बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 542, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंषष्टितमोऽध्यायः ५२३ अंतर्देहेषु चोदानं यं वदंति मनीषिणः । यश्चतुर्भ्यः समुद्रेभ्यो वायुर्द्धारयते जलम् ॥२०॥ उद्धृत्य ददते चापो जीमूतेभ्यो वनेऽनिलः । योऽद्भिः संयोज्य जीमूतान्पर्जन्याय प्रयच्छति ॥२१॥ उद्वहो नाम बर्हिष्ठस्तृतोयः स सदागतिः । संनीयमाना बहुधा येन नीला महाधनाः ॥२२॥ वर्षमोक्षकृतारंभास्ते भवंति घनाघनाः । योऽसौ वहति देवानां विमानानि विहायसा ॥२३॥ चतुर्थः संवहो नाम वायुः स गिरिमर्दनः । येन वेगवता रुग्णाः क्रियन्ते तरुजा रसाः ॥२४॥ पंचमः स महावेगो विवहो नाम मारुतः । यस्मिन्परिप्लवे दिव्या वहंत्यापो विहायसा ॥२५॥ पुण्यं चाकाशयंमायास्तोयं तिष्ठति तिष्ठति । दूरात्प्रतिहतो यस्मिन्नेकरश्मिर्दिवाकरः ॥२६॥ योनिरंशुसहस्रस्य येन याति वसुंधराम् । यस्मादाप्यायते सोमो निधिर्दिव्योऽमृतस्य च ॥२७॥ षष्ठः परिवहो नाम स वायुर्जीवतांवरः । सर्वप्राणभृतां प्राणान्योऽन्तकाले निरस्यति ॥२८॥ यस्य धर्मेऽनुवर्तते मृत्युर्वैवस्वतावुभौ । सम्यगन्वीक्षता बुद्ध्या शांतयाऽध्यात्मनित्यया ॥२६॥ ध्यानाभ्यासाभिरामाणां योऽमृतत्वाय कल्पते । यं समासाद्य वेगेन दिशामंतं प्रपेदिरे ॥३०॥ दक्षस्य दश पुत्राणां सहस्राणि प्रजापतेः । येन वृष्ट्या पराभूतस्तोयान्येन निवर्तते ॥३१॥ परीवहो नाम वरो वायुः स दुरतिक्रमः । एवमेते दितेः पुत्रा मरुतः परमाद्भुताः ॥३२॥ अनारमंतः सर्वांतः सर्वगाः सर्वचारिणः । एतत्तु महदाश्चर्यं यदयं पर्वतोत्तमः ॥३३॥ कंपितः सहसा तेन पवमानेन वायुना । विष्णोर्निःश्वासवातोऽयं यदा वेगसमीरितः ॥३४॥ समुद्रों से जल खींचता है, जो जीमूत नामक मेघों से जल लेकर वनों में वर्षा करता है, जो पुनः जीमूतों को जल से भर देता और पर्जन्य को जल से युक्त कर देता है, वह तीसरा सदा गतिशील रहने वाला और प्रशंसनीय उद्वह कहलाता है ॥१९-२१॥ जो नील महामेघों को प्रायः इधर-उधर पहुँचाता है, जिसके कारण वे घने मेघ वर्षा बरसाते और रोकते हैं और जो देव विमानों को आकाश में इधर-उधर उड़ाता है वह चौथा पर्वतों का मान मर्दन करने वाला मारुत संवह है ॥२२-२३॥ जिस वेगवान् वायु से वृक्षों से उत्पन्न रस में रोग के कीटाणु घुस जाते हैं वह पाँचवां महा वेग वाला मारुत विवह है ॥२४॥ जिसके आधार पर आकाश में दिव्य जल प्रवाहित होते हैं, जो आकाश गंगा के पवित्र जल को धारण कर के स्थित है और जिसके द्वारा दूर से ही प्रतिहत होकर सहस्रों किरणों के उत्पत्तिस्थान सूर्य देव एक ही किरण से युक्त प्रतीत होते हैं, जिनसे यह पृथ्वी प्रकाशित होती है तथा अमृत की दिव्यनिधि चन्द्रमा का भी जिससे पोषण होता है, उस छठे वायु का नाम 'परिवह' है। वह सम्पूर्ण जीवनधारियों में श्रेष्ठ है ॥२४-२७॥ जो सब प्राणियों के प्राण को मृत्यु के समय खींच लेता है, मृत्यु और वैवस्वत जिसके वशवर्ती हैं, ध्यान और योगाभ्यास में लीन रहने वाले योगी जिसको नित्य अध्यात्म और शान्त बुद्धि से भली भाँति देखकर अमृतत्व प्राप्त करते हैं, जिस वायु के वेग में पड़कर प्रजापति दक्ष के दश हजार पुत्र बड़े वेग से सम्पूर्ण दिशाओं के अन्त में पहुँच गए तथा जिससे वृष्टि का जल तिरोहित होकर वर्षा बन्द होजाती है, वह परीवह नामक श्रेष्ठ वायु है जिसको कोई किसी प्रकार अपने वश में नहीं कर सकता ॥२८-३१॥ इस प्रकार इतने दिते के परम आश्चर्यजनक पुत्र वायु हैं। ये मरुत् सबके अन्तःकरण में प्रवेश करने वाले, सर्वत्र गतिशील, सर्वव्यापक और सब स्थानों पर पहुँचने वाले हैं ॥३२॥ यह एक आश्चर्यजनक बात है, कि उस वायु के चलने से यह गिरि- राज हिमालय भी सहसा हिल उठा । जब विष्णु के निःश्वास से निकला हुआ यह वायु बड़े वेग से सहसा उठता है तो उस समय यह संसार इस वायु से अत्यंत व्यथित हो जाता है ॥३३-३४॥ ब्रह्मन् ! इसलिए