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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 543, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 543

५२४ नारदीयपुराणम् सहसोदीर्यते तात जगत्प्रव्यथते तदा । तस्माद्ब्रह्मविदो ब्रह्म न पठन्त्यतिवायुतः ॥३५॥ वायोर्वायुभयं ह्युक्तं ब्रह्म तत्पीडितं भवेत् । एतावदुक्त्वा वचनं पराशरसुतः प्रभुः ॥३६॥ उक्त्वा पुत्रमधीष्वेति व्योमगंगामगात्तदा । ततो व्यासे गते स्नातु शुको ब्रह्मविदां वरः ॥३७॥ स्वाध्यायमकरोद्ब्रह्मन्वेदवेदांगपारगः । तत्र स्वाध्यायसंसक्तं शुकं व्याससुतं मुने ॥३८॥ सनत्कुमारो भगवानेकांते समुपायतः । उत्थाय सत्कृतस्तेन ब्रह्मपुत्रो हि काष्णना ॥३९॥ ततः प्रोवाच विप्रेंद्र शुकं वेदविदां वरः । किं करोषि महाभाग व्यासपुत्रमहाद्युते ॥४०॥ शुक उवाच स्वाध्याये संप्रवृत्तोऽहं ब्रह्मपुत्राधुना स्थितः । त्वद्दर्शनमनुप्राप्तः केनापि सुकृतेन च ॥४१॥ किंचित्त्वां प्रष्टुमिच्छामि तत्त्वं मोक्षार्थसाधनम् । तद्वदस्व महाभाग यथा तज्ज्ञानमाप्नुयाम् ॥४२॥ सनत्कुमार उवाच नास्ति विद्यासमं चक्षुर्नास्ति विद्यासमं तपः । नास्ति रागसमं दुःखं नास्ति त्यागसमं सुखम् ॥४३॥ निवृत्तिः कर्मणः पापात्सततं पुण्यशीलता । सद्वृत्तिः समुदाचारः श्रेय एतदनुत्तमम् ॥४४॥ मानुष्यमसुखं प्राप्य यः संज्जित स मुह्यति । नालं स दुःखमोक्षाय संगो वै दुःखलक्षणः ॥४५॥ सक्तस्य बुद्धिर्भवति मोहजालविवर्द्धिनी । मोहजालावृतो दुःखमिहामुत्र तथाश्नुते ॥४६॥

इस प्रकार के अद्भुत वायु के चलने के कारण ब्रह्मज्ञानी अपने वेदाध्ययन को बन्द कर देते हैं ॥३५॥ वायु के द्वारा जो भय होता है उसको कह दिया गया, इस वायु से ब्रह्म भी पीड़ित होता है । पराशर पुत्र प्रभु व्यास इस प्रकार पुत्र से कहकर ओर हे पुत्र ! अब स्वाध्याय करो, ऐसा कहकर व्योमगंगा में नहाने के लिए चले गये । नारद ! स्नान करने के लिए जब व्यास जी चले गये तब ज्ञानियों में श्रेष्ठ वेद-वेदांगों के पारगामी विद्वान् शुकदेव जी ने अपना स्वाध्याय प्रारम्भ किया ॥३६-३७॥ मुने ! उस समय जब कि व्यासपुत्र शुकदेव जी एकान्त में स्वाध्याय में मग्न थे भगवान् सनत्कुमार उनके समीप आये । व्यासपुत्र ने उठकरं ब्रह्मपुत्र का स्वागत किया । विप्रेंद्र ! शुकदेव से सत्कृत होने के बाद वेदज्ञों में श्रेष्ठ ऋषि ने पूछा- व्यासपुत्र ! महाभाग ! महाद्युति ! क्या कर रहे हो ? ॥३८-४०॥ शुक ने कहा- ब्रह्मपुत्र ! इस समय यहाँ बैठा बैठा स्वाध्याय कर रहा हूँ, आज आपका यह दर्शन मेरे किसी पूर्वजन्म के सुकृत से हुआ है ॥४१॥ महाभाग ! आज मैं आप से मोक्ष प्राप्ति के साधन के विषय में कुछ पूछना चाहता हूँ, कृपा कर आप मुझे इस विषय में कुछ बतावें जिससे कि मोक्ष विषयक ज्ञान पा जाऊँ ॥४२॥ सनत्कुमार बोले- विद्या के समान नेत्र नहीं, न तो विद्या के समान कोई तपस्या ही है । राग के समान कोई दुःख नहीं, न तो त्याग के समान सुख है ॥४३॥ समस्त पाप कर्मों से सर्वदा दूर रहना, सदा पुण्य का संचय करते रहना, साधु पुरुषों के व्यवहार को अपनाना और उत्तम सदाचार का पालन करना, ये सर्वोत्तम श्रेय हैं ॥४४॥ जो अश्रेयस्कर इन्द्रिय-सुखों में आसक्त होता है, अज्ञान के अन्धकार में पतित होता है, वह कभी भी दुखों से मुक्त नहीं हो सकता क्योंकि संग (आसक्ति) ही दुःख का प्रधान लक्षण है ॥४५॥ आसक्त व्यक्ति को मोह बढ़ाने वाली बुद्धि होती है और मोह-जाल में फँसा व्यक्ति दोनों लोकों में दुःख पाता है,