंस्यं परा धर्मः क्षमा च परमं बलम् । आत्मज्ञानं परं ज्ञानं सत्यं हि परमं हितम् ॥४९॥ येन सर्वं परित्यक्तं स विद्वान्स च पंडितः । इंद्रियैरिन्द्रियार्थेभ्यश्चरत्यात्मवशैर्रिह ॥५०॥ असज्जमानः शांतात्मा निर्विकारः समाहितः । आत्मभूतैरतद्भूतः सह चैव विनैव च ॥५१॥ स विमुक्तः परं श्रेयो न चिरेणाधिगच्छति । अदर्शनमसंसर्पस्तथैवाभाषणं सदा ॥५२॥ यस्य भूतैः सह मुने स श्रेयो विन्दते महत् । न हिंस्यात्सर्वभूतानि भूतैर्मैत्रायणश्चरेत् ॥५३॥ नेदं जन्म समासाद्य वैरं कुर्वीत केनचित् । आकिंचन्यं सुसंतोषो निराशिष्टवमचापलम् ॥५४॥ एतदाहुः परं श्रेय आत्मज्ञस्य जितात्मनः । परिग्रहं परित्यज्य भव तात जितेन्द्रियः ॥५५॥ अशोकं स्थानमातिष्ठेह चामुत्र चाभयम् । निराशिनो न शोचंति त्यजेदाशिषमात्मनः ॥५६॥ परित्यज्याशिखं सौम्य दुःखग्रामाद्विमोक्ष्यसे । तपोनित्येन दांतेन मुनिना संयतात्मना ॥५७॥ अजितं जेतुकामेन भाव्यं संगेष्वसंगिना । गुणसंगेष्वनासक्त एकचर्यारतः सदा ॥५८॥ ब्राह्मणो न चिरादेव सुखमायात्यनुत्तमम् । द्वंद्वारामेषु भूतेषु वराको रमते मुनिः ॥५९॥

॥४६॥ श्रेयार्थी को सब प्रकार से काम और क्रोध को अपने वश में करना चाहिए क्योंकि ये दोनों श्रेय के विघात में सर्वदा तत्पर रहते हैं ॥४७॥ नित्य प्रति क्रोध से तप की और मात्सर्य से श्री की रक्षा करनी चाहिए। मान और अपमान से विद्या की और प्रमाद से आत्मा (ज्ञान) की रक्षा श्रेयस्कर है ॥४८॥ दया परम धर्म और क्षमा परम बल है। आत्मज्ञान परम ज्ञान और सत्य परम हित है ॥४९॥ जिसने सर्वस्व का त्याग कर दिया है वह पंडित और विद्वान् है। इस संसार में जितेन्द्रिय व्यक्ति विषयों का सेवन केवल इन्द्रियों से ही करते हैं, उनमें आसक्त नहीं होते ॥५०॥ अनासक्त, शांतचित्त, निर्विकार, एकाग्रचित्त और आत्मीय जनों के भाव अथवा अभाव दोनों अवस्थाओं में आसक्त न होने वाला व्यक्ति मुक्त है और उसको श्रेय शीघ्र प्राप्त हो जाता है ॥५१॥ मुने ! जो प्राणी को नहीं देखता, न उससे बोलता और न तो उनका स्पर्श करता है अर्थात् आत्माराम है, उसको परम श्रेय प्राप्त होता है, ॥५२॥ किसी प्राणी की हिंसा न करे, सबसे मित्र भाव रखे और यह मानव जन्म पाकर किसी से वैर न करे, ॥५३॥ आत्मज्ञ और जितात्मा के लिए दरिद्रता, संतोष, निराशा और धीरता हो परम श्रेय माना गया है। आपने तो परिग्रह का त्याग कर जितेन्द्रियता प्राप्त कर ली है। अब इस लोक और परलोक में अभय हो अशोक (निश्चिन्त) स्थान ग्रहण करें ॥५४-५५॥ किसी से कुछ आशा न रखने वाले व्यक्ति किसी प्रकार की चिन्ता में नहीं पड़ते हैं। इसलिये अपने स्वार्थ को आशा का त्याग कर देना चाहिए। सौम्य ! तुम आत्मसुख की भावना का परित्याग कर दुःखों और श्रम से मुक्त हो जाओगे ॥५६॥ नित्य तपस्या में लीन रहने वाले संयमी उदार मुनि को चाहिए कि वह सम्पूर्ण संगों अर्थात् आसक्ति उत्पन्न करने वाले विषयों को जीतने का प्रयत्न करे। सांसारिक विषयों में लिप्त न रहने वाला, सदा एकान्तवास करने वाला ब्राह्मण अतिशीघ्र अनुत्तम सुख को प्राप्त करता है। पराक व्रतशील मुनि सुख-दुःखों के देने वाले विषयों में कभी लिप्त नहीं होते हैं । स्वल्प ज्ञान वाले उस स्थित को प्राप्त नहीं करते हैं । परन्तु ज्ञानतृप्त व्यक्ति किसी प्रकार का शोक नहीं करते हैं। ॥५७-५९॥