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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 541, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 541

५२२ नारदीयपुराणम् तच्छ्रुत्वा वचनं व्यासो नभोवाणीसमीरितम् । शुकेन सह पुत्रेण वेदाभ्यासमथाकरोत् ॥५॥ तयोरभ्यसतोरेवं बहुकालं द्विजोत्तम । वातोऽतिमात्रं प्रववौ समुद्रानिलवोजितः ॥६॥ ततोऽनध्याय इति तं व्यासः पुत्रमवारयत् । शुको वारितमात्रस्तु कौतूहलसमन्वितः ॥७॥ अपृच्छत्पितरं तत्र कुतो वायुरभूदयम् । आख्यातुमर्हति भवान्सवं वायोर्विचेष्टितम् ॥८॥ शुकस्यैतद्वचः श्रुत्वा व्यासः परमविस्मितः । अनध्यायनिमित्तेऽस्मिन्निदं वचनमब्रवीत् ॥६॥ दिव्यं ते चक्षुरुत्पन्नं स्वस्थं ते निश्चलं मनः । तमसा रजसा चापि त्यक्तः सत्ये व्यवस्थितः ॥१०॥ तस्यात्मनि स्वयं वेदान्बुद्ध्वा समनुचिंतय । देवयानचरो विष्णोः पितृयानश्च तामसः ॥११॥ द्वावेतौ प्रत्ययं यातौ दिवं चाधश्च गच्छतः । पृथिव्यामंतरिक्षे च यतः संयांति वायवः ॥१२॥ सप्त ते वायुमार्गा वै तान्निबोधानुपूर्वशः । तत्र देवगणाः साध्याः समभूवन्महाबलाः ॥१३॥ तेषामप्यभवत्पुत्रः समानो नाम दुर्जयः । उदानस्तस्य पुत्रोऽभूद्व्यानस्तस्याभवत्सुतः ॥१४॥ अपानश्च ततो जज्ञे प्राणश्चापि ततः परम् । अनपत्योऽभवत्प्राणो दुर्धर्षः शत्रुमर्दिनः ॥१५॥ पृथक्कमीणि तेषां तु प्रवक्ष्यामि यथा तथा । प्राणिनां सर्वतो वायुश्चेष्टा वर्तयते पृथक् ॥१६॥ प्रीणनाच्चैव सर्वेषां प्राण इत्यभिधीयते । प्रेषयत्यभ्रसंघातान्धूमजांश्चोष्मजांस्तथा ॥१७॥ प्रथमः प्रथमे मार्गे प्रवह्यो नाम सोऽनिलः । अंबरे स्नेहमात्रेभ्यस्तडिद्भ्यश्चोत्तमद्युतिः ॥१८॥ आवहो नाम सोऽभ्येति द्वितीयः श्वसनो नदन् । उदयं ज्योतिषां शश्वत्सोमादीनां करोति यः ॥१९॥


पुत्र शुकदेव के साथ वेदाभ्यास करने लगे ॥५॥ द्विजोत्तम ! बहुत समय तक इन दोनों के इस प्रकार वेदाभ्यास करने के बाद एकाएक समुद्री वायु प्रेरित होकर जोरों से आंधी बहने लगी ॥६॥ यह देखकर 'अब अनध्याय का समय हो गया, यह कहकर व्यास ने पुत्र को पढ़ने से रोक दिया । इस प्रकार अध्ययन से रोके जाने पर शुकदेव को अत्यन्त आश्चर्य हुआ ॥७॥ उन्होंने पिता से पूछा कि यह प्रचण्ड वायु कहाँ से उत्पन्न हुआ ? आप वायु के प्रत्येक व्यापारों का वर्णन कीजिए ॥८॥ शुक के इस प्रश्न को सुनकर व्यास जी को परम विस्मय हुआ । उन्होंने अनध्याय के कारणभूत वायु के विषय में आगे की बातें बताईं ॥९॥ कि-तुम्हें दिव्य चक्षु प्राप्त हो गया है, तुम्हारा स्वस्थ और निश्चल मन तम और रज को छोड़ कर सत्य पर अटल हो गया है ॥१०॥ इसलिए अपने मन में वेदों का अनुचिन्तन कर विचार करो । विष्णु लोक का पथ देवयान चर है और पितृ यान तमसाच्छन्न या तामस है ॥११॥ स्वर्ग और पितर लोक को जाने वालों के लिये ये दो मार्ग हैं। पृथ्वी और अन्तरिक्ष में सात मार्ग से वायु बहता है, अतः उन सात वायुमार्गों को तुम यथार्थ रूप से समझ लो ॥१२॥ सब से पहले साध्य नाम के अत्यन्त बलवान् देवगण हुए। उनका समान नामक एक अजेय पुत्र हुआ, समान का पुत्र उदान और उदान के व्यान नामक पुत्र हुआ। व्यान के अपान और अपान के प्राण नामक पुत्र हुआ। दुर्धर्ष और शत्रु को पराजित करने वाले प्राण को कोई पुत्र नहीं हुआ ॥१३-१५॥ उनके जो पृथक् पृथक् कर्म हैं उनको कह रहा हूँ। वायु ही सब प्राणियों को गति और स्फूर्ति प्रदान करता है ॥१६॥ सब प्राणियों को तृप्त करने के कारण वायु को प्राण कहते हैं। मेघों को चाहे वे धुयें से उत्पन्न हुए हों या ताप से जो प्रथम मार्ग में ले जाता है वह प्रवह नामक वायु है ॥१७॥ आकाश में सम्पूर्ण स्नेहभय पदार्थों और विद्युत् से भी उत्कृष्ट प्रकाश वाला जो दूसरा अनिल है उसका नाम आवह है, जो ध्वनि करता हुआ बहता है ॥१८॥ जो सर्वदा चन्द्रमा आदि ज्योतिष्क पिण्डों को उदित करता है और शरीर के भीतर संचरणशील जिस वायु को मनीषी उदान कहते हैं, जो चारों